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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 609 में से

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भूगोलस्थिति वर्णनम् २६५
नदी की धारा में बहती हुयी नाव में बैठा व्यक्ति अपनी नाव को स्थिर मान
कर नदीतट के स्थिर वृक्षों को विपरीत दिशा में चलता हुआ देखता है, तथा
ऊपर की तरफ फेंकी गयी चीज भी वापस हाथ में आते हुए देखता है (मानों
उसकी नाव स्थिर हो) पृथ्वी से भी यह दोनों क्रियायें इसी प्रकार दीखती हैं (
पृथ्वी की गति के कारण स्थिर नक्षत्र, सूर्य आदि चलते हुए दीखते हैं, तथा पृथ्वी
पर भी ऊपर की तरफ फेंकी हुई वस्तु वापस अपने ही स्थान पर वापस आती
है) । इस तर्क द्वारा यदि पृथ्वी को गतिशील माना गया है-
तदा हरि हरिन्मुख प्रजविना विना चेत् करे
विभर्त्यु परि यष्टि का शिखर जुष्ट चीनां शुकाम् ।
पुरः प्रवहदा शुप्रचलितं तदा लोक्यते ।
सदा वरुणदिङ्मुखं किम वनौ पराशा मरुत् । ४२ ।
उस अवस्था में, यदि हवा पूर्व दिशा में बहती हो, तथा कोई व्यक्ति डण्डे
के ऊपर रेशम की पता का बांध कर सीधा खड़ा करे तो वह पताका क्या सदा
पश्चिम दिशा में उड़ेगी ? पृथ्वी पर क्या पवन सदा पूर्व से पश्चिम की तरफ बहता
हुआ दीखता है ? (अपने अक्ष पर पूर्व दिशा की तरफ घूमने के कारण पवन की
गति पश्चिम की तरफ होनी चाहिये) ।
यदि प्रवहकर्षणात् व्रजति पश्चिमा शां ग्रहः
सदा कथमसौ पुरोगतिम् वामु मीष्टे ततः
इदं वदसि चेद्धराभ्रमण पूर्व कृष्टा घनाः
खगाश्च कथमीशते प्रचलितुं प्रतीचीं प्रति । ४३ ।
ज्योतिष मत से प्रवह वायु ग्रह नक्षत्रों को पूर्व से पश्चिम दिशा में दिन में
एक चक्र घुमाती है । इस पर यदि तुम्हारा प्रश्न है कि फिर ग्रह पुनः पूर्व की
तरफ (नक्षत्रों की तुलना में) किस प्रकार चलते हैं । उस का उत्तर है कि पृथ्वी
के वेग द्वारा मेघ और पक्षी आदि पूर्व की तरफ इसी प्रकार प्रवह वायु द्वारा नक्षत्र
आदि पश्चिम दिशा में घुमाये जाने पर भी ग्रह अपनी शक्ति के अनुसार पूर्व की
तरफ गति करते हैं ।
पुराणसिद्धान्त भिराप्त पुरुषै
स्थिरेति शब्दो धरणावुररीकृते
न चेत् प्रमाणो क्रियते त्वयाप्त वाक्
कथं प्रवृत्तिर्भवति सुकर्मसु । ४४ ।
प्राचीन आचार्यों तथा आप्त (वेद वादी) पुरुषों ने पृथ्वी
को स्थिर कहा है । यह स्वीकार नहीं करने पर कृत्य (शुभ) कर्म में तुम्हारी
प्रवृत्ति कैसे होगी ?

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