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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२६६ सिद्धान्त दर्पण
प्रतिक्षणं गच्छति यत्ततोजनञ्जगाद चेदित्थम्दोऽर्थविद् भवान्
चतुर्विधं याति लयं जगत्त्रयं ततोऽपि किं नार्थ समन्वयं व्रजेत् । ४५ ।
सदा गतिशील होने के कारण संसार का नाम जगत् है -ऐसा आप शब्दार्थ
के अनुसार कह सकते हैं । पर इसकी दूसरी व्याख्या है कि जगत अर्थात् स्वर्ग,
मर्त्य और पाताल का चार प्रकार के प्रलय में नाश हो जाता है ।
इस अर्थ में पृथ्‍वी को जगत् (नाश होने वाला, अस्थायी) कहा जाता है ।
इतोऽन्यथार्थः क्रियते यदा तदा स्थिरेति किं भूरचलेति कथ्यते ।
चराचरावा सतयाथवा धरा जगत स्थिरेत्येव समीरिता बुधैः । ४६ ।
यदि आप इससे भिन्न अर्थ करते हैं (अर्थात् केवल गति शील के कारण
जगत मानते हैं) तो कहिये-पृथ्‍वी का नाम स्थिरा और अचला क्यों हुआ ? इसके
अतिरिक्त स्थावर जगम (स्थिर और गतिशील) सभी को धर कर रखने के कारण
इसका नाम धरा विद्वानों ने रखा है ।
न शब्द मंगीकुरुतेऽनुमान वा न मान वाचाल वदे भवान् यदि
तदा तदा विष्क्रियया मया रयात्मना समाधान कृते प्रतायते । ४७ ।
आप वाचालता के कारण यदि केवल आप्त वचन को प्रमाण नहीं मानते
तथा अनुमान (तर्क) प्रमाण भी चाहते हैं तो मैं अनुमान द्वारा भी भास्कर मत को
सिद्ध करने की विधि निकालता हूँ ।
यथार्थ माकृष्ट बुधादयोग्रहा भ्रमत् स्वदेहाः परियान्ति सन्ततम् ।
स्वकक्षया प्रक्रम युक्त या तथा पथात्मनः क्ष्मा भ्रमतीति ते प्रथा । ४८ ।
सूर्य द्वारा आकर्षित हो बुध आदि ग्रह जिस प्रकार अपने अक्ष पर घूमने के
साथ साथ उत्तर और दक्षिण क्रान्ति अन्तर में अपनी अपनी कक्षा में अपनी गति
से जाते हैं । ठीक उसी प्रकार पृथ्‍वी भी अपने अक्ष पर घूमने के साथ अपनी
कक्षा में घूमती है - यदि ऐसा तुम्हारा मत है-
न स्याद् गतिः शक्तिमृतेऽखिलस्य साऽकर्ष विक्षेपवशाद्द्विधाचेत्
केन्द्राभि कर्षण्य भिधा तदाद्या केन्द्रापसारिण्य परोच्यतेषा । ४९ ।
तथायदि कहते हो कि शक्ति या बल द्वारा ही किसी वस्तु की गति होती है
और शक्ति दो प्रकार की है-आकर्षण शक्ति केन्द्र की तरफ तथा आकर्षण शक्ति
(विक्षेप) केन्द्र से दूर की तरफ-
पराणुबाहुल्य समुद्भवाद्या दृष्टा गुरुत्व वगमाद्धरित्र्यम् ।
तत्रापतद् गोलक पिण्डशश्वत्परिपभ्रमोस्मा भिरलाक्षि नैव । ५० ।
तो दोनों प्रकार की शक्ति पृथ्‍वी में भी होनी चाहिये क्योंकि परमाणु बाहुल्य
के कारण इसकी उत्पत्ति प्रथम हुयी होगी । किन्तु पृथ्‍वी की विक्षेप शक्ति दिखायी
नहीं देती । इसी प्रकार पृथ्‍वी पर पड़े किसी और वस्तू का अपने अक्ष पर भ्रमण