सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
२१२ सिद्धान्त दर्पण
उर्ध्व गानां ग्रहक्षाणामदृष्टौ कारणं यतः
खरांशु किरण व्याप्तिः साहि दृङ् मण्डलानुगा । ४५ ।
ग्रह और तारा गण क्षितिज के ऊपर रहने पर भी नहीं दीखते हैं उसका एक
मात्र कारण है कि उस समय सूर्य का प्रकाश व्याप्त रहता है । सूर्य की किरण
दृग् मण्डल में होने के कारण-
दृङ् मण्डल लवास्त्रिज्या हता लम्बज्यया हृताः
त्रिज्याघ्ना द्विज्यया भक्त्याः फलांशाः सूर्यतः स्फुटाः । ४६ ।
सूर्य के दृग् मण्डलीय उन्नतांश को नतज्या से गुणा कर लम्ब ज्या से भाग
देते हैं । फल को पुनः त्रिज्या से गुणा कर द्युज्या से भाग देते हैं । फल सूर्य से
ताराओं का स्फुट कालांश होगा ।
दृङ् मण्डलांश कालांश भेदस्तस्मादनल्पकः
भवेन्निरक्ष देशेऽपि द्युज्या त्रिज्यान्तरन्मितः । ४७ ।
इसका अर्थ है कि दृङ् मण्डलीय अंश और कालांश में पर्याप्त अन्तर होता
है । निरक्ष देश में (विषुव वृत्त पर) भी यह अन्तर द्युज्या और त्रिज्या के अन्तर
के बराबर है । अन्य स्थान पर यह और अधिक है ।
रसांगा (६६) क्षांशके देशे मेष मासे झषस्तयोः
उद्यतोः सह सूर्येण क्षितिजे गुरु शुक्रयोः । ४८ ।
(उदाहरण स्वरूप) जिस स्थान का अक्षांश ६६ है, वहां मेष मास में (जब
रवि मेष राशि में है) मीन राशि का गुरु और शुक्र - ये रवि के साथ ही उदय
होते हैं ।
भास्वतो दूर वर्तित्वात् सिद्धे दर्शन सम्भवे
उदयान्तर कालांश साधनं तत्र निष्फलम् । ४९ ।
ये दोनों ग्रह सूर्य से दूर रहने पर भी दीखते हैं । अतः उनका उदयान्तर
कालांश निकालने की कोई जरूरत नहीं है । उस समय लिखे गये कालांश से
कम कालांश रहने पर भी क्षेत्रांश अधिक होने के कारण ऐसा होता है ।
तदादौ स्थूल केन्द्रांशैः प्राग्वदस्तोदयोद् भवम् ।
कालमानीय तत्काल दोः फलञ्च विवस्वतः । ५० ।
तारा ग्रहों का दृक् सिद्ध ध्रुवांश -पहले लिखे गये उदय और अस्त केन्द्रांश
से उदय और अस्त काल निकाल कर उस समय के सूर्य का मन्द फल निकालें ।
धनर्णं सूर्यवत्तूर्य केन्द्रे स्व स्वोदयास्तजे
जीव मन्दासृजां शुक्र बुधयो स्तु व्यतिक्रमात् । ५१ ।
जिस रीति से मन्द भुजफल सूर्य में जोड़ा या घटाया जाता है उसी क्रम से
ग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २१५
गजाक्षिभि (११/२८) शिवा बाणै (११/५) रुद्रा (११) रुद्रभुवे (११/१)
तिच बुधस्य भूपा गिरिशै (१६/११) स्तिथयो नव वह्निभिः (१५/३९) । ६४ ।
उत्कल में वृहस्पति क्षेत्रांश-सायन संस्कृत रवि ४-९ राशि में -११°/२८'
,, ५-८ राशि में -११°/५'
,, ६-७ ,, - ११°/०'
बुध काक्षेत्रांश -सायन संस्कृत रवि १-१२ राशि में रहने पर -१६°/११'
,, २-११ राशि में,, - १५°/३०'
इन्द्रारदैः (१४/३२) र्गुणभुवोऽङ्गाग्निभि (१३/३६)
र्विश्व के नगैः (१३/७) विश्वे (१३) विश्वभुवा (१३/१)
कैस्तु धृतयो रस सायकै (१८/५६) । ६५ ।
बुधक्षेत्रांश-सायन संस्कृत रवि ३-१० राशि में -१४°/३२'
(उत्कल में) ,, ४-९ राशि - १३°/३६'
,, ५-८ ,, ,, - १३°/७'
,, ६-७ ,, - १३°/०' तथा १३°/१'
शनि क्षेत्रांश -सायन संस्कृत रवि १-१२ राशि में -१८°/५६'
धृतयश्च नृपै (१८/१६) र्भूपा गुणबाणैः (१६/५३) शरेन्दवः ।
कृतवेदैश्च (१५/४४) तिथयोदन्तिभि (१५/८) स्तिथयःपुनः । ६६ ।
शनिक्षेत्रांश सायन संस्कृत रवि २ ११ राशि में -१८°/२६'
,, ३-१० राशि में -१६°/५३'
(उत्कल में),, ,, ४-९ ,, - १५°/४४'
,, ५-८ ,, - १५°/८'
,, ६-७ ,, - १५°/०', १५°/१'
तिथयः एक (१५/१) भौमस्य भूदृशो नयनाब्धिभिः (२१/४२)
नखास्त्र्यक्षै (२०/५३) र्नवभुवः शके (१९/१४) बर्हिशरैर्घनाः (१७/५२) ।६७।
मंगल का क्षेत्रांश-सायन संस्कृत रवि १-१२ राशि में -२१°/४२ '
(उत्कल में) ,, २-११, , - २०°/५३'
,, ३-१० ,, - १९°/१४'
,, ४-९ ,, - १७°/५२'
घनादिग् भि (१७/१०) र्घना (१७) एव घन रूपेण (१७/१) सम्मताः
अस्तोदय ध्रुवाः स्पष्टा मध्यैः पञ्चमजाः समाः । ६८ ।
मंगल क्षेत्रांश-सायन संस्कृत रवि ५-८ राशि में १७°/१०'
(उत्कल में) ,, ,, ६-७ ,, - १७°/०', १७°/१'
५ राशि में जो अस्तोदय ध्रुव होगा वह मध्यम क्षेत्रांश के समान होगा (६ ठी
और ७-वीं राशि का क्षेत्रांश का अन्तर १' लिखा गया है )
२१६ सिद्धान्त दर्पण
एवमन्येषु देशेषून्नतज्या क्रमतो बुधैः ।
उन्नत्योदयास्तां शा सूर्य खेटान्तरान्तरा । ६९ ।
अन्य स्थानों में भी उन्नत ज्या आदि निकाल कर सूर्य और ग्रह के बीच का
उदय और अस्त का क्षेत्रांश निकाला जा सकता है ।
स्फुटं ध्रुवांश लिप्ताभि रन्तरं सूर्य खेटयोः
यदातं समयं प्राग् वन्निश्चली कृत्य भुक्तिभिः । ७० ।
स्फुट उदयास्त काल की विधि-सूर्य और ग्रह का अन्तर पूर्वोक्त ध्रुवांश कला
के समान होने पर वही स्फुट समय होगा । इसको पूर्वोक्त रवि और ग्रह कला
द्वारा स्थिर करना होगा ।
शरादायन दृक् कर्म परमाक्षं विधाय च
तत्परस्पर संस्कारा धनर्णा शादिकं तथा । ७१ ।
शर से आयन और आक्ष दोनों दृक् कर्म संस्कार करेंगे । दोनों का परस्पर
धन या ऋण करने पर शेष फल धन या ऋण हो उसे
विकली कृत्य खेटार्क गत्यन्तर कलाहृतम् ।
वक्रि शुक्रज्ञ गत्यर्क गति योग विभाजितम् । ७२ ।
विकला कर सूर्य और ग्रह के गति अन्तर की कला से भाग देगे । ग्रह वक्री
होने पर ग्रह (बुध या शुक्र) और सूर्य की गति योग कला से भाग देंगे ।
दण्डादिकं फलं ग्राह्यं धने दृक् कर्मणि स्फुटे
समये पश्चिमास्तस्य योज्यं प्रागुदयस्य च । ७३ ।
दण्ड आदि फल को पूर्व में उदय या पश्चिम में अस्त समय में जोड़ेगे यदि
दृक् कर्म संस्कार में योग हुआ था ।
प्राक् प्रत्यगस्तोदयोस्त्या ज्यं दृक् कर्मणि तदृणे ।
पश्चादस्त मय प्रागुदययोस्त्याज्य मन्वयोः । ७४ ।
पूर्व में अस्त होने पश्चिम में उदय होने पर उसे वियोग करेंगे । यदि स्फुट
दृक् कर्म घटाया गया था तो इस दण्ड आदि फल को पूर्व में उदय और पश्चिम
में अस्त समय से घटायेंगे ।
योज्य मेवं स्फुट तमः कालः स्यास्तदुदयास्तयोः ।
स च भुक्ति वशाज् ज्ञेयः स्फुट चक्रार्द्ध चक्रयोः । ७५ ।
(स्फुट दृक् कर्म ऋण होने पर) पूर्व के अस्त तथा पश्चिम के उदय समय
में इसे जोड़ेंगे । इस प्रकार ग्रह का उदयास्त समय अति स्फुट होगा । इस प्रकार
अति स्फुट समय ग्रह की चक्रार्द्ध और चक्र स्फुट के समय की ग्रह की गति के
कारण है ।
ग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २१७
स्फुट खेटार्क योर्यत्र समये समता तदा ।
स्फुटं चक्रं कुजादीनां चक्रार्द्धं च सितज्ञयोः । ७६ ।
स्फुट सूर्य और स्फुट ग्रह की राशि जब समान हो तब मंगल आदि ५ ग्रहों
का चक्र काल तथा बुध शुक्र का चक्रार्द्ध (भी) होता है ।
साय्नार्क स्य यद्राशौ ये ये स्वास्तो दयांशकाः
कथितास्ते तदात्वार्क ग्रह गत्यन्तरोद् धृताः । ७७ ।
चक्र और चक्रार्द्ध समय से बिना दृक् कर्म संस्कार के अस्तोदय काल
निकालने की विधि - उत्कल के लिए सायन संस्कृत रवि की राशि अनुसार ग्रहों
का उदय और असतांश कहा गया है । ग्रहों के चक्र काल और बुध और शुक्र
के चक्रार्द्ध काल में उस अस्तोदयांश में रवि और ग्रह की गति अन्तर से भाग
देंगे ।
चक्रज्ञसित गत्यर्क गति योग विभाजिताः ।
दिनादिभिः फलैः पूर्वं मस्तं पश्चात्तथोदयः । ७८ ।
बुध और शुक्र के लिये उनके और रवि के गति योग से भाग देंगे । फल
का मान दिन आदि में होगा । इतने दिन आदि समय चक्र और चक्रार्द्ध समय
के पहले तक ग्रहों का अदर्शन तथा उसके बाद दर्शन होगा ।
चक्र चक्रार्द्ध कालः स्यात् पुनस्तात्का लिकार्कतः ।
सायना दुदयास्तांशाः लिप्ताः प्राग्वद् हृताः फलैः । ७९ ।
इस प्रकार जो उदय और अस्त समय आयेगा उसको पुनः चक्र और चक्रार्द्ध
काल कहा जायेगा ।
उदय अस्त कालीन सायन सूर्य से उदय और अस्त अंश आदि आयेगा ।
उसको पहले की तरह रवि और गति अन्तर से भाग देंगे । (बुध और शुक्र के
लिए गति योग से भाग देंगे) फल का मान दिन आदि में होगा ।
दिनाद्यैरस्त मुदयं कृत्वा तत्काल जां गतिम्
चक्र चक्रार्द्ध जां त्यक्त्वा तद्यो गार्द्ध ग्रहार्कयोः । ८० ।
चक्र या चक्रार्द्ध समय से इतने दिन आदि पहले तक ग्रह अस्त रहेगा, उसके
बाद उदय होगा । इस शोधित उदयास्त काल में ग्रह और रवि की गति निकाल
कर उनका योग आधा करेंगे ।
कर्मयोग्या स्फुट गतिः स्यात्ततः पूर्ववद्दिनैः ।
प्राक् पश्चादागतौ कालौ स्यात् वास्तोदय स्फुटौ । ८१ ।
ग्रह और रवि की गति के योग का आधा ही उदय और अस्त काल के
साधन के लिये ग्रह और रवि दोनों की स्फुट गति मानी जायेगी । तात्कालिक
सायन और ध्रुवार्द्ध संस्कृत रवि की राशि के अनुसार जितनी उदय और अस्त
२१८ सिद्धान्त दर्पण
अंश की कला होगी उसमें रवि और ग्रह के स्फुट गति अन्तर या गति योग से
भाग देंगे । फल जितना दिन आदि होगा, चक्रार्द्ध से उतने दिन पहले उदय
होगा । इससे पुनः वास्तविक उदय अस्त समय निकाला जा सकता है ।
किन्तुक्तवाः पटुं चक्षुर्भि गुर्वाद्यस्तोदयांशकाः ।
एकेना सप्तः चांकाश्र्च (७,९) व क्रा वक्र क वे र्मताः । ८२ ।
सूक्ष्म गणितज्ञों ने पूर्व कथित गुरु आदि ग्रहों के उदय और अस्त अंश से
एक कम उदयास्त की संख्या इस विधि से बतायी है । इसके अनुसार गुरु का
१०, बुध का १२, शनि का १४, मंगल का १६, वक्री शुक्र का ७, मार्गी शुक्र का
९ उदय और अस्तांश होगा ।
नास्ते वास्त वमस्त मस्तिहि समास्ता नामधस्तात् पुरः
पश्चादूर्द्धनभस्तल स्थित रवि श्रान्तं यदेषां भ्रमात् ।
सद्योत द्युति भाञ्जि भान्य पटुभिः प्रद्योतन ज्योतिषां
लक्ष्यन्तेक्षिषि ऋक्षराड् गुरु सिता लक्ष्या दिवासौक्ष्मयतः । ८३ ।
किसी ग्रह का वास्तव में अस्त या लोप नहीं है । ग्रह भ्रमण के क्रम में सदा
पूर्व, पश्चिम, ऊपर या नीचे आते रहते हैं । सूर्य की तेज किरण से आंख स्तम्भित
होने के कारण यह तारा ग्रह आदि खद्योत की भांति प्रकाश हीन हो नहीं दीखते
हैं । बिम्ब बड़ा होने के कारण चन्द्र, वृहस्पति और शुक्र दिन में भी दीखते हैं ।
भानोरुद्गमः पुरोऽस्तमयत: पश्चात्प्रका शोऽम्बरे
दृश्यः स्यात् समयांशकै र्दल युतै र्व्यक्षे हि पक्षाक्षिमः (२२।३०)
अन्यत्रत्रिगुणा हतैः स्फुर वितै र्लम्बज्यया भाजितैः
पूर्णेन्दोर्वसुभिः (८) कलाक्षयवशादल्पै शृंगोरिन्दुना । ८४ ।
उदय होने के पहले और अस्त होने के बाद निरक्ष देश में (विषुव रेखा पर)
२२°।३०' कालांश में आकाश में निश्चित रूप से सूर्य का प्रकाश तेज होता है ।
अन्य स्थानों पर इस २२।३० कालांश को त्रिज्या से गुणा कर अपने स्थान की
लम्बज्या से भाग देने पर जो कालांश आयेगा उतने दूर तक सूर्य का प्रकाश तीव्र
होगा ।
निरक्ष देश में पूर्ण चन्द्र विम्ब उदय होने के पहले और अस्त होने के बाद
८ कालांश में उसका प्रकाश तेज होता है । शुक्र का निरस देश में १ कालांश
तक तेज प्रकाश होता है । इनका भी अपने स्थान पर कालांश जानने के लिए
निरक्ष कालांश को त्रिज्या से गुणा कर अपने स्थान की लम्बज्या से भाग देंगे ।
वन्दोम हे हरिहय द्रुहिणाहिराज हेरम्ब शम्बर हरारि हिमांशु हंसैः।
अहा॑स्पती कृत पदाम्बुरुहं सहस्रं वारान्महेन्द्र मणिहारि महो महीयः । ८५ ।
जिस कां तेज इन्द्र की मणि के समान हैं, जिसके चरण कमल ब्रह्मा, वासुकि,
गणेश, शिव, चन्द्र और सूर्य वन्दना करते हैं, उस परम पूज्य जगन्नाथ के तेज
ग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २१९
को मेरा हजारों प्रणाम हैं ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतेगणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
सास्तो दयो व्यरचि विश्व (१३) मितः प्रकाशः । ८६ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिये सिद्धान्त दर्पण में
उदय और अस्त सम्बन्धी १३ वां प्रकाश लिखा गया ।
चतुर्दश प्रकाश
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम्
शृङ्गोन्नतिं विधोर्वक्ष्ये सनित्यास्त मतयोदयाम् ।
दृक् सिद्धां वासनावद्भिः सबोधां छेदकान्विताम् । १ ।
सूक्ष्म ज्ञानियो के बोध के लिए चन्द्रमा के स्फुट दैनिक उदय अस्त, शृंगोन्नति
तथा परिलेख के बारे में कह रहा हूँ।
उदयास्त मयौ नित्या वानेयौ प्रथमं विधोः ।
दृक् कर्म द्वय संस्कार स्पष्ट सूक्ष्मेन्दु भास्वताः । २ ।
सूर्यास्त के कितने समय बार चन्द्रास्त होगा यह निकालने की विधि-पहले
चन्द्रमा का उदय और अस्तकाल निकालना चाहिये । सूर्यास्त समय में सूक्ष्म चन्द्र
और स्फुट रवि का साधन कर उन्हें सायन कर दृक् कर्म संस्कार करेंगे ।
अयनांशैः संस्कृतयोः सूर्यास्त समयोत्थयोः
सषड् भयोः काल लवाः साध्या लग्नान्तरासुभिः । ३ ।
सायन और दृक् कर्म संस्कृत सूर्यास्त कालीन रवि और चन्द्र में ६ राशि
जोड़कर उनके लग्न अन्तर असु से कालांश का साधन करेंगे ।
तयोरूनस्य भोग्यासून भुक्तासनधिकस्य च ।
तदन्तरोत्य लग्ना सून् संयोज्याभ्र रसो (६०) द् धृतेः । ४ ।
रवि और चन्द्र में जिसकी राशि आदि कम है उसका भोग्य असु, अधिक
राशि वाले का भुक्त असु तथा मध्यवर्ती राशियों के उदय असु जोड़कर ६० से
भाग देंगे ।
स्युः स्फुटान्तर कालांश रसा (६) प्ता घटिकादयः
तन्नाड़िका हते भुक्ति रवीन्दोः षष्टि भाजिते । ५ ।
फल रवि और चन्द्र का स्फुट अन्तर कालांश होगा । इसे ६ से भाग देने पर
घटी आदि फल होगा जिसमें रवि और चन्द्र की गति से गुणा कर ६० से भाग
देंगे ।
तत्फलान्वितयो र्भूयः कर्तव्या विवरासवः
असकृत् कर्म भिस्तेतु स्थिराः स्युरवि चन्द्रयोः । ६ ।
कलादि फल को रवि और चन्द्र में जोड़ने से जो रवि और चन्द्र होगा पुनः
उनका अन्तर असु निकालेंगे । ऐसा बारबार करने से रवि और चन्द्र का अन्तर
असु स्थिर होगा ।
अत्र चन्द्रस्य दृक् कर्म द्वय कार्यं पुनः पुनः
यतः स्फुटेन्दोः पातस्य भेदाद् विक्षेप भिन्नता । ७ ।
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२१
इसके बाद चन्द्र का आयन और आक्ष दृक् कर्म बार-बार करना होगा नहीं
तो स्फुट चन्द्र और उसके पात के बीच की दूरी के कारण शर में भिन्नता होगी।
तदन्तरोत्थ प्राणेषु स्थिरे ष्वित्थं विधोः पुनः
नतिं वित्रिभ लग्नोत्थां स्फुटेषु दृष्टि कर्मणो । ८ ।
इस प्रकार रवि और चन्द्र का अन्तर असु स्थिर होने पर चन्द्र से तीन राशि
घटाकर उसका (वित्रिभ लग्न का) नत और शर निकाल कर उसका आयन और
आक्ष दृक् कर्म करेंगे।
कुर्यात् स्पष्ट गतीन्द्रां (१४) शस्त्रिज्याघ्नो लम्बयोद् धृतः
प्राणात्मक स्तदूनाः स्युर्दृक् सिद्धास्तेऽन्तरासवः । ९ ।
इसको पुनः सूक्ष्म करने के लिये ६ राशि युक्त रवि तथा चन्द्र में इसे जोड़कर
दोनों का अन्तर असु निकालेंगे। चन्द्र की स्फुट गति के १/१४ को त्रिज्या से गुणा
कर लम्बज्या से भाग देने पर चन्द्र का परम लम्बन असु आयेगा। इसे पहले
निकाले गये अन्तर से घटाने पर दृक् सिद्ध अन्तर असु होगा।
तैः प्राणैरस्त मेतीन्दूः शुक्रेऽर्कास्त मयात्परम्।
अत्रार्क सावनत्वं हि द्वयो स्तात्कालिकी कृतौ । १० ।
सूर्यास्त के इतने समय बाद चन्द्र का अस्त होगा। रवि और चन्द्र को
तात्कालिक करते समय असु को सावन तथा
तत्कृतौ केवल स्येन्दोः प्राणानामाक्षैता मंंता
सूर्यास्त कालिकौ तौ चेद् ग्राह्यौ ते चन्द्र सावना । ११ ।
केवल चन्द्र को तात्कालिक करते समय असु को नाक्षत्र (अर्थात् नाक्षत्र दिन
का २१,६०० भाग) मेरे मत के अनुसार माना जायेगा। सूर्यास्त काल में रवि और
चन्द्र निकालने के समय असु चन्द्र सावन (दिन का २१,६५९ भाग) होगा।
भगणार्द्धं रवे दत्वा कार्यास्थद् विवरासवः
तैः प्राणैः कृष्ण पक्षेतु शीतांशु रुदयं ब्रजेत् । १२ ।
कृष्ण पक्ष में सूर्यास्त कालिक रवि का साधन कर उसमें ६ राशि जोड़ेगे।
इस रवि और चन्द्र का अन्तर असु निकालेंगे। सूर्यास्त के इतने असु आदि समय
बाद चन्द्र उदय होगा।
अत्राप्यर्कास्त कालोत्थौ रवीन्दुदृक् क्रिये विधोः
उदयेल्लम्बना सूनां धनत्वं स्थिरतोक्तवत् । १३ ।
यहां भी सूर्यास्त समय के रवि और चन्द्र दोनों का दृक् कर्म संस्कार करना
पड़ेगा। उदय के समय लम्बन असु जोड़ना होगा और बार बार यह किया कर
रवि और चन्द्र के अन्तर असु का मान स्थिर करेंगे।
२२२ सिद्धान्त दर्पण
उदयेस्तमये वापि स्वदिने यत्र कुत्रवा
यदादृक् चन्द्रमा साध्य स्तदायं क्रम उच्यते । १४ ।
सूर्य अस्त, या इष्ट काल में भू पृष्ठ पर दृश्य चन्द्र निकालने की विधि कही
जाती है ।
षष्ठ प्रकाश विधिना कृत्वा सूक्ष्म स्फुटं विधुम् ।
स्वेष्ट कालिक मानीय पूर्वा पर कपालयो । १५ ।
६ ठे प्रकाश में कही गयी विधि से स्फुट चन्द्र निकालनेंगे । इसे पूर्व तथा
पश्चिम कपाल का इष्टकालिक चन्द्र करेंगे ।
लग्नं तात्कालिकं कृत्वा वित्रिभं दृग् गतिं ततः ।
नतज्यां प्राक् परोद्भूतां सा दृक् गति गुणाहताः । १६ ।
इष्ट काल का लग्न, वित्रिभ लग्न तथा वित्रिभ शंकु निकालेंगे । पूर्व या
पश्चिम-जिस कपाल में चन्द्र है उसकी दृग्ज्या निकाल उसे दृग् गति (वित्रिभ
शंकु) से गुणा करेंगे तथा-
त्रिज्याप्ता द्येन्दु भुक्तिघ्नी मनु (१४) घृतत्रिज्या (४८१३२) हृता
फल लिप्ता युतोनःस्याद् वित्रिभोदयतो विधुः । १७ ।
त्रिज्या से भाग देंगे । लग्न को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा कर १४ x
३४३८ (१४ x त्रिज्या) से भाग देने से कला आदि फल होगा उसे चन्द्र में जोड़ेगे
या घटायेंगे यदि वित्रिभ लग्न से चन्द्र-
प्राक् प्रत्यक् स्थस्ततः प्राग्वन्नतिस्थ संस्कृतात् शरात्
दृक् कर्मान साक्षञ्च स्यात्ततोदृग् विधुर्भवत् । १८ ।
पूर्व या पश्चिम कपाल में स्थित हो । इससे इष्टकाल का लम्बन संस्कृत चन्द्र
आयेगा । इसके बाद पहले की तरह पुनः चन्द्र नति का साधन करेंगे । इस नति
से शर का संस्कार कर स्फुट शर निकाल कर उसका आयन और आक्ष दृक् कर्म
निकालते हैं । इससे लम्बन संस्कृत चन्द्र का संस्कार करने से समप्रोत वृत्तीय
होगा जो भूपृष्ठ से दीखता है ।
शृंगोन्नति द्विधा शुक्ल कृष्ण भेदात्तयोः सिता
दृश्यत्वात् सम्मता सर्वै कैश्चित् कृष्ण नुमानतः । १९ ।
चन्द्रमा के श्रृंग (सींग) की दो प्रकार की उन्नति (शृंगोन्नति) होती है ।
सामान्यतः शृंगोन्नति की अर्थ धवले श्रृंग की उन्नति होती है । परन्तु कुछ विद्वान
कृष्ण शृंगोन्नति की भी कल्पना करते हैं (यह दीखता नहीं है गणना द्वारा जाना
जाता है )
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२३
चन्द्रोदय द्वयान्तः स्थोऽहोरात्रश्चान्द्र सावनः
क्रान्तेस्तद्दिन मानञ्च माध्यमिष्टं नतं ततः । २० ।
चन्द्र के उदय के दूसरे उदय तक का समय चन्द्र सावन दिन कहा जाता
है । चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का साधन कर उससे इष्ट नत काल पूर्व राति से
निकालते हैं ।
पूर्वार्द्धे शुक्ल पक्षस्य कृष्ण स्यान्त्य दले विधोः
शुक्ला शृंगोन्नतिः कृष्णा कृष्ण शुक्ल मुखान्तयोः । २१ ।
शुक्ल पक्ष के पूर्वार्द्ध (प्रति पदा से ७ मीपर्यन्त) और कृष्ण पक्ष का उत्तरार्द्ध
(९ मी से १४ शी पर्यन्त) शुक्ल श्रृंग की उन्नति निकाली जाती है । इसी प्रकार
कृष्ण पक्ष का पूर्वार्द्ध तथा शुक्ल पक्ष के उत्तरार्द्ध में कृष्ण श्रृंग की उन्नति निकाली
जाती है । शुक्ल या कृष्ण जो भाग आधा से कम हो उसकी उन्नति निकाली
जायेगी ।
विमण्डलं स्थिते चन्द्र मण्डले कांश संक्रमात्
अपवृत्त स्थिति भवा द्विविधा कृति सम्भवः । २२ ।
विमण्डल वृत्त में स्थित चन्द्र पर क्रान्ति वृत्त से स्थित सूर्य की किरण पड़ने
से चन्द्र का अनेक प्रकार का आकार दीखता है ।
अप्यर्कात्समदूरस्थ मिन्दु शृंगद्वयं सदा
देशान्तर वशाद् वक्रं तार तम्येन दृश्यते । २३ ।
चन्द्र का दोनों शृंग रवि से समान दूरी पर रहने से भी देशान्तर के कारण
वह कम या अधिक होते हैं । तिरछा दीखते हैं ।
सौम्यायनान्तगो भानु र्दिनार्द्धे मस्तको परि
दृश्यते यत्र तद्देशे मेषादिस्थे विवस्वतिः । २४ ।
जिस स्थान में दिनार्द्ध में सायन मिथुन अन्त का सूर्य ठीक सिर के ऊपर
हो (अक्षांश परम उत्तर क्रान्ति के समान वहां सायन मेषादि का सूर्य-
सममण्डल वद् दृश्यं दिवसान्तेऽपमण्डलम् ।
तत्राविक्षिप्त शीतांशु प्राक् गतिः सरलेक्ष्यते । २५ ।
सूर्यास्त के समय पूर्वापर वृत्त की तरह दिखेगा । उस स्थान में शरहीन चन्द्र
की गति अत्यन्त सरल पूर्व दिशा में होगी ।
समता शृंगयोस्थस्मात् क्रान्ति वृत्त क्रमाद् भवेत् ।
सन्निवेशो गतिश्चन्द्रोः किन्तु भेदः शरोद् भवः । २६ ।
इससे पता चलता है कि क्रान्ति वृत्त की स्थिति के अनुसार चन्द्र का स्थान,
शृंग और गति होती है । इसमें भी शरभेद के कारण भिन्नता होती है ।
२२४
सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र ग्रहण वत्साध्य मत्राणि वलन द्वयम्
आयनं फलजं स्पष्टं वैक्षेपरूप्य मिहोच्यते । २७ ।
चन्द्र ग्रहण के समान चन्द्र शृंगोन्नति साधन में भी आयन और आक्ष वलन
का साधन किया जाता है ।
चन्द्रार्कान्तर जीवास्मिन् कोटीर्विक्षेपको भुजः
दोः कोटीवर्गयो र्योगात् पदं स्यात् कर्णसंज्ञकम् । २८ ।
शरवलन की विधि- (१) रवि और चन्द्र के अन्तर चाप की ज्या कोटि (२)
चन्द्र की शरज्या का भुज और (३) इन दोनों के वर्ग योग का मूल-कर्ण इस
त्रिभुज में-
त्रिज्या भुजघ्नी कर्णाप्ता फलं चापी कृतं कलाः
षष्ट्याप्ता वलनांशाः स्यु विक्षेपास्तेंऽगुलात्मकाः । २९ ।
त्रिज्या को शर से गुणा कर्ण से भाग देने पर जो फल आयेगा उस चाप की
कला करेंगे । उसे ६० से भाग देने पर अंगुल में शर का वलनांश आयेगा ।
ख वृत्तमादौ पूर्वोक्तमं दिक् चिह्नितं लिखेत्
षडंगुलं गुणेनेन्दुं तन्मध्ये द्वादशांगुलम् । ३० ।
ग्रहण के परिलेख में जितने व्यासार्द्ध का ख वृत्त खींचा जाता है उतने ही
व्यासार्द्ध का यहां भी ख वृत्त बना कर उसमें दिशा का अंकन करेंगे । इसमें भी
६ अंगुल व्यासार्द्ध का चन्द्रमण्डल लिखेगें उसका व्यास १२ अंगुल का होगा) ।
ख वृत्ते वलनं स्पष्टं प्राच्यां प्राक् स्थे सदिश्यदः ।
इन्दौ प्रत्यक् कपालस्थे पश्चाद्दिग् भेद तोन्यसेत् । ३१ ।
चन्द्र पूर्व कपाल में रहने पर चन्द्र का स्फुट वलन पूर्व विन्दु में तथा पश्चिम
कपाल में रहने पर पश्चिम विन्दु से स्फुट बल की दिशा के अनुसार उत्तर या
दक्षिण में अंकित करेंगे ।
तच्चिह्नतः सौम्य याम्य वैक्षेप वलनांगुलम् ।
दिग्वैपरीत्यतो न्यस्येत् कपाल द्वितयेऽप्यदः । ३२ ।
स्फुट वलनाग्र चिह्न से शर का वलन, वलन की विपरीत दिशा में (स्फुट
वलन उत्तर होने पर शर वलन दक्षिण आदि) दोनों कपाल में देंगे ।
तदग्रस्थायिनं विंदुं निश्चित्यार्कतयोततः
सूत्रं प्रसारितं चन्द्र बिम्ब मध्यान्त मानयेत् । ३३ ।
शर वलन के अग्र बिन्दु को सूर्य मान कर उससे चन्द्र बिम्ब के केन्द्र तक
एक सरल रेखा खींच कर बढ़ायेंगे ।
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२५
तत्सूत्र बिन्दु बिम्बान्तं यत्र स्पृशति सूर्यतः
ज्योत्सोत्पत्ति क्षयौ तत्र भवेतां पर्व सन्धिजौ । ३४ ।
यह रेखा चन्द्र बिम्ब परिधि को जहां काटेगी वहीं पर सूर्य के कारण प्रकाश
और छाया की सन्धि होगी ।
चन्द्रार्कान्तर जा लिप्ताः ख ख नन्दं हृताः फलम्
शुक्लांगुलं तदिन्द्वन्ता दन्तर्देयं रवेर्दिशः । ३५ ।
रवि और चन्द्र की अन्तर कला को ९०० से भाग देने पर शुक्लांगुल होगा ।
चन्द्र बिम्ब से उस रेखा (चन्द्र बिम्ब केन्द्र से शरवलन के अग्र बिन्दु सूर्य तक)
पर रवि की दिशा में-
शुक्लाग्रे विन्यसेद् बिन्दु मथ सूर्यात् ख वृत्त के
नवत्यं शान्तरे बिन्दू पार्श्व योर्स्य तद् युगात् । ३६ ।
वलनाश्रित वृत्त में सूर्य चिह्न के दोनों तरफ (९०) अंश की दूरी पर दो विन्दु
देंगे । इन दोनों विन्दुओं से भी-
प्राग् वत्सूत्रे प्रसार्यैन्दौ तत्स्पर्श स्थानयो रुभे
बिन्दुं दत्वा लिखेद् विन्दु त्रयाहन्तुत्रयं विधुः । ३७ ।
पहले के समान चन्द्र केन्द्र तक रेखा खींचे पर वह चन्द्र मण्डल को जिन
दो विन्दुओं पर काटेगी वहां भी दो विन्दु देंगे । इन दोनों बिन्दुओं तथा चन्द्र
मण्डल का केन्द्र -इन तीन बिन्दुओं से-
पञ्चाङ्गुल गुणेनात्र स्यातां मत्स्यौ तदन्तरे-
तत्पुच्छ मुखं संसक्त सूत्रयोर्यत्र संयुतिः । ३८ ।
प्रत्येक से ५ अंगुल व्यासार्द्ध का तीन वृत्त खींचेंगे । इन तीन वृत्तों के मिलन
से दो मत्स्याकृति होगी । दोनों मत्स्यों के मुख और पुच्छ को मिलाने वाली रेखा
जहां काटेगी ,
ततो बिन्दु त्रय स्पर्शि धनुश्चन्द्रान्तरे लिखेत्
तस्मात् बिम्बान्तर स्थानं शुक्ली कृत्येष्यतां विधुम् । ३९ ।
उस विन्दु को केन्द्र मानकर तीन बिन्दुओं से होकर वृत्त चाप खींचेंगे । इस
चाप से सूर्यचिह्न की दिशा में चन्द्र बिम्ब का जो भाग है वह प्रकाशित दिखायी
देगा ।
प्रत्यक् स्थे शुक्ल पक्षेस्मिन् कृष्णे चन्द्रे पुर स्थिते
तदर्कान्तर लिप्ताभ्यो वलनार्क दिशोद्युतेः । ४० ।
शुक्ल पक्ष में पश्चिम कपाल एवं कृष्ण पक्ष में पूर्व कपाल में रवि और चन्द्र
की अन्तर कला के कारण वलन अग्र से रवि चिह्न की तरफ-
२२६ . सिद्धान्त दर्पण
व्याप्त्यर्थथोदिता तद्वत् प्राक् प्रत्यक् स्थेसितेऽसिते ।
वलनात्मार्कतः कार्यः शुक्ल स्या व्याप्ति निर्णयः । ४१ ।
जिस प्रकार प्रकाशित भाग रहता है उसी प्रकार शुक्ल पक्ष में शर्वकपाल में
और कृष्ण पक्ष में पश्चिम कपाल में वलनाग्र गति रवि चिह्न से अन्धकार मय क्षेत्र
होगा ।
अर्द्धोनेन्दो सिते पक्षे प्रत्यग् भितो विलिख्यताम् ।
छेदकं दर्शयेच्छृंगं मुन्नतं सौम्य याम्यगम् । ४२ ।
शुक्ल पक्ष से आधा से कम चन्द्रमा का परिलेख (नकशा) पहले की भांति
पश्चिम दिशा में स्थित दीवाल पर लिख कर उत्तर या दक्षिण की तरफ झुका हुआ
श्रृंग लोगों को दिखाना पड़ेगा ।
प्राग् भित्तौ कृष्ण पक्षान्तेऽप्यथ्यार्द्धाधिक शीतगोः ।
उन्नयेदसिता श्रृंगोन्नतिं तद् वलनार्कतः । ४३ ।
कृष्ण पक्ष में यह नक्शा (परिलेख या छेद्यक) पूर्व दिशा में स्थित दीवाल
पर लिखकर उतर या दक्षिण की तरफ झुका श्रृंगा दिखलाया जायेगा । आधा से
अधिक प्रकाशित चन्द्र बिम्ब का (ऊपर लिखा हुआ) वलनाग्र रविचन्द्र से कृष्ण
श्रृंग की उन्नति होगी) ।
सिद्धान्त क्रमतः प्रोक्त श्चन्द्रेऽसौ सैत्य संक्रमः ।
अथयुक्ता नुभूतिभ्यां प्रसिद्धोऽत्रानुवर्ण्यते । ४४ ।
प्राचीन सिद्धान्त ग्रन्थ के अनुसार चन्द्र बिम्ब का शुक्ल भाग निकालने की
विधि कही गयी । अब मेरे अनुभव तथा तर्क के अनुसार दृक् सिद्ध और सूक्ष्म
शुक्ल साधन करने की रीति वर्णन करता हूँ ।
चन्द्र योजन कर्णघ्नी व्यर्केन्दु ज्यार्क कर्णहृत्
तत्कालाढ्योयोनितः कार्ये ग्लौ शुक्ला शुक्ल पक्षयोः । ४५ ।
चन्द्रमा से सूर्य का राशि आदि घटाकर शेष की भुजज्या को चन्द्र के योजन
कर्ण से गुणा कर रवि योजन कर्ण से भाग देने पर कला आदि फल होगा उसको
शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा में जोड़ेंगे तथा कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा से घटायेंगे ।
तस्य सूक्ष्म स्फुटेन्दोर्या व्यर्क स्योत्क्रम दोर्ज्यका
सा गुणाद्रि शरै (५७३) र्भक्ता लब्धं शुक्लांगुलादिकम् । ४६ ।
यह स्फुट चन्द्र होगा । रवि की राशि आदि पुनः इस स्फुट चक्र से घटाकर
शेष की उत्क्रम ज्या निकालें । शेष को ५७३ से भाग दे कर लब्धि अंगुल आदि
फल होगा ।
अर्द्धो नेन्दो श्चैतत्स्यात् कृष्ण मर्द्धा धिकस्य च
क्षीणे शुक्लांगुलं देयं द्वादशां गुल मण्डले । ४७ ।
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२७
आधे से कम होने पर शुक्ल भाग का तथा आधे से अधिक शुक्ल चन्द्र बिम्ब
होने पर यह कृष्ण भाग का अंगुलादि फल होगा । आधा से कम चन्द्र बिम्ब शुक्ल
होने पर १२ अंगुल चन्द्र बिम्ब में शुक्लां गुल दिया जायेगा ।
पुष्टे षडंगुला प्रोज्झ्य कृष्णं शिष्टं सितांगुलम्
भोज्यं बिम्बदले चेत्स्याद् वलनार्क दिशः स्फुटः । ४८ ।
चन्द्रमा का आधा से अधिक शुक्ल बिम्ब होने पर कृष्ण अंगुलादि ६ अंगुल
से घटाकर शेष शुक्ल अंगुल को यदि बिम्बार्द्ध ६ अंगुल में जोड़ेगे तब वलन के
अग्र बिन्दु से रवि की दिशा में-
आकार चन्द्रबिम्बस्य प्राग् वद् बिन्दु त्रयोद् भवात् ।
मत्स्यद्वयात् सूत्र सत्तात् सिद्धः साक्षात् सलक्ष्यते । ४९ ।
पहले की तरह तीन बिन्दुओं से दो मीन बनाकर मुख पुच्छ रेखा के मिलन
बिन्दु केन्द्र से वृत्त खींचेगे ।
सार्द्धांगुलाल्प शुक्रस्य शृंगान्तवति सौक्ष्म्यतः
न दृश्यौ दर्शनं तद् वत् सम्भवैत दुपान्तयोः । ५० ।
डेढ़ अंगुल से कम शुक्ल बिम्ब नहीं दिखायी देता है । क्योंकि शृंग का प्रान्त
भाग अत्यन्त पतला होता है । अवश्य शृंग के अग्र भाग के निकट थोड़ा शुक्ल
दिखायी देता है ।
कला वृद्धि क्षया वस्य दृश्यतां परिलेख के
शुक्ल पक्षस्य पादान्ते सूर्यास्त मय कालिकः । ५१ ।
चित्र, परिलेख (नक्शा या छेदक) बनाकर चन्द्र कला की वृद्धि और क्षय
दिखाना होगा । शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को सूर्यास्त के समय
चन्द्रेऽर्कोङ्गुलकोलेख्य उत्तरास्येन भूतले ।
तन्मध्येदिक्षु कोणेषु देयं रेखा चतुष्टयम् । ५२ ।
उत्तर की दिशा में मुंह कर भूपृष्ठ पर १२ अंगुल व्यास का चन्द्र बिम्ब लिखेंगे ।
उसमें दिशाओं और कोणों के बीच चार व्यास रेखायें खींचेगे ।
तन्मध्यानां यथा योगो बिम्ब मध्ये भवेत्त था
चन्द्रात् पश्चिम गो दूरे कल्पनीयो दिवाकरः । ५३ ।
सभी चारों रेखायें परस्पर केन्द्र बिन्दु पर मिलेंगी और दो बराबर भागों में
विभाजित होंगी । चन्द्र बिम्ब से पश्चिम की तरफ दूरी पर सूर्य लिखेगें ।
बिम्बार्द्ध पश्चिमं भाव्य सातपं विन्दु रिन्दुतः
भू संज्ञः पञ्च हस्तान्ते देयोऽग्निदिशि दृष्टये । ५४ ।
इस सूर्य बिम्ब के कारण चन्द्र मण्डल का पश्चिम बिम्बार्द्ध शुक्ल होगा
२२८ सिद्धान्त दर्पण
ऐसी कल्पना की लायेगी शुक्ल भाग देखने केलिये चन्द्र बिम्ब केन्द्र से पाँच हाथ
की दूरी पर आग्नेय दिशा में भू बिन्दु देंगे ।
उत्तराशा महीविन्दोः कल्पनीयार्द्ध मम्बरम्
तिर्यक् स्थित्वात्नुः प्रेक्ष्यः समोऽपीन्दौ सदातपः । ५५ ।
इस भूविन्दु से ऊपर के आकाश को उत्तर दिशा मानेंगे । सूर्य बिम्ब से चन्द्र
बिम्ब का आधा हमेशा प्रकाशित रहने पर भी भू भाग से दीखने वाला बिम्ब
(दृश्य वृत्त) और शुक्ल वृत्त परस्पर तिरछा होने के कारण शुक्ल भाग आधा से बहुत
कम दीखता है ।
ईशान नैऋत दिशोरायता यात्र रेखिका
साज्ञेया भूस्थितैर्दृश्या चन्द्रमण्डल विस्तृतिः । ५६ ।
ईशान और नैऋत विन्दु गामी चन्द्र बिम्ब का व्यास भूविन्दु पर के लोगों को
निश्चय दीखेगा ।
दक्षिणोत्तर रेखान्त व्यापि पश्चिम शुक्लतः
अधः स्थो दक्षिणो भागो दृश्यता मेतियत् क्षितौ । ५७ ।
दक्षिण और उत्तर रेखा को स्पर्श करता हुआ पश्चिम आधा शुक्ल भाग का नीचे
का भाग भूबिन्दु से दीखेगा ।
तद् भूमेर्निर्गतं सूत्रं याम्य रेखाग्र संगतम्
लग्नं पश्चिम रेखान्ते नेऋतैशान्यरेखिकाम् । ५८ ।
अत भू केन्द्र से चन्द्र मण्डल के पश्चिम बिन्दु को स्पर्श करता हुआ सूत्र ईशान
नैऋत्यरेखा को
यत्र स्पृशत् ततस्तस्यां नैऋतान्तं सितस्थितिः ।
ऐशान्यान्तं सता भावः कर्ण सूत्रेण लक्ष्यते । ५९ ।
जहाँ स्पर्श करेगा वहां से उसी ईशान नैऋत्य रेखा से नैऋतचिह्न तक शुक्ल
रहेगा । ईशान दिशा के चिह्न तक शुक्ल का अभाव अर्थात् कृष्ण रहेगा । कर्ण
सूत्र से यह शुक्ल वृत्त पृथ्वी से दिखाई देता है ।
सार्द्ध राश्यन्तरेऽर्केन्दोः शास्त्रोक्त स्त्र्यंगुलः सितः
साक्षादत्रागतो यस्मात् पादोनद् व्यंगुला (१।४५) त्मकः । ६० ।
रवि और चन्द्र का अन्तर (४५°) होने पर ३ अंगुल प्राचीन शास्त्रों में माना
जाता है । यहां दिया हुआ परिलेख का कोण सूत्र में प्रत्यक्ष (१।४५) अंगुल ही
शुक्ल आता है ।
अतश्चन्द्रस्य सर्वत्र शौक्ल्यमुत्क्रम जीवया
साध्यं बुधैर्यतो दृश्यो गोलांशः कर्णवर्त्मना । ६१ ।
चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२९
अतः पण्डित लोग उत्क्रम ज्या द्वारा ही चन्द्र का शुक्ल परिमाण साधन करते
हैं । क्योंकि गोल वस्तु में कोई भी भाग दृक् सूत्र मार्ग में ही दिखाई देगा ।
एवं शुक्र ज्ञेयो शृंगे चक्रार्द्धान्तिक वर्त्तिनोः
यन्त्रेण विदुषा दृश्ये चन्द्र वद्दूर दर्शिनाः । ६२ ।
इसी प्रकार ज्योतिषी लोग दूर तीक्ष्ण यन्त्र द्वारा चन्द्र शृंग की तरह रवि के
समीप बुध और शुक्र का भी शुक्ल शृंग देखते हैं ।
वर्षेऽस्मिन् भारते सौम्य प्रायशः शृंगमुन्नतम्
कपाल द्वितये दृश्यं कदाचिद्दक्षिणं विधोः । ६३ ।
भारत वर्ष में प्रायः पूर्व और पश्चिम दोनों कपाल में चन्द्र का उत्तर शृंग उन्नत
दीखता है दक्षिण शृंग बहुत कम उन्नत होता है ।
छाया कर्ण वराद् विधो रवि शशि क्रान्त्यन्तरोत्थोदिता
या शृंगोन्नतिरादिभिः किममया साव्यज्य सिद्धेर्दृशः
यद् भानो विषुवस्थिते सितरुचेर्यान्यानन्त स्थितेः
खार्द्धं ध्रुवसूत्र खण्डित मिवावकं सदा लक्ष्यते । ६४ ।
प्राचीन आचार्य छाया वर्णन के लिये इष्ट काल के १२ अंगुल शंकु के छाया
कर्ण द्वारा रवि और चन्द्र की क्रान्ति का अन्तर निकालते थे और उससे चन्द्र की
शृंगोन्नति निकालते थे । यह विधि दृक् सिद्ध नहीं होने के कारण मैं ग्रहण नहीं
कर रहा हूँ, छोड़ देता हूँ । सूर्य विषुव रेखा के ऊपर रहने पर (सायन मेषादि का
तुलादि में रहने पर) साय मकर आदि के चन्द्र का बिम्बार्द्ध ख स्वस्तिक में
याम्योत्तर वृत्त (रेखा) द्वारा खण्डित दीखता है । अतः बिम्बार्द्ध शुक्ल दीखता है ।
व्यर्केन्दूत्क्रमदोर्ज्यकादिम गति क्षुण्णाक्षि बाणाम्बुधि-
त्रिग्रावेन्दु (१७३४५२) हता फलंश शभृतो ज्योत्स्नाकला बिम्बजा
अर्द्धोनस्य दलाधिकस्य तु दलं तद्विर्न मर्द्धान्वितं
प्राक् पश्चात् सित बिम्ब मान मुदितं लिप्तात्मकं दृक् समम् । ६५ ।
अतः सूक्ष्म चन्द्र से सूर्य घटा कर शेष की उत्क्रमज्या को चन्द्र की प्रथम
स्फुट गति से गुणा कर (१७३४५२) से भाग देने पर जो फल होगा, बिम्बार्द्ध से
चन्द्रमा का शुक्ल भाग उतने कला कम या अधिक होगा । इस शुक्ल कला को
बिम्बार्द्ध से कम चन्द्र रहने पर बिम्बार्द्ध से कम तथा बिम्बार्द्ध से अधिक चन्द्र
रहने पर बिम्बार्द्ध में जोड़ने पर शुक्ल बिम्ब का कलात्मक मान होगा । यह पूर्व
और पश्चिम दोनों कपाल में दृक् सिद्ध बिम्ब मान होगा ।
क्ष्माभू (११) काल लवान्तरेऽर्क शशिनोः शुभ्रांशु बिम्ब द्युतिः
प्रायेण क्षितिभृत् क्षपेशा (१७) विकला मानादूना बुधात्
२३० सिद्धान्त दर्पण
न्यूना यद् गुरु बिम्बतो भवति तद् व्यक्तौ तदस्तोदयौ
रुद्रां (१) शैर्नतु सिद्धतोऽपरमत द्योत प्रवेश क्रमात् । ६६ ।
सूर्य से चन्द्र ११ अंश दूर रहने पर इसका प्रकाश १७ विकला के बुध बिम्ब
से अधिक और वृहस्पति के तेजस्वी बिम्ब से कम होता है । अतः जो लोग ११
अंश दूरी (कालांश) पर चन्द्र का उदय और अस्त मानते हैं वह ठीक नहीं है ।
(प्राचीन आचार्य चन्द्र का उदयास्त कालांश १२° मानते हैं । कई ११° मानते हैं ।
किन्तु लेखक ११° तथा ११° के बीच मानते हैं ।
बिम्बस्याष्टोत्तर शत (१०८) लव प्रेक्ष्य ते शुक्लपक्षे
प्राक्तिष्यन्ते (१) तनुरपि विधोः षष्ठ भागश्चतुर्थ्याम्
पञ्चम्यन्तेऽङ्घ्रि रथ दशमी प्रान्तभागे त्रिपादाः
पक्षान्ते (१५)ऽर्द्धे (८) खिलदल भृति वैष्णवान्ते (११) ऽरसांशः । ६७ ।
शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के अन्त में चन्द्र मण्डल का १०८ भाग अति सूक्ष्म होने
पर भी दीखता है । उसी पक्ष की चतुर्थी तिथि के अन्त में उसका १/६ भाग शुक्ल
दीखेगा । पञ्चमी तिथि के अन्त में १/४ भाग शुक्ल होगा । दशमी तिथि के समाप्त
होने पर ३/२ भाग शुक्ल होगा । पूर्णिमा में पूर्ण बिम्ब शुक्ल होगा । अष्टमी तिथि
में आधा बिम्ब शुक्ल तथा एकादशी के अन्त में ५/६ भाग शुक्ल दीखेगा ।
क्षीरोदरोधसि धरो परि रोचमानः
सारो जबान्धवि सरोक्षत रोक्तिरोपात्
नारोप गोपन परोऽरिधरो विरोधि-
मारोत्थरोग निकरोपरतिं करोत । ६८ ।
समुद्र कूल (पुरुषोत्तम क्षेत्र में) शोभित जो सुदर्शन चक्र धारी श्री जगन्नाथ
सूर्यपुत्र यम के क्रोध से लोगों की रक्षा करते हैं, तथा काम जनित सभी रोगों का
नाश करते हैं, वे हमारी कामना जनित सभी व्याधि दूर करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
शृङ्गोन्नतिर्व्यगम दिन्द्र (१४) मितः प्रकाशः । ६९ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा
वास्तविक घटना के समान गणना के लिए तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे
सिद्धान्त दर्पण में चन्द्र शृङ्गोन्नति सम्बन्धी १४ वां अध्याय समाप्त हुआ ।
पञ्चदश प्रकाश
महापात वर्णन
यात्रादीनां शुभ फलं मलं कर्मणा सकृतानां
यस्मिन् भस्मी भवति गण का यत्र मुह्यन्ति भूयः
तं योगेन्द्रं विवरण जयाद्येषु सूर्योपराग
प्रख्यं वक्ष्याम्यह मिह महापात मातत्य तत्त्वात् । १ ।
सज्जनों के यात्रा, उपनयन, विवाह आदि के शुभ कर्म जिस महापात के
कारण भस्म हो जाते हैं, जिस महापात की चर्चा में सिद्धान्ती लोग भी भ्रमित हो
जाते हैं, और जिस महापात में योग में दान, जप और स्नान आदि का फल सूर्य,
ग्रहण के समान ही शुभ होता है । उसी महापात का वर्णन मैं विभिन्न शास्त्रों
के अनुसार कर रहा हूँ ।
वैधृत्य व्यतिपाताख्यौ भेद्यौ पातस्य कीर्त्तितौ
गोलायन क्रान्ति भेद सम्भवौ रवि चन्द्रयोः । २ ।
पाद दो प्रकार के हैं- वैधृति और व्यतीपात । सूर्य और चन्द्र दोनों की क्रान्ति
बराबर होने पर पात होता है । एक ही अयन में रहने पर (भिन्न गोल में) वैधृति
योग तथा भिन्न अयन और एक गोल में रहने पर व्यतीसपात होता है ।
स्याद् गोल सन्धिरर्केन्दो र्विषुवद् वलयस्थयोः
सन्धि रायन एव स्यात् परमापक्रम स्थयोः । ३ ।
रवि और चन्द्र विषुव वृत्त (बृहत् अहोरात्र वृत्त) में रहने पर दोनों की गोल
सन्धि होती है । दोनों परम क्रांति के स्थान पर रहने से उनकी अयन सन्धि होती
है ।
क्रान्ति साम्यं यदा भिन्नायनयोः एव गोलयोः ।
योगः स्याद् व्यति पातारूयं तदा चन्द्रविवस्वतोः । ४ ।
रवि और चन्द्र एक गोल तथा भिन्न अयन में रहने पर जब दोनों की क्रान्ति
बराबर हो तो व्यतीपात योग होता है ।
विभिन्न गोल यो रेकायनयोः क्रान्ति तुल्यता
यदा तदा वैधृतारूयः सम्भवेद् दृष्टि योगजः । ५ ।
रवि और चन्द्र भिन्न गोल में पर एक ही अयन में हों और क्रान्ति बराबर हो
तो वैधृति योग होता है । क्रान्ति समान होने पर परस्पर दृष्टि योग होता है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तुल्यांशु जाल सम्पर्का त्तयस्तु प्रवाहाहतः
तद् दृक् क्षेपोद् भवो वह्नि लोका भावाय जायते । ६ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) रवि और चन्द्र दोनों की समान क्रान्ति होने पर उनकी
२३२ सिद्धान्त दर्पण
समान दिशा (या शक्ति) की किरणों के संयोग से अग्नि प्रवाह होता है । जिससे
प्राणी जगत नष्ट होता है ।
विनाशायाति पातोऽस्यः लोकानाम सकृद् यतः
व्यतिपातः प्रसिद्धोऽतः संज्ञा भेदेन वैधृतिः । ७ ।
अति पात योग सदा अकल्याण कर और संसार का विनाश करने वाला
होता है । इसी के अन्य नाम व्यतीपात तथा वैधृति भी हैं ।
यत्कृष्णो दारुण वपु र्लोहिताक्षो महोदरः
सर्वानिष्ट करो रौद्रो भूयोभूयः प्रजायते । इति । ८ ।
प्रत्येक पात का वर्ण कृष्ण, शरीर अति भयंकर तथा आखें लाल होती हैं ।
ये दोनों अति प्रचण्ड हैं और प्रति मास ये दोनों उत्पन्न होते हैं । (मध्यम मान
की तुलना में स्पष्ट मान से पात होना अधिक अनिष्ट कारी होता है । (सूर्य सिद्धान्त
उद्धरण समाप्त)
चलांश संस्कृताकै र्न्दयोर्योगश्चक्रं यदा भवेत्
तदा सन्निहितो योगो वैधृत्यः पुनरेतयोः । ९ ।
अपनांस संस्कृत रवि और चन्द्र का राशि आदि का योग जब १२ राशि हो
तब वैधृति योग निकट होता है ।
योगात् षड् भवनान्यष्टा दर्श वास भवन्ति चेत्
व्यतिपातस्तदासन्नो भिन्न पादस्तयो स्तुतौ । १० ।
इसी प्रकार अपनांश संस्कृत रवि और चन्द्र आदि की राशि आदि का योग
६ राशि या १८ राशि होता है । तो व्यतीपात योग आसन्न होता है । रवि और
चन्द्र दोनों वृत्त के भिन्न पादों (९०°) में रहने पर ही पात होता है ।
प्रायः तत् सम्भवो मासे द्विर्भवेत् न क्वचिद् भवेत्
क्वचित्सन्निहिते काले द्विःस्याद् विक्षेप भेदतः । ११ ।
प्रायः प्रतिमास दोनों योग (वैधृति और व्यतीपात) एक एक बार होते हैं)
किसी किसी मास में बिल्कुल ही पात नहीं होता है । चन्द्रशर की उन्नता के
कारण कभी कभी जल्दी जल्दी पात होता है - तब एक मास में २ बार भी ये
पात होते हैं ।
पात सम्भव कालोत्थ योगान् वक्ष्येयनांशकैऽ
कली कृतैर्युगुणितैश्चक्र (२१,६०००) चक्रार्द्ध (१०,८००) जाः कलाः । १२
पात सम्भावना कला के समय होने वाले विष्कम्भक आदि योगों का विवरण
दे रहा हूँ। अयनांश को कला कर दो गुणा करते हैं । इसको चक्र कला (२१,६००)
तथा चक्रार्द्ध कला (१०,८००) में-
महापात वर्णन २३३
विलोम संस्कृता शक्रा धिकाश्चेत् चक्र शोधिताः ।
खखाष्टा (८००) प्ता गता योगा विष्कुम्भाद्याः सरूपकाः । १३ ।
विलोम संस्कार (अयनांश योग होने पर वियोग तथा ऋण होने पर योग)
करते हैं । फल (२१,६००) से अधिक होने पर उसमें चक्र घटाते हैं । शेष में
(८००) से भाग देने पर लब्धि विष्कुम्भ आदि से गत योग होगा । लब्धि में एक
जोड़ने पर -
वर्त्तमानस्ततः शेषात् षष्टिघ्नाखशराष्टभिः (८५०)
भाजितात् फल नाड्याद्या यदा सूक्ष्मा भवन्ति हि । १४ ।
वर्त्तमान योग की संख्या होगी । (८००) से भाग देने पर बचे शेष को ६०
से गुणा कर (८००) से भाग देने पर जितना नाड़ी आदि फल होगा उसे वर्तमान
योग में जोड़ने पर वह सूक्ष्म होता है ।
तदैवेन्दु शराभावे स्यान् मध्य समयः शरात्
प्राक् पश्चात् सम्भवेत्पातः साध्यताः प्रथमं ततः । १५ ।
इस समय चन्द्र का शर नहीं रहने पर पात का भी समय होता है । शर होने
पर इस समय से पहले या बाद में पात होता है । अतः पहले मध्यंम मान के
अनुसार क्रान्ति समान होने पर स्थूल पात का साधन करना चाहिये ।
अथेदानीं शुक्लं (२४) वृद्धौ तदीया (३) दम पादयो
भवति प्रायशो मध्य वैधृत्य व्यतीपातयोः । १६ ।
अभी (१८६८ ई.में) अयनांश २२° है । इस समय शुक्ल (२४ वां) तथा वृद्धि
(११ वां) योग में क्रमशः वैधृति ३ य पाद तथा व्यतीपात प्रथम पाद प्रायः पड़ता
है । अतः उस समय को इनका मध्य समय कहा जाता है ।
अतोऽनुमानाय तत्कालं चक्र चक्रार्द्धं जं यतेः ।
तद् योग दिनजौ कार्यों सूक्ष्मो सूर्य निशाकरौ । १७ ।
अतः शुक्ल योग और वृद्धि योग को चक्र (२१,६००) और चक्रार्द्ध (१०,८००)
का समय मान कर उस दिन का तात्कालिक सूक्ष्म सूर्य और चन्द्र साधन करेंगे ।
न्यूनाधिका विलिप्तासु तद् भुक्त्यन्तर भाजिताः
लब्धैर्दण्डादिभिः कालः पूर्वः कार्यो युतोनितः । १८ ।
(रवि और चन्द्र) दोनों का अयनांश संस्कार कर जोड़ेंगे । योगफल शुक्ल योग
में (२१,६००) कला से और वृद्धि योग में ( १०,८००) कला से कितना कम या
अधिक है यह ज्ञात करेंगे । इसको चन्द्र और रवि के गति अन्तर कला से भाग
देने पर लब्धि दण्ड आदि होगा । इस दण्ड आदि को पूर्व अनुमानित समय में
योग या वियोग करेंगे । (रविचन्द्र योग कला चक्र या चक्रार्द्ध से कम हो पर
योग अन्यथा वियोग)