सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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पुरो गतिश्चाष्ट विनिघ्न लक्ष (८,००,०००) क्रोश प्रमा सा कथ मंत्र युक्ता
सा वास्तु तस्याः समपूर्व देह भ्रान्तौ कथं क्रान्ति पथेगतिः स्यात् । ५७ ।
पृथ्वी की पूर्व दिशा में दैनिक गति ८,००,००० कोस है- यह कैसे ठीक हो
सकता है, वह परिधि से इतना ज्यादा कैसे होगा ? फिर यह पूर्व दिशा की अपने
अक्ष पर गति विषुव वृत्त धरातल में है, फिर पृथ्वी की गति क्रान्ति वृत्त धरातल
में कैसे हो जाती है ?
ईशानां दिङ् मुखे मार्गे गच्छतः पुरुषस्य हि
पूर्वाभिमुखतां भ्रातः कथं संगच्छते वद । ५८ ।
ईशान कोण में जाते हुए व्यक्ति की पूर्व दिशा में गति कैसे होगी (कहो
भाई) !
किं वापार्श्व गतिं भूमेः कर्कटस्येव मन्यसे
उपपन्ना न सा युक्ति र्निसर्गो पाधि भेदतः । ५९ ।
अथवा पृथ्वी की पार्श्व गति (अपने अक्ष पर गति) कर्कट ( केकड़े) की
तरह यदि मानते हैं तो यह निसर्ग (प्राकृतिक) तथा उपाधि (कृत्रिम अथवा दृष्टान्त)
के समान भिन्न भिन्न युक्ति है ।
नैसर्गिकी कुलीरस्य सार्का कर्षण जा भुवः
तदृते क्रान्ति साम्मुख्याद् गतिरन्या न सम्भवेत् । ६० ।
आपके मत से पृथ्वी की स्वाभाविक गति सूर्य के आकर्षण के कारण है यह
स्वाभाविक नहीं है । कर्कट स्वयं चलता है किसी के आकर्षण से नहीं । अतः
यह तुलना ठीक नहीं है । इस प्रकार पृथ्वी की गति क्रान्ति के तल में नहीं है
यह माना नहीं जा सकता है ।
विषुवद् वलयस्थेन्दु कलंको दक्षिणेऽयने
आग्नेयदिङ्मुखोदृष्टः सौम्येत्वैशान्य दिङ्मुखः । ६१ ।
विषुववृत्त के धरातल का चन्द्र का कलंक दक्षिण अयन में आग्नेय दिशा
में और उत्तर अयन में ईशान दिशा में दीखता है ।
तत्कक्षान्तर्गतक्ष्माया ग्रहवद् भ्रान्ति रस्तिचेत्
तदासायन सामुख्यं ध्रुवं भवतु मर्हति । ६२ ।
ग्रहों की गति की तरह पृथ्वी की गति यदि विषुव कक्षा के अन्तर्गत होती
तो चन्द्र का कलंक निश्चय अपनाभिमुख होता, यह निश्चय है ।
सायनव्यस्त विक्षेप वृद्धावपि न चेद् विधुः
जहात क्रान्ति साम्मुख्यं क्ष्मानिषुस्तत् कथंत्यजेत् । ६३ ।
याम्यायन में सौम्य शर तथा सौम्य (उत्तर) अयन में दक्षिण शर वृद्धि होने