सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सिद्धान्त दर्पण
समाधेयं हि भूगोले लोका दृष्ट वशात् क्वचित्
अंगस्फुरणवत् कम्पो जातोऽग्न्युप चर्यते । ११ ।
यदि वासुकी आदि पृथ्वी के एक ही भाग को धारण करते हैं तो पृथ्वी के
हर भाग में भूकम्प क्यों आता है, इसका समाधान है कि शरीर के किसी भी अंग
में स्फुरण होने पर पूरा शरीर हिल जाता है । इसी प्रकार पृथ्वी के किसी एक
भाग में कम्पन होने पर वह अन्य स्थानों में भी फैल जाता है ।
यथा स्वमध्यं प्रति सन्निकृष्ट माकृष्टमाणं (द्रव्यम्) परमाणु भूम्नः ।
क्रमेण वेगोत्पतती वभाति द्रव्यं धरा सौक्व पतत्वनन्ते । १२ ।
कोई भी द्रव्य पृथ्वी का ही परमाणु (अर्थात् उसका बहुत छोटा अंश) है ।
अतः पृथ्वी अपनी शक्ति से हर द्रव्य को अपनी तरफ आकर्षित करती है । पृथ्वी
पर गिरने के बाद उसको आधार मिल जाता है अतः वह और कहीं नहीं जाता
है । आकाश में और किसी दिशा में जाने का कारण नहीं हैं ।
ब्रह्म सिद्धान्ते-पञ्चाशत् कोटि विस्तीर्णा केवलं कल्पिता मही
अल्पराज्य मदान्धानां विषादाय विरुक्तये । १३ ।
पृथ्वी का विस्तार ५० कोटि योजन है । अल्प राज्य के शासन से गर्व करने
वाले राजा यदि इसके बारे में समझें तो उनका मोह भंग होकर वैराग्य हो जायेगा ।
साकल्पना न च वृथा सतां पीठादि पूजने ।
सर्वत्र विषयारोपादेव सिद्धेन्दूपासना । १४ । इति ।
सज्जन लोग पीठ आदि की पूजा करने पर सभी स्थान में विषय का आरोप
करते हैं (छोटे पत्थर के टुकड़ो को देवता, अंजलि भर पानी में भारत की नदियों
का समावेश या कलश को समुद्र आदि मानते हैं । अतः इतनी बड़ी पृथ्वी की
कल्पना भी निरर्थक नहीं है और उपयोगी है । (उद्धरण समाप्त)
ब्रह्माण्डत्वं यथा देहे, धमन्या मादि शक्तिता
आत्मत्का शनी दासोत्वं तथैव स्थूलता क्षितेः । १५ ।
पिण्ड (देह) में ब्रह्माण्ड की कल्पना, शिरा (नाड़ी या चक्रों में) आदि शक्ति
की कल्पना या आत्मा को ईश्वर का दास जिस प्रकार माना गया है । उसी
प्रकार पृथ्वी की स्थूलता भी स्वीकृत हो चुकी है । (इसमें किसी को सन्देह नहीं
है)
मण्डूकादि क्रमश्चेति सर्व मारोपितं बुधैः ।
ध्यानं पूजा जपादीनां स्यात्तृष्टि स्तत् क्रमाद्यतः । १६ ।
पूजा पीठ में मण्डूक आदि की क्रम भी इसी प्रकार आरोपित है, इस मान्यता
से पूजा, ध्यान आदि स्पष्ट होता है तथा फल की भी प्राप्ति होती है ।