सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न वर्णनम् २५७
वाला होता है । नास्तिक (वैदिक विरोधी) -
यदवदन्नद उत्तर मस्ति किं
शशि तनावसितं किमुतेक्ष्यते
किम समाधिमता मपि मोक्षदं
यदनुगेः सुलभं परमं पदम् । ७८ ।
ऐसा कहते है क्या इसका उत्तर आप दे सकते हैं ? चन्द्र में कलंक क्यों
दीखता है ? ब्रह्म लीन लोगों को जिस प्रकार मोक्ष मिलता है, क्या समाधि हीन
को भी वह मिल सकता है ?
श्रम मृते कलयन्ति कथं जना
स्थिति मुखांग मतीत मनागतम् ।
कथय सर्व मिदं यदवेत्यमे
भ्रमचयः शममेष्यति दुर्दमः । ७९ ।
लोक बिना परिश्रम के किस प्रकार अतीत तथा भविष्यत की तिथि नक्षत्र
आदि पञ्चांग गणना कर सकें इसकी विधि बताये । इन सभी प्रश्नों का उत्तर
आपसे सुनने पर मेरा घोर संदेह दूर हो जायेगा ।
जलजनाभि विभूषण विग्रहे
जलज सम्भव राजदनुग्रह
जलजना जनिकारण दर्शनो
जलजनाभर भीति करोऽस्तुनः । ८० ।
जलज (कमल) फल की माला से जिनका सर्वांग शोभित है, जिनके नाभि
कमल से उत्पन्न ब्रह्म पर उनकी विशेष कृपा है, जिनके दर्शन मात्र से (अथवा
सुदर्शन चक्र से) ग्रह की मुक्ति हुयी, वही पद्म नाम (जगन्नाथ) हमारा भय दूर
करें ।
इत्युत्कलोञ्ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
प्रश्नान्वितो व्यरचि षोड़शकः प्रकाशः । ८१ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दर्शन में समानता तथा बलाकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
प्रश्नों से भरा हुआ १६ वां अध्याय समाप्त हुआ ।