सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२३
चन्द्रोदय द्वयान्तः स्थोऽहोरात्रश्चान्द्र सावनः
क्रान्तेस्तद्दिन मानञ्च माध्यमिष्टं नतं ततः । २० ।
चन्द्र के उदय के दूसरे उदय तक का समय चन्द्र सावन दिन कहा जाता
है । चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का साधन कर उससे इष्ट नत काल पूर्व राति से
निकालते हैं ।
पूर्वार्द्धे शुक्ल पक्षस्य कृष्ण स्यान्त्य दले विधोः
शुक्ला शृंगोन्नतिः कृष्णा कृष्ण शुक्ल मुखान्तयोः । २१ ।
शुक्ल पक्ष के पूर्वार्द्ध (प्रति पदा से ७ मीपर्यन्त) और कृष्ण पक्ष का उत्तरार्द्ध
(९ मी से १४ शी पर्यन्त) शुक्ल श्रृंग की उन्नति निकाली जाती है । इसी प्रकार
कृष्ण पक्ष का पूर्वार्द्ध तथा शुक्ल पक्ष के उत्तरार्द्ध में कृष्ण श्रृंग की उन्नति निकाली
जाती है । शुक्ल या कृष्ण जो भाग आधा से कम हो उसकी उन्नति निकाली
जायेगी ।
विमण्डलं स्थिते चन्द्र मण्डले कांश संक्रमात्
अपवृत्त स्थिति भवा द्विविधा कृति सम्भवः । २२ ।
विमण्डल वृत्त में स्थित चन्द्र पर क्रान्ति वृत्त से स्थित सूर्य की किरण पड़ने
से चन्द्र का अनेक प्रकार का आकार दीखता है ।
अप्यर्कात्समदूरस्थ मिन्दु शृंगद्वयं सदा
देशान्तर वशाद् वक्रं तार तम्येन दृश्यते । २३ ।
चन्द्र का दोनों शृंग रवि से समान दूरी पर रहने से भी देशान्तर के कारण
वह कम या अधिक होते हैं । तिरछा दीखते हैं ।
सौम्यायनान्तगो भानु र्दिनार्द्धे मस्तको परि
दृश्यते यत्र तद्देशे मेषादिस्थे विवस्वतिः । २४ ।
जिस स्थान में दिनार्द्ध में सायन मिथुन अन्त का सूर्य ठीक सिर के ऊपर
हो (अक्षांश परम उत्तर क्रान्ति के समान वहां सायन मेषादि का सूर्य-
सममण्डल वद् दृश्यं दिवसान्तेऽपमण्डलम् ।
तत्राविक्षिप्त शीतांशु प्राक् गतिः सरलेक्ष्यते । २५ ।
सूर्यास्त के समय पूर्वापर वृत्त की तरह दिखेगा । उस स्थान में शरहीन चन्द्र
की गति अत्यन्त सरल पूर्व दिशा में होगी ।
समता शृंगयोस्थस्मात् क्रान्ति वृत्त क्रमाद् भवेत् ।
सन्निवेशो गतिश्चन्द्रोः किन्तु भेदः शरोद् भवः । २६ ।
इससे पता चलता है कि क्रान्ति वृत्त की स्थिति के अनुसार चन्द्र का स्थान,
शृंग और गति होती है । इसमें भी शरभेद के कारण भिन्नता होती है ।