सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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अंश की कला होगी उसमें रवि और ग्रह के स्फुट गति अन्तर या गति योग से
भाग देंगे । फल जितना दिन आदि होगा, चक्रार्द्ध से उतने दिन पहले उदय
होगा । इससे पुनः वास्तविक उदय अस्त समय निकाला जा सकता है ।
किन्तुक्तवाः पटुं चक्षुर्भि गुर्वाद्यस्तोदयांशकाः ।
एकेना सप्तः चांकाश्र्च (७,९) व क्रा वक्र क वे र्मताः । ८२ ।
सूक्ष्म गणितज्ञों ने पूर्व कथित गुरु आदि ग्रहों के उदय और अस्त अंश से
एक कम उदयास्त की संख्या इस विधि से बतायी है । इसके अनुसार गुरु का
१०, बुध का १२, शनि का १४, मंगल का १६, वक्री शुक्र का ७, मार्गी शुक्र का
९ उदय और अस्तांश होगा ।
नास्ते वास्त वमस्त मस्तिहि समास्ता नामधस्तात् पुरः
पश्चादूर्द्धनभस्तल स्थित रवि श्रान्तं यदेषां भ्रमात् ।
सद्योत द्युति भाञ्जि भान्य पटुभिः प्रद्योतन ज्योतिषां
लक्ष्यन्तेक्षिषि ऋक्षराड् गुरु सिता लक्ष्या दिवासौक्ष्मयतः । ८३ ।
किसी ग्रह का वास्तव में अस्त या लोप नहीं है । ग्रह भ्रमण के क्रम में सदा
पूर्व, पश्चिम, ऊपर या नीचे आते रहते हैं । सूर्य की तेज किरण से आंख स्तम्भित
होने के कारण यह तारा ग्रह आदि खद्योत की भांति प्रकाश हीन हो नहीं दीखते
हैं । बिम्ब बड़ा होने के कारण चन्द्र, वृहस्पति और शुक्र दिन में भी दीखते हैं ।
भानोरुद्गमः पुरोऽस्तमयत: पश्चात्प्रका शोऽम्बरे
दृश्यः स्यात् समयांशकै र्दल युतै र्व्यक्षे हि पक्षाक्षिमः (२२।३०)
अन्यत्रत्रिगुणा हतैः स्फुर वितै र्लम्बज्यया भाजितैः
पूर्णेन्दोर्वसुभिः (८) कलाक्षयवशादल्पै शृंगोरिन्दुना । ८४ ।
उदय होने के पहले और अस्त होने के बाद निरक्ष देश में (विषुव रेखा पर)
२२°।३०' कालांश में आकाश में निश्चित रूप से सूर्य का प्रकाश तेज होता है ।
अन्य स्थानों पर इस २२।३० कालांश को त्रिज्या से गुणा कर अपने स्थान की
लम्बज्या से भाग देने पर जो कालांश आयेगा उतने दूर तक सूर्य का प्रकाश तीव्र
होगा ।
निरक्ष देश में पूर्ण चन्द्र विम्ब उदय होने के पहले और अस्त होने के बाद
८ कालांश में उसका प्रकाश तेज होता है । शुक्र का निरस देश में १ कालांश
तक तेज प्रकाश होता है । इनका भी अपने स्थान पर कालांश जानने के लिए
निरक्ष कालांश को त्रिज्या से गुणा कर अपने स्थान की लम्बज्या से भाग देंगे ।
वन्दोम हे हरिहय द्रुहिणाहिराज हेरम्ब शम्बर हरारि हिमांशु हंसैः।
अहा॑स्पती कृत पदाम्बुरुहं सहस्रं वारान्महेन्द्र मणिहारि महो महीयः । ८५ ।
जिस कां तेज इन्द्र की मणि के समान हैं, जिसके चरण कमल ब्रह्मा, वासुकि,
गणेश, शिव, चन्द्र और सूर्य वन्दना करते हैं, उस परम पूज्य जगन्नाथ के तेज