सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ सिद्धान्त दर्पण
ऐसी कल्पना की लायेगी शुक्ल भाग देखने केलिये चन्द्र बिम्ब केन्द्र से पाँच हाथ
की दूरी पर आग्नेय दिशा में भू बिन्दु देंगे ।
उत्तराशा महीविन्दोः कल्पनीयार्द्ध मम्बरम्
तिर्यक् स्थित्वात्नुः प्रेक्ष्यः समोऽपीन्दौ सदातपः । ५५ ।
इस भूविन्दु से ऊपर के आकाश को उत्तर दिशा मानेंगे । सूर्य बिम्ब से चन्द्र
बिम्ब का आधा हमेशा प्रकाशित रहने पर भी भू भाग से दीखने वाला बिम्ब
(दृश्य वृत्त) और शुक्ल वृत्त परस्पर तिरछा होने के कारण शुक्ल भाग आधा से बहुत
कम दीखता है ।
ईशान नैऋत दिशोरायता यात्र रेखिका
साज्ञेया भूस्थितैर्दृश्या चन्द्रमण्डल विस्तृतिः । ५६ ।
ईशान और नैऋत विन्दु गामी चन्द्र बिम्ब का व्यास भूविन्दु पर के लोगों को
निश्चय दीखेगा ।
दक्षिणोत्तर रेखान्त व्यापि पश्चिम शुक्लतः
अधः स्थो दक्षिणो भागो दृश्यता मेतियत् क्षितौ । ५७ ।
दक्षिण और उत्तर रेखा को स्पर्श करता हुआ पश्चिम आधा शुक्ल भाग का नीचे
का भाग भूबिन्दु से दीखेगा ।
तद् भूमेर्निर्गतं सूत्रं याम्य रेखाग्र संगतम्
लग्नं पश्चिम रेखान्ते नेऋतैशान्यरेखिकाम् । ५८ ।
अत भू केन्द्र से चन्द्र मण्डल के पश्चिम बिन्दु को स्पर्श करता हुआ सूत्र ईशान
नैऋत्यरेखा को
यत्र स्पृशत् ततस्तस्यां नैऋतान्तं सितस्थितिः ।
ऐशान्यान्तं सता भावः कर्ण सूत्रेण लक्ष्यते । ५९ ।
जहाँ स्पर्श करेगा वहां से उसी ईशान नैऋत्य रेखा से नैऋतचिह्न तक शुक्ल
रहेगा । ईशान दिशा के चिह्न तक शुक्ल का अभाव अर्थात् कृष्ण रहेगा । कर्ण
सूत्र से यह शुक्ल वृत्त पृथ्वी से दिखाई देता है ।
सार्द्ध राश्यन्तरेऽर्केन्दोः शास्त्रोक्त स्त्र्यंगुलः सितः
साक्षादत्रागतो यस्मात् पादोनद् व्यंगुला (१।४५) त्मकः । ६० ।
रवि और चन्द्र का अन्तर (४५°) होने पर ३ अंगुल प्राचीन शास्त्रों में माना
जाता है । यहां दिया हुआ परिलेख का कोण सूत्र में प्रत्यक्ष (१।४५) अंगुल ही
शुक्ल आता है ।
अतश्चन्द्रस्य सर्वत्र शौक्ल्यमुत्क्रम जीवया
साध्यं बुधैर्यतो दृश्यो गोलांशः कर्णवर्त्मना । ६१ ।