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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२१६ सिद्धान्त दर्पण
एवमन्येषु देशेषून्नतज्या क्रमतो बुधैः ।
उन्नत्योदयास्तां शा सूर्य खेटान्तरान्तरा । ६९ ।
अन्य स्थानों में भी उन्नत ज्या आदि निकाल कर सूर्य और ग्रह के बीच का
उदय और अस्त का क्षेत्रांश निकाला जा सकता है ।
स्फुटं ध्रुवांश लिप्ताभि रन्तरं सूर्य खेटयोः
यदातं समयं प्राग् वन्निश्चली कृत्य भुक्तिभिः । ७० ।
स्फुट उदयास्त काल की विधि-सूर्य और ग्रह का अन्तर पूर्वोक्त ध्रुवांश कला
के समान होने पर वही स्फुट समय होगा । इसको पूर्वोक्त रवि और ग्रह कला
द्वारा स्थिर करना होगा ।
शरादायन दृक् कर्म परमाक्षं विधाय च
तत्परस्पर संस्कारा धनर्णा शादिकं तथा । ७१ ।
शर से आयन और आक्ष दोनों दृक् कर्म संस्कार करेंगे । दोनों का परस्पर
धन या ऋण करने पर शेष फल धन या ऋण हो उसे
विकली कृत्य खेटार्क गत्यन्तर कलाहृतम् ।
वक्रि शुक्रज्ञ गत्यर्क गति योग विभाजितम् । ७२ ।
विकला कर सूर्य और ग्रह के गति अन्तर की कला से भाग देगे । ग्रह वक्री
होने पर ग्रह (बुध या शुक्र) और सूर्य की गति योग कला से भाग देंगे ।
दण्डादिकं फलं ग्राह्यं धने दृक् कर्मणि स्फुटे
समये पश्चिमास्तस्य योज्यं प्रागुदयस्य च । ७३ ।
दण्ड आदि फल को पूर्व में उदय या पश्चिम में अस्त समय में जोड़ेगे यदि
दृक् कर्म संस्कार में योग हुआ था ।
प्राक् प्रत्यगस्तोदयोस्त्या ज्यं दृक् कर्मणि तदृणे ।
पश्चादस्त मय प्रागुदययोस्त्याज्य मन्वयोः । ७४ ।
पूर्व में अस्त होने पश्चिम में उदय होने पर उसे वियोग करेंगे । यदि स्फुट
दृक् कर्म घटाया गया था तो इस दण्ड आदि फल को पूर्व में उदय और पश्चिम
में अस्त समय से घटायेंगे ।
योज्य मेवं स्फुट तमः कालः स्यास्तदुदयास्तयोः ।
स च भुक्ति वशाज् ज्ञेयः स्फुट चक्रार्द्ध चक्रयोः । ७५ ।
(स्फुट दृक् कर्म ऋण होने पर) पूर्व के अस्त तथा पश्चिम के उदय समय
में इसे जोड़ेंगे । इस प्रकार ग्रह का उदयास्त समय अति स्फुट होगा । इस प्रकार
अति स्फुट समय ग्रह की चक्रार्द्ध और चक्र स्फुट के समय की ग्रह की गति के
कारण है ।