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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

चन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२७
आधे से कम होने पर शुक्ल भाग का तथा आधे से अधिक शुक्ल चन्द्र बिम्ब
होने पर यह कृष्ण भाग का अंगुलादि फल होगा । आधा से कम चन्द्र बिम्ब शुक्ल
होने पर १२ अंगुल चन्द्र बिम्ब में शुक्लां गुल दिया जायेगा ।
पुष्टे षडंगुला प्रोज्झ्य कृष्णं शिष्टं सितांगुलम्
भोज्यं बिम्बदले चेत्स्याद् वलनार्क दिशः स्फुटः । ४८ ।
चन्द्रमा का आधा से अधिक शुक्ल बिम्ब होने पर कृष्ण अंगुलादि ६ अंगुल
से घटाकर शेष शुक्ल अंगुल को यदि बिम्बार्द्ध ६ अंगुल में जोड़ेगे तब वलन के
अग्र बिन्दु से रवि की दिशा में-
आकार चन्द्रबिम्बस्य प्राग् वद् बिन्दु त्रयोद् भवात् ।
मत्स्यद्वयात् सूत्र सत्तात् सिद्धः साक्षात् सलक्ष्यते । ४९ ।
पहले की तरह तीन बिन्दुओं से दो मीन बनाकर मुख पुच्छ रेखा के मिलन
बिन्दु केन्द्र से वृत्त खींचेगे ।
सार्द्धांगुलाल्प शुक्रस्य शृंगान्तवति सौक्ष्म्यतः
न दृश्यौ दर्शनं तद् वत् सम्भवैत दुपान्तयोः । ५० ।
डेढ़ अंगुल से कम शुक्ल बिम्ब नहीं दिखायी देता है । क्योंकि शृंग का प्रान्त
भाग अत्यन्त पतला होता है । अवश्य शृंग के अग्र भाग के निकट थोड़ा शुक्ल
दिखायी देता है ।
कला वृद्धि क्षया वस्य दृश्यतां परिलेख के
शुक्ल पक्षस्य पादान्ते सूर्यास्त मय कालिकः । ५१ ।
चित्र, परिलेख (नक्शा या छेदक) बनाकर चन्द्र कला की वृद्धि और क्षय
दिखाना होगा । शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को सूर्यास्त के समय
चन्द्रेऽर्कोङ्गुलकोलेख्य उत्तरास्येन भूतले ।
तन्मध्येदिक्षु कोणेषु देयं रेखा चतुष्टयम् । ५२ ।
उत्तर की दिशा में मुंह कर भूपृष्ठ पर १२ अंगुल व्यास का चन्द्र बिम्ब लिखेंगे ।
उसमें दिशाओं और कोणों के बीच चार व्यास रेखायें खींचेगे ।
तन्मध्यानां यथा योगो बिम्ब मध्ये भवेत्त था
चन्द्रात् पश्चिम गो दूरे कल्पनीयो दिवाकरः । ५३ ।
सभी चारों रेखायें परस्पर केन्द्र बिन्दु पर मिलेंगी और दो बराबर भागों में
विभाजित होंगी । चन्द्र बिम्ब से पश्चिम की तरफ दूरी पर सूर्य लिखेगें ।
बिम्बार्द्ध पश्चिमं भाव्य सातपं विन्दु रिन्दुतः
भू संज्ञः पञ्च हस्तान्ते देयोऽग्निदिशि दृष्टये । ५४ ।
इस सूर्य बिम्ब के कारण चन्द्र मण्डल का पश्चिम बिम्बार्द्ध शुक्ल होगा