सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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उर्ध्व गानां ग्रहक्षाणामदृष्टौ कारणं यतः
खरांशु किरण व्याप्तिः साहि दृङ् मण्डलानुगा । ४५ ।
ग्रह और तारा गण क्षितिज के ऊपर रहने पर भी नहीं दीखते हैं उसका एक
मात्र कारण है कि उस समय सूर्य का प्रकाश व्याप्त रहता है । सूर्य की किरण
दृग् मण्डल में होने के कारण-
दृङ् मण्डल लवास्त्रिज्या हता लम्बज्यया हृताः
त्रिज्याघ्ना द्विज्यया भक्त्याः फलांशाः सूर्यतः स्फुटाः । ४६ ।
सूर्य के दृग् मण्डलीय उन्नतांश को नतज्या से गुणा कर लम्ब ज्या से भाग
देते हैं । फल को पुनः त्रिज्या से गुणा कर द्युज्या से भाग देते हैं । फल सूर्य से
ताराओं का स्फुट कालांश होगा ।
दृङ् मण्डलांश कालांश भेदस्तस्मादनल्पकः
भवेन्निरक्ष देशेऽपि द्युज्या त्रिज्यान्तरन्मितः । ४७ ।
इसका अर्थ है कि दृङ् मण्डलीय अंश और कालांश में पर्याप्त अन्तर होता
है । निरक्ष देश में (विषुव वृत्त पर) भी यह अन्तर द्युज्या और त्रिज्या के अन्तर
के बराबर है । अन्य स्थान पर यह और अधिक है ।
रसांगा (६६) क्षांशके देशे मेष मासे झषस्तयोः
उद्यतोः सह सूर्येण क्षितिजे गुरु शुक्रयोः । ४८ ।
(उदाहरण स्वरूप) जिस स्थान का अक्षांश ६६ है, वहां मेष मास में (जब
रवि मेष राशि में है) मीन राशि का गुरु और शुक्र - ये रवि के साथ ही उदय
होते हैं ।
भास्वतो दूर वर्तित्वात् सिद्धे दर्शन सम्भवे
उदयान्तर कालांश साधनं तत्र निष्फलम् । ४९ ।
ये दोनों ग्रह सूर्य से दूर रहने पर भी दीखते हैं । अतः उनका उदयान्तर
कालांश निकालने की कोई जरूरत नहीं है । उस समय लिखे गये कालांश से
कम कालांश रहने पर भी क्षेत्रांश अधिक होने के कारण ऐसा होता है ।
तदादौ स्थूल केन्द्रांशैः प्राग्वदस्तोदयोद् भवम् ।
कालमानीय तत्काल दोः फलञ्च विवस्वतः । ५० ।
तारा ग्रहों का दृक् सिद्ध ध्रुवांश -पहले लिखे गये उदय और अस्त केन्द्रांश
से उदय और अस्त काल निकाल कर उस समय के सूर्य का मन्द फल निकालें ।
धनर्णं सूर्यवत्तूर्य केन्द्रे स्व स्वोदयास्तजे
जीव मन्दासृजां शुक्र बुधयो स्तु व्यतिक्रमात् । ५१ ।
जिस रीति से मन्द भुजफल सूर्य में जोड़ा या घटाया जाता है उसी क्रम से