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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र ग्रहण वत्साध्य मत्राणि वलन द्वयम्
आयनं फलजं स्पष्टं वैक्षेपरूप्य मिहोच्यते । २७ ।
चन्द्र ग्रहण के समान चन्द्र शृंगोन्नति साधन में भी आयन और आक्ष वलन
का साधन किया जाता है ।
चन्द्रार्कान्तर जीवास्मिन् कोटीर्विक्षेपको भुजः
दोः कोटीवर्गयो र्योगात् पदं स्यात् कर्णसंज्ञकम् । २८ ।
शरवलन की विधि- (१) रवि और चन्द्र के अन्तर चाप की ज्या कोटि (२)
चन्द्र की शरज्या का भुज और (३) इन दोनों के वर्ग योग का मूल-कर्ण इस
त्रिभुज में-
त्रिज्या भुजघ्नी कर्णाप्ता फलं चापी कृतं कलाः
षष्ट्याप्ता वलनांशाः स्यु विक्षेपास्तेंऽगुलात्मकाः । २९ ।
त्रिज्या को शर से गुणा कर्ण से भाग देने पर जो फल आयेगा उस चाप की
कला करेंगे । उसे ६० से भाग देने पर अंगुल में शर का वलनांश आयेगा ।
ख वृत्तमादौ पूर्वोक्तमं दिक् चिह्नितं लिखेत्
षडंगुलं गुणेनेन्दुं तन्मध्ये द्वादशांगुलम् । ३० ।
ग्रहण के परिलेख में जितने व्यासार्द्ध का ख वृत्त खींचा जाता है उतने ही
व्यासार्द्ध का यहां भी ख वृत्त बना कर उसमें दिशा का अंकन करेंगे । इसमें भी
६ अंगुल व्यासार्द्ध का चन्द्रमण्डल लिखेगें उसका व्यास १२ अंगुल का होगा) ।
ख वृत्ते वलनं स्पष्टं प्राच्यां प्राक् स्थे सदिश्यदः ।
इन्दौ प्रत्यक् कपालस्थे पश्चाद्दिग् भेद तोन्यसेत् । ३१ ।
चन्द्र पूर्व कपाल में रहने पर चन्द्र का स्फुट वलन पूर्व विन्दु में तथा पश्चिम
कपाल में रहने पर पश्चिम विन्दु से स्फुट बल की दिशा के अनुसार उत्तर या
दक्षिण में अंकित करेंगे ।
तच्चिह्नतः सौम्य याम्य वैक्षेप वलनांगुलम् ।
दिग्वैपरीत्यतो न्यस्येत् कपाल द्वितयेऽप्यदः । ३२ ।
स्फुट वलनाग्र चिह्न से शर का वलन, वलन की विपरीत दिशा में (स्फुट
वलन उत्तर होने पर शर वलन दक्षिण आदि) दोनों कपाल में देंगे ।
तदग्रस्थायिनं विंदुं निश्चित्यार्कतयोततः
सूत्रं प्रसारितं चन्द्र बिम्ब मध्यान्त मानयेत् । ३३ ।
शर वलन के अग्र बिन्दु को सूर्य मान कर उससे चन्द्र बिम्ब के केन्द्र तक
एक सरल रेखा खींच कर बढ़ायेंगे ।