सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्र शृङ्गोन्नति वर्णनम् २२५
तत्सूत्र बिन्दु बिम्बान्तं यत्र स्पृशति सूर्यतः
ज्योत्सोत्पत्ति क्षयौ तत्र भवेतां पर्व सन्धिजौ । ३४ ।
यह रेखा चन्द्र बिम्ब परिधि को जहां काटेगी वहीं पर सूर्य के कारण प्रकाश
और छाया की सन्धि होगी ।
चन्द्रार्कान्तर जा लिप्ताः ख ख नन्दं हृताः फलम्
शुक्लांगुलं तदिन्द्वन्ता दन्तर्देयं रवेर्दिशः । ३५ ।
रवि और चन्द्र की अन्तर कला को ९०० से भाग देने पर शुक्लांगुल होगा ।
चन्द्र बिम्ब से उस रेखा (चन्द्र बिम्ब केन्द्र से शरवलन के अग्र बिन्दु सूर्य तक)
पर रवि की दिशा में-
शुक्लाग्रे विन्यसेद् बिन्दु मथ सूर्यात् ख वृत्त के
नवत्यं शान्तरे बिन्दू पार्श्व योर्स्य तद् युगात् । ३६ ।
वलनाश्रित वृत्त में सूर्य चिह्न के दोनों तरफ (९०) अंश की दूरी पर दो विन्दु
देंगे । इन दोनों विन्दुओं से भी-
प्राग् वत्सूत्रे प्रसार्यैन्दौ तत्स्पर्श स्थानयो रुभे
बिन्दुं दत्वा लिखेद् विन्दु त्रयाहन्तुत्रयं विधुः । ३७ ।
पहले के समान चन्द्र केन्द्र तक रेखा खींचे पर वह चन्द्र मण्डल को जिन
दो विन्दुओं पर काटेगी वहां भी दो विन्दु देंगे । इन दोनों बिन्दुओं तथा चन्द्र
मण्डल का केन्द्र -इन तीन बिन्दुओं से-
पञ्चाङ्गुल गुणेनात्र स्यातां मत्स्यौ तदन्तरे-
तत्पुच्छ मुखं संसक्त सूत्रयोर्यत्र संयुतिः । ३८ ।
प्रत्येक से ५ अंगुल व्यासार्द्ध का तीन वृत्त खींचेंगे । इन तीन वृत्तों के मिलन
से दो मत्स्याकृति होगी । दोनों मत्स्यों के मुख और पुच्छ को मिलाने वाली रेखा
जहां काटेगी ,
ततो बिन्दु त्रय स्पर्शि धनुश्चन्द्रान्तरे लिखेत्
तस्मात् बिम्बान्तर स्थानं शुक्ली कृत्येष्यतां विधुम् । ३९ ।
उस विन्दु को केन्द्र मानकर तीन बिन्दुओं से होकर वृत्त चाप खींचेंगे । इस
चाप से सूर्यचिह्न की दिशा में चन्द्र बिम्ब का जो भाग है वह प्रकाशित दिखायी
देगा ।
प्रत्यक् स्थे शुक्ल पक्षेस्मिन् कृष्णे चन्द्रे पुर स्थिते
तदर्कान्तर लिप्ताभ्यो वलनार्क दिशोद्युतेः । ४० ।
शुक्ल पक्ष में पश्चिम कपाल एवं कृष्ण पक्ष में पूर्व कपाल में रवि और चन्द्र
की अन्तर कला के कारण वलन अग्र से रवि चिह्न की तरफ-