सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२९
अतः पण्डित लोग उत्क्रम ज्या द्वारा ही चन्द्र का शुक्ल परिमाण साधन करते
हैं । क्योंकि गोल वस्तु में कोई भी भाग दृक् सूत्र मार्ग में ही दिखाई देगा ।
एवं शुक्र ज्ञेयो शृंगे चक्रार्द्धान्तिक वर्त्तिनोः
यन्त्रेण विदुषा दृश्ये चन्द्र वद्दूर दर्शिनाः । ६२ ।
इसी प्रकार ज्योतिषी लोग दूर तीक्ष्ण यन्त्र द्वारा चन्द्र शृंग की तरह रवि के
समीप बुध और शुक्र का भी शुक्ल शृंग देखते हैं ।
वर्षेऽस्मिन् भारते सौम्य प्रायशः शृंगमुन्नतम्
कपाल द्वितये दृश्यं कदाचिद्दक्षिणं विधोः । ६३ ।
भारत वर्ष में प्रायः पूर्व और पश्चिम दोनों कपाल में चन्द्र का उत्तर शृंग उन्नत
दीखता है दक्षिण शृंग बहुत कम उन्नत होता है ।
छाया कर्ण वराद् विधो रवि शशि क्रान्त्यन्तरोत्थोदिता
या शृंगोन्नतिरादिभिः किममया साव्यज्य सिद्धेर्दृशः
यद् भानो विषुवस्थिते सितरुचेर्यान्यानन्त स्थितेः
खार्द्धं ध्रुवसूत्र खण्डित मिवावकं सदा लक्ष्यते । ६४ ।
प्राचीन आचार्य छाया वर्णन के लिये इष्ट काल के १२ अंगुल शंकु के छाया
कर्ण द्वारा रवि और चन्द्र की क्रान्ति का अन्तर निकालते थे और उससे चन्द्र की
शृंगोन्नति निकालते थे । यह विधि दृक् सिद्ध नहीं होने के कारण मैं ग्रहण नहीं
कर रहा हूँ, छोड़ देता हूँ । सूर्य विषुव रेखा के ऊपर रहने पर (सायन मेषादि का
तुलादि में रहने पर) साय मकर आदि के चन्द्र का बिम्बार्द्ध ख स्वस्तिक में
याम्योत्तर वृत्त (रेखा) द्वारा खण्डित दीखता है । अतः बिम्बार्द्ध शुक्ल दीखता है ।
व्यर्केन्दूत्क्रमदोर्ज्यकादिम गति क्षुण्णाक्षि बाणाम्बुधि-
त्रिग्रावेन्दु (१७३४५२) हता फलंश शभृतो ज्योत्स्नाकला बिम्बजा
अर्द्धोनस्य दलाधिकस्य तु दलं तद्विर्न मर्द्धान्वितं
प्राक् पश्चात् सित बिम्ब मान मुदितं लिप्तात्मकं दृक् समम् । ६५ ।
अतः सूक्ष्म चन्द्र से सूर्य घटा कर शेष की उत्क्रमज्या को चन्द्र की प्रथम
स्फुट गति से गुणा कर (१७३४५२) से भाग देने पर जो फल होगा, बिम्बार्द्ध से
चन्द्रमा का शुक्ल भाग उतने कला कम या अधिक होगा । इस शुक्ल कला को
बिम्बार्द्ध से कम चन्द्र रहने पर बिम्बार्द्ध से कम तथा बिम्बार्द्ध से अधिक चन्द्र
रहने पर बिम्बार्द्ध में जोड़ने पर शुक्ल बिम्ब का कलात्मक मान होगा । यह पूर्व
और पश्चिम दोनों कपाल में दृक् सिद्ध बिम्ब मान होगा ।
क्ष्माभू (११) काल लवान्तरेऽर्क शशिनोः शुभ्रांशु बिम्ब द्युतिः
प्रायेण क्षितिभृत् क्षपेशा (१७) विकला मानादूना बुधात्