सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ सिद्धान्त दर्पण
उदयेस्तमये वापि स्वदिने यत्र कुत्रवा
यदादृक् चन्द्रमा साध्य स्तदायं क्रम उच्यते । १४ ।
सूर्य अस्त, या इष्ट काल में भू पृष्ठ पर दृश्य चन्द्र निकालने की विधि कही
जाती है ।
षष्ठ प्रकाश विधिना कृत्वा सूक्ष्म स्फुटं विधुम् ।
स्वेष्ट कालिक मानीय पूर्वा पर कपालयो । १५ ।
६ ठे प्रकाश में कही गयी विधि से स्फुट चन्द्र निकालनेंगे । इसे पूर्व तथा
पश्चिम कपाल का इष्टकालिक चन्द्र करेंगे ।
लग्नं तात्कालिकं कृत्वा वित्रिभं दृग् गतिं ततः ।
नतज्यां प्राक् परोद्भूतां सा दृक् गति गुणाहताः । १६ ।
इष्ट काल का लग्न, वित्रिभ लग्न तथा वित्रिभ शंकु निकालेंगे । पूर्व या
पश्चिम-जिस कपाल में चन्द्र है उसकी दृग्ज्या निकाल उसे दृग् गति (वित्रिभ
शंकु) से गुणा करेंगे तथा-
त्रिज्याप्ता द्येन्दु भुक्तिघ्नी मनु (१४) घृतत्रिज्या (४८१३२) हृता
फल लिप्ता युतोनःस्याद् वित्रिभोदयतो विधुः । १७ ।
त्रिज्या से भाग देंगे । लग्न को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा कर १४ x
३४३८ (१४ x त्रिज्या) से भाग देने से कला आदि फल होगा उसे चन्द्र में जोड़ेगे
या घटायेंगे यदि वित्रिभ लग्न से चन्द्र-
प्राक् प्रत्यक् स्थस्ततः प्राग्वन्नतिस्थ संस्कृतात् शरात्
दृक् कर्मान साक्षञ्च स्यात्ततोदृग् विधुर्भवत् । १८ ।
पूर्व या पश्चिम कपाल में स्थित हो । इससे इष्टकाल का लम्बन संस्कृत चन्द्र
आयेगा । इसके बाद पहले की तरह पुनः चन्द्र नति का साधन करेंगे । इस नति
से शर का संस्कार कर स्फुट शर निकाल कर उसका आयन और आक्ष दृक् कर्म
निकालते हैं । इससे लम्बन संस्कृत चन्द्र का संस्कार करने से समप्रोत वृत्तीय
होगा जो भूपृष्ठ से दीखता है ।
शृंगोन्नति द्विधा शुक्ल कृष्ण भेदात्तयोः सिता
दृश्यत्वात् सम्मता सर्वै कैश्चित् कृष्ण नुमानतः । १९ ।
चन्द्रमा के श्रृंग (सींग) की दो प्रकार की उन्नति (शृंगोन्नति) होती है ।
सामान्यतः शृंगोन्नति की अर्थ धवले श्रृंग की उन्नति होती है । परन्तु कुछ विद्वान
कृष्ण शृंगोन्नति की भी कल्पना करते हैं (यह दीखता नहीं है गणना द्वारा जाना
जाता है )