सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ . सिद्धान्त दर्पण
व्याप्त्यर्थथोदिता तद्वत् प्राक् प्रत्यक् स्थेसितेऽसिते ।
वलनात्मार्कतः कार्यः शुक्ल स्या व्याप्ति निर्णयः । ४१ ।
जिस प्रकार प्रकाशित भाग रहता है उसी प्रकार शुक्ल पक्ष में शर्वकपाल में
और कृष्ण पक्ष में पश्चिम कपाल में वलनाग्र गति रवि चिह्न से अन्धकार मय क्षेत्र
होगा ।
अर्द्धोनेन्दो सिते पक्षे प्रत्यग् भितो विलिख्यताम् ।
छेदकं दर्शयेच्छृंगं मुन्नतं सौम्य याम्यगम् । ४२ ।
शुक्ल पक्ष से आधा से कम चन्द्रमा का परिलेख (नकशा) पहले की भांति
पश्चिम दिशा में स्थित दीवाल पर लिख कर उत्तर या दक्षिण की तरफ झुका हुआ
श्रृंग लोगों को दिखाना पड़ेगा ।
प्राग् भित्तौ कृष्ण पक्षान्तेऽप्यथ्यार्द्धाधिक शीतगोः ।
उन्नयेदसिता श्रृंगोन्नतिं तद् वलनार्कतः । ४३ ।
कृष्ण पक्ष में यह नक्शा (परिलेख या छेद्यक) पूर्व दिशा में स्थित दीवाल
पर लिखकर उतर या दक्षिण की तरफ झुका श्रृंगा दिखलाया जायेगा । आधा से
अधिक प्रकाशित चन्द्र बिम्ब का (ऊपर लिखा हुआ) वलनाग्र रविचन्द्र से कृष्ण
श्रृंग की उन्नति होगी) ।
सिद्धान्त क्रमतः प्रोक्त श्चन्द्रेऽसौ सैत्य संक्रमः ।
अथयुक्ता नुभूतिभ्यां प्रसिद्धोऽत्रानुवर्ण्यते । ४४ ।
प्राचीन सिद्धान्त ग्रन्थ के अनुसार चन्द्र बिम्ब का शुक्ल भाग निकालने की
विधि कही गयी । अब मेरे अनुभव तथा तर्क के अनुसार दृक् सिद्ध और सूक्ष्म
शुक्ल साधन करने की रीति वर्णन करता हूँ ।
चन्द्र योजन कर्णघ्नी व्यर्केन्दु ज्यार्क कर्णहृत्
तत्कालाढ्योयोनितः कार्ये ग्लौ शुक्ला शुक्ल पक्षयोः । ४५ ।
चन्द्रमा से सूर्य का राशि आदि घटाकर शेष की भुजज्या को चन्द्र के योजन
कर्ण से गुणा कर रवि योजन कर्ण से भाग देने पर कला आदि फल होगा उसको
शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा में जोड़ेंगे तथा कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा से घटायेंगे ।
तस्य सूक्ष्म स्फुटेन्दोर्या व्यर्क स्योत्क्रम दोर्ज्यका
सा गुणाद्रि शरै (५७३) र्भक्ता लब्धं शुक्लांगुलादिकम् । ४६ ।
यह स्फुट चन्द्र होगा । रवि की राशि आदि पुनः इस स्फुट चक्र से घटाकर
शेष की उत्क्रम ज्या निकालें । शेष को ५७३ से भाग दे कर लब्धि अंगुल आदि
फल होगा ।
अर्द्धो नेन्दो श्चैतत्स्यात् कृष्ण मर्द्धा धिकस्य च
क्षीणे शुक्लांगुलं देयं द्वादशां गुल मण्डले । ४७ ।