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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूगोलस्थिति वर्णनम् २६३
गोल होने के कारण उसकी सतह पर किसी भी दिशा में जाने पर बार बार चक्कर
लगता रहेगा । परार्द्ध चक्र में भी उसका अन्त नहीं होगा ।
सूर्योपरीन्दो स्थितिरन्य खेट स्थानं भचक्रोपरि या पुरोक्तिः ।
स्वर्गस्थ तत्तत्पुर पेक्षया सा न तु भ्रमज्ज्योतिर पेक्षयेव । २९ ।
सूर्य के ऊपर चन्द्र तथा नक्षत्र के ऊपर ग्रह की स्थिति प्राचीन आचार्यों ने
कही है- यह स्वर्ग की तरफ से देखने पर होता है । घूमते हुए ज्योति पिण्डों
की दृष्टि से नहीं ।
किं वा कुरुक्षेत्र उपेन्द्र इन्द्रपुत्रा य सन्ददर्शित विश्वरूपः ।
एकार्णवो भूतमहीतले च मृकुण्डपुत्राय निजोदरस्थम् । ३० ।।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को, प्रलय पयोधि जल में मार्कण्डेय
को विश्वरूप दिखाया था तथा
अदर्शयात् विश्वमसौ सभायां स्वविश्वरूपं धृतराष्ट्र राज्ञे
यद् भूमिपृष्ठे घट वत् सुदृष्टं क्वचित्प्रदेशेकिल विश्वरूपम् । ३१ ।
तथा राजा धृतराष्ट्र को उनकी सभा में विश्व रूप में दिखाया था-वह गोल
घटाकार पृष्ठ हमारी पृथ्वी से भिन्न है । वह बिम्ब और पृथ्वी एक नहीं है ।
तदस्मदावास भुवस्तदेव प्रभिद्यते तत्र पुराण सिद्धाः
भू भूधराम्भो निधि भानु भाद्या तिष्ठन्तु सिद्धान्त भुवः क्षितिः का । ३२ ।
अतः पुराणों में जिस पृथ्वी, पर्वत समुद्र, सूर्य और नक्षत्र आदि का वर्णन
है-उससे हमारा कोई मतलब नहीं है । गणित सिद्ध पृथ्वी इन सबसे बिल्कुल
अलग है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-भूः खेऽधः खलु यातीति बुद्धि बौद्ध मुधाकथम्
याता यातन्तु दृष्ट वापि खे यत्क्षिप्तं गुरु क्षितिम् । ३३ ।
हे बौद्ध गण ! तुम्हारी बुद्धि वास्तव में मन्द है । स्पष्ट रूप से देखते हो कि
आकाश में फेंकी गयी प्रत्येक वस्तु भारी पृथ्वी पर आ जाती है । फिर भी किस
प्रकार मानत हो कि पृथ्वी लगातार नीचे की तरफ गिर रही है ?
किं चान्यत्तव वैगुण्यं द्वैगुण्यं यो वृथा कृताः ।
भार्केन्दूनां विलोक्याह्नां ध्रुवगतस्य परिभ्रमम् । इति । ३४ ।
इस ध्रुव मत्स्य की प्रतिदिन नक्षत्र, सूर्य और चन्द्र परिक्रमा करते हुए दीखते
हैं, फिर भी बेकार में कहते हो कि आकाश में दो सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र मण्डल
हैं । इससे मानना ही पड़ेगा कि तुम बिल्कुल गुणहीन हो । (उद्धरण समाप्त) ।
सौम्य मीनाकृतिं भानां ध्रुव मत्स्य इति श्रुता
ध्रुवस्तन्मुख देशस्थः पुच्छे तारा ततोऽवरा । ३५ ।