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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 609 में से

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पृष्ठ 356

भूगोलस्थिति वर्णनम् २५९
मेरा यही सिद्धान्त है (अर्थात् ब्रह्माण्ड मध्य में पृथ्वी आधार शून्य है जिसके
चारों तरफ सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र कक्षा है, तथा पृथ्वी और सभी ग्रहों का आकार
गोल है) जिनका इससे भिन्न मत है उनके प्रश्नों का उत्तर देकर मैं अपना मत
सिद्ध करना चाहता हूँ ।
सूर्य सिद्धान्ते-मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति
विभ्राणः परमां शक्ति ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् । इति । ६ ।
आकाश में ब्रह्माण्ड के मध्य में पृथ्वी सब तरफ से स्थिर होकर स्थित है ।
ब्रह्मा द्वारा प्राप्त धारिणी शक्ति द्वारा स्वयं को धर रखने के कारण पृथ्वी को धारिणी
कहते हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मूर्ती धर्त्ता चेद्धरित्र्य स्तदन्य-
स्तस्याप्यन्योऽस्यैव मत्रानवस्था ।
अन्त्ये कल्प्या चेन्न शक्तिः किमाद्ये ।
किं तो भूमिः साष्ट मूर्त्ते श्च मूर्तिः । इति । ७ ।
पृथ्वी का धारक किसी अन्य को मानने पर फिर उसका धारक तीसरे को,
तीसरे का चौथा और इस प्रकार क्रम की समाप्ति नहीं होगी । तथा पुनः अन्त में
एक अमूर्त शक्ति को ही धारक मानना होगा । इस दोष को दूर करने के लिए
आरम्भ में ही इस शक्ति को पृथ्वी का धारक मान ले तो क्या हानि है ? पृथ्वी
क्या अष्टमूर्ति धारी भगवान् की मूर्ति नहीं है ।
कूर्मादीनांमतो भूमेर्यत्किञ्चित् खण्ड धारणात्
संगच्छते धारकत्वं न तु कृत्स्न महीधृतेः । ८ ।
कूर्म आदि अवतारों ने पृथ्वी को धारण किया था । इसका अर्थ है कि उन्होंने
पृथ्वी के कुछ अंश का ही धारण किया था पूरी पृथ्वी को नहीं ।
भू धृताः पर्वता यद् वद् भूधरा इति कीर्तिताः
तथा धारत्व मेतेषां उक्तं भूस्थायिनामपि । ९ ।
पर्वत भी इसी प्रकार पृथ्वी के एक अंश को धारण करने के कारण भूधर कह
लाते हैं । इसी प्रकार का धारत्व कूर्मादि अवतारों का (अंश धारण ) था जिससे
उनका नाम भूस्थायी आदि हैं ।
भू भार खिन्न नागेन्द्र शीर्ष विश्राम सम्भव
भूकम्प इति यद वाक्यं तत्क्वचित् खण्ड धारणात् । १० ।
पृथ्वी के भार से थक जाने पर वासुकी नाग अपना सिर नीचे कर विश्राम
करते हैं जिससे भूमि कम्प होता है इस वाक्य का अर्थ भी भी पूरी पृथ्वी का
धारण करना नहीं है, पृथ्वी के एक अंश को ही वासुकी धारण करते हैं ।