सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पर निर्भर हैं । अतः सूर्य और चन्द्र सूक्ष्म होने पर ये भी सूक्ष्म (अति स्फुट) होंगे ।
रवि और चन्द्र की मन्द परिधि स्थूल और सूक्ष्म दोनों विधियों में समान होने के
कारण मन्द फल संस्कृत रवि और चन्द्र को प्रथम ग्रह माना जाता है ।
एतस्य सूक्ष्मस्य रवेध्यगत्या बिम्ब प्रमाणं स्थिर पर्व सन्धिः ।
छाया भुवस्तद् युगमन्दकर्णः सूर्यग्रहे सिध्यति लम्बनश्च । ५ ।
इसी प्रथम ग्रह तथा रविस्फुट गति से बिम्बमान स्फुट पर्यन्त काल, भुजमान,
रवि और चन्द्र दोनों के मन्द कर्ण और सूर्य उपराग का लम्बन साधन किया जाता
है ।
तुंगान्तरं पाक्षिक नामधेयं फलं दिगंशारूय मदस्तुरीयम् ।
क्रमेण वक्ष्यामि निरीक्ष्ययत्ना च्छित्रां गतिं रात्रिफ्ते श्चिराय । ६ ।
चन्द्रगति बहुत विचित्र है, इसके दीर्घ काल निरीक्षण करने पर मैंने मंदफल
के अतिरिक्त और तीन फल संस्कार की आवश्यकता समझी है । चारं संस्कारों
के नाम हैं-मन्द, तुंगान्तर, पाक्षिक और दिगंश ।
अभीष्ट कालोत्थित चन्द्र मन्दात् पक्षे सिते सत्रिभ सूर्य हीनात् ।
कृष्णे त्रिभोनाय्मवर्जिताद् यत् केन्द्रं तदीया भुजमौर्विकायाः । ७ ।
चन्द्र के इष्ट काल के मन्दोच्च से सूक्ष्मरवि और तीन राशि का योग शुक्ल पक्ष
में घटाते हैं । कृष्ण पक्ष में स्पष्ट रवि से तीन राशि का अन्तर घटाते हैं । यह
तुंगान्तर केन्द्र हुआ । इसकी भुजज्या निकालें ।
साभ्रांगभू (१६०) घ्नी त्रिगुणेन (३४३८) भक्ता स्फुटार्क चन्द्रान्तर दो र्गुणघ्नी
त्रिज्योद्धृता लब्धमतः कलाद्यं गत्याविनिघ्नं प्रथम स्फुटे न्दोः । ८ ।
तुंगान्तर भुजफल को (१६०) से गुणा कर(३४३८) से भाग देकर सूक्ष्म रवि
और स्फुट चन्द्र के अन्तर की भुजज्या से गुणा करें और पुनः त्रिज्या से भाग दें ।
लब्धि कला आदि को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा कर-
तन्मध्यगत्या (७९०।३५) विहृतं फलंस्यां तुंगान्तरं तेन विहीन युक्तः ।
पर्यायतः सत्रिभ वित्रिभार्क हीनेन्दु मन्दोच्च भवोक्त केन्द्रे । ९ ।
मध्य चन्द्र गति (७९०।३४) से भाग दें । लब्धि कलाआदि तुंगान्तर फल
होगा । तुंगान्तर केन्द्र मेषादि ६ राशि में रहने पर तुंगान्तर फल को प्रथम स्फुट
चन्द्र में जोड़ते हैं, केन्द्र तुला आदि ६ राशि में रहने पर इसे घटाते हैं । इससे
द्वितीय स्फुट चन्द्र मिलता है ।
(तुलाधराजादिमषट्क निष्ठे प्राक् सिद्ध चन्द्रो भवति द्वितीयः )
तत्सूक्ष्म सूर्यान्तर केन्द्र पादयातैष्यदल्पाः कलिका द्विनिघ्नाः । १० ।
द्वितीय स्फुट चन्द्र और सूक्ष्म रवि के अन्तर को केन्द्र मानते हैं । यह केन्द्र
वृत्त के जिस पाद में हो उसका गत और गम्य खण्ड निकालें । गत् और गम्य
खण्ड में जो कम है उसकी कला बनाकर २ से गुणा करें ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण दिया गया है:
८० सिद्धान्त दर्पण
मौर्वीकृताहारहताः फलं स्यात् कलात्मकं पाक्षिक नामधेयम् ।
पक्षार्द्धयोः प्राक् परयो स्तदाद्य हीनस्तुतीत्यत्व मुपैति सोऽयम् ।। ११ ।।
गुणनफल की ज्या निकाल कर उसे निम्नलिखित हार से भाग देने पर कलादि
लब्ध फल को पाक्षिक फल कहा जाता है । पक्ष के पूर्वार्द्ध में चन्द्र रहने पर
पाक्षिक फल को द्वितीय स्फुट चन्द्र में जोड़ते हैं । परार्द्ध पक्ष में चन्द्र रहने पर
इसे घटाते हैं । तो तृतीय स्फुट चन्द्र होता है ।
सूर्योनित स्वोञ्च विधूञ्च शेष भुजांश कान्योऽन्य विघात पिण्डात्
खाष्टेन्दु (१८०) भक्ताञ्च फलं नवत्या (९०) युक्तं तृतीयाय फलायहारः ।। १२ ।।
पाक्षिक फल का हार निकालने के लिये रवि मन्दोच्च और चन्द्र मन्दोच्च से
अलग-अलग सूक्ष्म सूर्य घटाते हैं । दोनों अन्तरों का भुजचाप निकाल कर उनका
परस्पर गुणन करते हैं । गुणन फल में (१८०) से भाग देकर लब्धि में ९० जोड़ते
हैं जो पाक्षिक फल का हार होता है ।
स्वणार्क दोः सूक्ष्मफलं दिगा (१०) म माद्येन्दु गत्या हत मध्य भक्तम् ।
तुर्यं फलं स्यात् क्रमतस्तदून युक्तः शशीदृक् सम एष सूक्ष्मः । १३ ।
रवि के सूक्ष्म मन्दफल को १० से भाग देकर स्फुट चन्द्र गति से गुणा करते
हैं तथा मध्य चन्द्र गति से भाग देते हैं । इससे दिगंश फल मिलता है । रवि
मन्दफल धन या ऋण होने पर दिगंश फल को तृतीय स्फुट चन्द्र में जोड़ते
या घटाते हैं । इससे चतुर्थ स्फुट चन्द्र होगा जो शुद्ध मान होगा ।
स्थलीषु जंगम्यत एव यद् वद् भुजंग ऋज्वी गति मेव गर्त्ते ।
सदोच्च कर्षातिग एव मिन्दु स्तत्साम्य मागच्छति पर्व सन्धौ ।। १४ ।।
समतल भूमि पर सर्प तरंग की तरह चलता है लेकिन बिल में जाते समय
सीधा हो जाता है । इसी प्रकार सिर्फ मन्दोच्चं फल के प्रभाव को न मानकर
चन्द्रमा अनेक प्रकार की गति करता है, पर पूर्णिमा या अमावस्या (पर्व सन्धि)
में गति की विषमता दूर हो जाती है, तथा केवल मन्दफल के अनुसार संस्कार
होता है ।
तत्राप्य तुंगान्तर पाक्षिके स्थात् सूक्ष्मे दिगंशाख्य फलं यथाहेः ।
मताल्यवक्रा स्वगतिर्विलेऽपि पार्श्वद्वय स्पर्श दृढ़ा दृढ़ीत्वात् ।। १५ ।।
बिल में प्रवेश करते समय पार्श्व के दबाव के कारण सर्प की पार्श्व गति
(तरंगाकार) बिल्कुल बन्द हो जाती है । साथ ही उसकी स्वाभाविक सीधी गति
में भी अन्तर पड़ता है । इसी प्रकार पर्व सन्धि पर चन्द्रमा का तुंगान्तर और पाक्षिक
फल नहीं होता पर सूक्ष्म दिगंश फल का संस्कार होता है (मन्दफल के अतिरिक्त)
भुजान्तराख्यं फलमर्क सूक्ष्म स्थूलात्मदोः खण्डफलाद्विधेयम् ।
क्रमादणु स्थूल विधौ न तु स्यात् स्फुटीक्रियान्योन्य विपर्य येण ।। १६ ।।
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८१
रवि का सूक्ष्म स्फुट निकलने के लिये सूक्ष्म सारणी और स्थूल स्फुट निकालने
के लिये स्थूल सारणी का व्यवहार करना चाहिये । इसका उलटा करने से अशुद्धी
होगी ।
चन्द्र की सूक्ष्म स्फुट गति
तुंगान्तर यत्फल मत्र सिंह त्रिज्या हतं तत्प्रथमेन्दु भान्वेः ।
विश्लेषदोर्ज्याप्तफलं तदीयान्तरोत्थ तदोत्थ कोटी गुण संगुणञ्च ॥ १७ ॥
सूक्ष्म तुंगान्तर फल को त्रिज्या (३४३८) से गुणा कर प्रथम स्फुट चन्द्र और
सूक्ष्म स्फुट रवि के अन्तर की ज्या से भाग दें । फल को आद्य स्फुट चन्द्र और
सूक्ष्म रवि के अन्तर की कोटिज्या से गुणन कर
त्रिज्योद्धृतं तत्पुनरर्क चन्द्रगत्यन्तरघ्नं त्रिगुणाप्त लब्धम् ।
योज्यं तदेव प्रथमेन्दु भुक्ति फलै र्भवेद् भुक्तिफलं द्वितीयम् ॥ १८ ॥
त्रिज्या से भाग देंगे । फल को प्रथम स्फुट चन्द्र गतिफल में जोड़ने से द्वितीय
गति फल होगा ।
तत्संस्कृतं मध्यगतौ पुरोवद् भवे द्वितीया रजनीश भुक्तिः ।
वर्गीकृतं पाक्षिक लिप्तिकायां हारोद् भवस्यान्त्य फलस्य वर्गात् ॥ १९ ॥
इस गति फल को चन्द्र मध्यम गति में जोड़ने या घटाने से द्वितीय चन्द्र गति
होती है । मन्द केन्द्र कर्क आदि ६ राशि में होने पर जोड़ते हैं, अन्यथा घटाते
हैं । कलां आदि पाक्षिक फल को वर्ग कर उसे परम पाक्षिक फल के वर्ग से
घटायें ।
विशोध्य तच्छेष पदं द्वितीय चन्द्रार्क गत्यन्तर संगुणं तत्
गोभूघनास्र (१७१९) सितरुग् द्वितीय भुक्तौ धनं पक्ष पुरोऽन्तिमाङ्घ्रोः । २० ।
शेष के वर्गमूल को २ य चन्द्र गति और स्फुट रवि गति के अन्तर से गुणा
कर त्रिज्यार्द्ध (१७१९) से भाग दें । (फल को चन्द्रमा शुक्ल पक्ष के प्रथमार्द्ध या
कृष्ण पक्ष के द्वितीयर्द्ध में रहते पर चन्द्र की द्वितीय गति में जोड़े ।
ऋणं पदोर्मध्यम योरितिस्यात् सूक्ष्मान्त्य भुक्तिः शशिन स्तुतीया ।
दिनान्तरेन्द्वन्तर स म्मिता वा तत्सिद्ध तिथ्यादि शुभेषु चिन्त्यम् । २१ ।
चन्द्रमा द्वितीय और तृतीय पाद (शुक्ल पक्ष द्वितीयार्द्ध या कृष्ण पक्ष प्रथमार्द्ध)
में रहने पर फल को चन्द्रमा की गति से घटायेंगे । (कुछ लोग पूरे शुक्ल पक्ष के
लिए जोड़ते हैं तथा कृष्ण पक्ष के लिए घटाते हैं) । यह तृतीय सूक्ष्म गति (चन्द्रमा
की) होगी । दो दिनों के स्फुट चन्द्र के अन्तर से प्राप्त चन्द्र गति भी व्यावहारिक
शुभ कार्यों के लिए पर्याप्त सूक्ष्म है और उससे तिथि का विचार हो सकता है ।
विष्ट्याद्यनिष्टं यदिहास्ति तत्तत्याज्यं पुनः स्थूल मते यदेतत् ।
तन्नापि हेयं बहु सम्मतत्वात् स्थूलेन नित्यव्यवहार सिद्धेः । २२ ।
८२ सिद्धान्त दर्पण
सूक्ष्म मत से विष्टि आदि अनिष्ट का त्याग किया जाता है । शुभ कर्म में
स्थूल मत से भी विष्टि आदि को नहीं लेना उचित है । स्थूल मत सर्वथा हेय
नहीं है, नित्य व्यवहार के लिए लोग उसे ही मानते हैं ।
व्यर्केन्दु केन्द्रोज समांध्रि युग्मं पक्षादि मान्त्यर्द्ध युगं प्रमेयम्
पक्षांघ्रयः केन्द्र भषट् कयोः स्युः शराम्बु राशि (४५) प्रमितैश्च भागै । २३ ।
चन्द्र से रवि घटाने पर जो केन्द्र होता है । वह प्रथम ६ राशि में रहने पर
(रवि से चन्द्र मा १८०° तक आगे रहने पर ) शुक्ल पक्ष तथा द्वितीय ६ राशि में
(१८०°-३६०°) रहने पर कृष्ण पक्ष होता है । प्रथम ३ राशि शुक्ल पक्ष पूर्वार्द्ध ,
उसके बाद ६ राशि तक शुक्ल पक्ष का उत्तरार्द्ध होता है । कृष्ण पक्ष का पूर्वार्द्ध
६ से ९ राशि तथा उत्तरार्द्ध ९ से १२ राशि होता है । प्रत्येक पक्ष (१८०) के चतुर्थ
अंश (४५) को पक्ष चरण (पाद पक्ष) कहा जाता है ।
वक्ष्येन्त्य भुक्ति ग्रहणे प्रसिद्धां
ययैव सर्वान्त गतैष्य काले ।
चन्द्रः स्फुटः स्यात् स्थिति मर्द्ध कालो
दृक् तुल्यता मेतिययाच सिद्धः । २४ ।
अब मैं चन्द्र ग्रहण के लिए उपयोगी चन्द्र की गति (ज्यादा सूक्ष्म) कहता
हूँ । यह गति निकालने के लिए पर्वान्त (पूर्णिमान्त और अमान्त) का गत (बीता)
और गम्य (बाकी) काल निकालकर उससे चन्द्रमा को स्फुट करते हैं । इस स्फुट
गति द्वारा साधित होने पर ग्रहण के स्पर्श, मोक्ष स्थिति आदि समय दृक् सिद्ध
होते हैं । (गणना के अनुसार ही दीखते हैं)
न्यस्यद्विधाद्येन्दुगतेः फलं तदन्त्येन
तुंगान्तर केण ( १६०) निघ्नम्
परेणतन्मान्द्य फलेन (३०१) भक्तं
गत्याद्ययाघ्नं किमम ध्यया (७९० । ३५) सम् । २५ ।
प्रथम स्फुट चन्द्र के प्रथम गतिफल को दो स्थान में रखकर एक स्थान में
उसे कला आदि परम तुंगान्तर फला (१६०) गुणा कर परम चन्द्र मन्दफल कला
से भाग दें । अन्य स्थान के प्रथम गति पल को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा
कर मध्यगति ( ७९०।३५) से भाग दें ।
फलान्वितं कर्कि मृगादिमन्द केन्द्रे तदा व्योनित मध्य भुक्तिः
द्विधार्क भुक्त्या ऋणितार्द्धहार भक्ताप्त युक् स्यान्त्यगति स्फुटेन्दोः । २६ ।
दोनों स्थान के फलो को जोड़ दें । चन्द्र मन्द केन्द्र कर्क आदि राशि में रहने
पर इस योग फल को चन्द्रमध्यम गति में जोड़ेगे तथा मन्दकेन्द्र मकर आदि ६
राशियों में रहने पर मध्यम गति से घटायेंगे । यह चन्द्र की संस्कृत मध्यगति है ।
इसको पुनः दो स्थानों में रखकर एक स्थान में उससे स्फुट रवि गति घटाकर
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८३
आधे हार (हार = (चन्द्रमन्दोच्च-सूक्ष्म सूर्य) का भुज चाप x (रवि मन्दोच्च -सूक्ष्म
रवि) का भुज चाप - १८० + ९०) से भाग दें । लब्धि को अन्य स्थान की संस्कृत
मध्यगति में जोड़े । योग चन्द्रमा की सूक्ष्मतम गति होगी ।
एकत्र नित्यान्यपरत्र काम्यान्यवेक्ष कर्तुं यदि पञ्जिका याम्
असम्मतिः स्याज्जगतः प्रयासात् कार्यं तदा सूक्ष्म मतेन सर्वम् । २७ ।
एक प्रकार के नित्य कर्म के लिए एक पञ्जिका और दूसरे काम्यकर्म के लिए
दूसरी पञ्जिका का कोई आदर नहीं करेगा । अतः बहुत परिश्रम होने पर भी सभी
प्रकार के कामों में के लिये सूक्ष्म पञ्जिका का व्यवहार ही उचित है । स्थूल की
तुलना में सूक्ष्म पञ्जिका अधिक आदरणीय है ।
भूगर्भगे कल्पित सूक्ष्मगोले स्वदेश सूत्राकलित प्रदेशे ।
कदम्ब गोलांकित भागलिप्ते दृष्टा ग्रहाः स्पष्टतया भचक्रे । २८ ।
पृथ्वी की सतह पर हमलोग हैं । भूमि के गर्भ के केन्द्र स्थान से अपने स्थान
तक के सूत्र (रेखा) को आकाश में बढ़ाने पर वह आकाश गोल में जिस बिन्दु
पर मिलता है उसे अपने स्थान का स्वस्तिक (आकाश में ऊंची दिशा में) कहलाता
है । इस खस्वस्तिक और क्रांति वृत्त में जिस स्थान पर ग्रह का राशि अंश आदि
है (ग्रह के बिम्ब से क्रांति वृत्त पर लम्ब बिन्दु) उस बिन्दु तक जाते हुए जो कदम्ब
प्रोत वृत्त (गोलीय रेखा) है, उसी वृत्त पर ग्रह दिखायी पड़ने से गणित गत ग्रह
को स्पष्ट कहा जाता है ।
प्राग् भिर्मता र्यत् सकल क्रियासु तत्सिद्धये पर्यय बीजक्लृप्ति
पृथक् विधा काल वशादि भिन्ने विर्धीयतेस्वी क्रियते च लोकैः । २९ ।
प्राचीन आचार्यों के मत से सभी शुभ कार्य इसी स्पष्ट ग्रह के अनुसार होते
हैं । यही स्पष्ट ग्रह लाने के लिये ज्योतिषी ग्रह का भगण और बीज कर्म संस्कार
आदि करते हैं । उनके परिश्रम के कारण तथा स्पष्ट ग्रह को गणित सिद्ध स्थान
पर देख उसे मानते हैं ।
कर्मार्हपञ्चाङ्ग समत्व सिद्धौ निशापते रेव महोपयोगात्
दृक् सिद्धयेऽस्य त्रिविधं हि बीजं, तुङ्गान्तराद्याख्यमकल्पि सूक्ष्मम् । ३० ।
वैदिक और स्मार्त आदि नित्य और नैमित्तिक कर्म की सिद्धि के ग्रह स्पष्ट
की आवश्यकता है । केवल पञ्चाङ्ग शुद्धि के लिए उनकी अपेक्षा, चन्द्र स्पष्ट
की आवश्यकता अधिक है । इसके दिये तुंगान्तर, पाक्षिक और दिगन्त आदि
बीज संस्कारों की सूक्ष्म कल्पना की गयी है ।
तिथावृडौ द्वित्रिपल प्रमेदो वेद्यः परं विश्वसृंजानचान्यैः ।
श्रेयात् स तत् शक्र (१४) घटी प्रभेदात् समुद्धरेत् सार मरारतो हि । ३१ ।
इन तीन सूक्ष्म बीज संस्कारों के बाद भी तिथि तथा नक्षत्र में २-३ पल का
८४ सिद्धान्त दर्पण
अन्तर (गणना तथा दृष्टि में) पड़ता है, पर बिना संस्कार १४ घटी अन्तर के तुलना
में यह श्रेयस्कर है । इस प्रभेद (२-३ पल) को या इसे दूर करने का उपाय ब्रह्मा
ही समझ सकते है । कोई भी गणना करने पर कुछ त्रुटि अवश्य होगी ।)
यत्तु स्थिरापृष्ठ निवास भाजां दृक् सूत्रतो लम्बन मृक्ष सक्तात्
नभः सदोयञ्च कदम्ब गोल-सूत्रेण विक्षेपवतोऽयनोत्थम् । ३२ ।
पृथ्वि के गर्भ केन्द्र से ग्रह जिस दिशा में है, पृथ्वि की सतह से देखने पर
वह दूसरी दिशा में दीखेगा, दोनों दिशाओं (सूत्रों) का अन्तर (कोणीय) लम्बन
कहलाता है । ख स्वस्तिक और क्रान्ति वृत्त के स्पष्ट ग्रह (ग्रहबिम्ब से क्रान्ति वृत्त
पर लम्ब बिन्दु) तक के वृहद्वृत्त (कदम्ब प्रोत वृत्त) से ग्रह (बिम्ब) की दूरी को
शर या विक्षेप कहते हैं ।
दृक् कर्म साध्यं ध्रुव सूत्र साम्यात् तद् युग्म मर्क ग्रहखेट युत्योः ।
स्यात् केवलं नत्वपरिक्रिया सु खाद्र्द्वेऽयनान्ते स्फुटतावशेषात् । ३३ ।
लम्बन और शर के लिए दृकर्म होता है इसकी आवश्यकता केवल चन्द्र
ग्रहण, रविग्रहण और ग्रह युति में है, उसी प्रसंग में इनकी गणना होगी । तिथि
नक्षत्र आदि में उनकी आवश्यकता नहीं है ।
बृहत् संहितायाम्वेला हीनो पर्वणि गर्भ विपत्तश्च शस्त्र को पश्व ।
अतिवेले कुसुम फलक्षयो भयं शस्य नाशश्च । ३४ । इति ।
वराह मिहिर की वृहत्संहिता में (गणितागत पर्व या ग्रहण के समय वह पर्व
न होने पर हानि के विषय में) लिखा है-गणना द्वारा प्राप्त समय से पूर्व ग्रहण
स्पर्श आदि होने से गर्भ नाश और शस्त्र आदि द्वारा युद्ध होता है । निर्दिष्ट समय
के बाद पर्व होने से फसल की हानि, फूल फलों का क्षय तथा प्रजा के लिए भय
पैदा होता है ।
गर्ग संहिता याम् - हीनातिरिक्त काले फलमुक्तं पूर्वशास्त्र दृष्ट्वात्
स्फुट गणित वेदः कालः कथञ्चिदपि नान्यथा भवति । ३५ ।
गणित समय के पहले या बाद में ग्रहण आदि पर्व होने से जो फल होगा
वह पहले कहा जा चुका है । स्फुट जानने वाले के समय में कभी अन्तर नहीं
पड़ता है ।
दृक् समे पर्वणि नृपा निर्वैरा विगत ज्वराः
प्रजाश्च सुखिनः सर्वे भय रोग विवर्जिताः । ३६ । इति ।
गणित के अनुसार समय से सब होने पर राजाओं के शत्रु नष्ट होते हैं तथा
कष्ट मुक्त होते हैं । प्रजा भी भय और रोग से मुक्त होकर सुखी होते हैं ।
वशिष्ठ वाक्यम् - यस्मिन् पक्षे यत्र काले येन दृग्गणितैक्यकम्
दृश्यते तेन पक्षेण कुर्यात्ति थ्यादि निर्णयम् । ३७ । इति
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८५
वशिष्ठ ने कहा है । (किस ग्रन्थ के अनुसार यह पता नहीं) - जिस मत
(पक्ष) के अनुसार करने पर ग्रह उसी स्थान पर दिखते हैं । (अर्थात् दृक् और
गणित में समानता होती है ।) उसी के अनुसार तिथि आदि का निर्णय करना
चाहिये ।
साकल्यसंहितायाम्साध्य स्पष्टतरं बीजं नलिकादि यन्त्रेभ्यः
तत्संस्कृतास्तु सर्वेपक्षाः साम्यं भजन्त्येव । ३८ ।
साकल्य संहिता में लिखा है-नलिका, (गोल और तुरीय) आदि यन्त्रों के
द्वारा बीज संस्कार (संशोधन) अति स्पष्ट करना चाहिये । अर्थात् प्रत्यक्ष ग्रहस्थिति
देखने पर गणना में जो अन्तर रहता है वह बीज जोड़ या घटाकर दूर करने से
ही सभी नियम ठीक होंगे । प्रत्यक्ष की उपेक्षा नहीं हो सकती ।
किं ते नापि सुवर्णेन कर्णघातं करोति यत् ।
तथा कं तेन् शास्त्रेण यन्न प्रत्यक्षतः स्फुटम् । ३९ ।
जिस सोने के गहने से कान कट जाय उसका क्या लाभ ? इसी प्रकार जिस
शास्त्र का फल प्रत्यक्ष नहीं हो उसकी क्या जरूरत है ?
कर्माह काले लम्बन प्रतिषेधक बीजोपनय ग्रन्थ वचनं यथा-तिथि आदि लाने
के बीज संस्कार में लम्बन का उपयोग नहीं इस सम्बन्ध में ग्रन्थों के वचन हैं-
यदि च लम्बन संस्कृत खेटतस्तिथि मुखा नयनं परिचोद्यते ।
वधिर तर्हि तवश्रुति गोचरं विवथमेव हि लम्बन शासनम् । ४० ।
तिथि आदि निकालने के लिये जो लोग लम्बन संस्कार की बात कहते हैं ।
वह लम्बन के विषय में नहीं जानते हैं । उनका लम्बन ज्ञान वेकार है उन्हें
समझाना वधिर को कहने जैसा है ।
अतः कुमध्याद् गत खार्द्ध सूत्रे दृक् तुल्यता मेति नभश्च रोयः ।
स एव शुद्धः परमार्थतः स्यात् स्फुट स्ततोऽन्ये विहगास्तव तथ्याः । ४१ ।
भूमि गर्भ केन्द्र से ग्रह का सूत्र भगोल के जिस विन्दु तक जाता है । वहां
जो गणितागत ग्रह दिखे वही स्पष्ट है । अन्य ग्रह स्पष्ट नहीं है ।
भूपृष्ठ देशानां भिन्नाः मध्य मेव यतः समम्
तत्तुल्य खेचरानीतं तिथ्यादेववरं ततः । ४२ ।
भूपृष्ठ के अलग अलग देशों से देखने पर अलग अलग तिथि आयेगी (ग्रह
की भिन्न दिशा के कारण) । अतः तिथि की गणना यदि भू गर्भ केन्द्र से की जाय
तो वह सभी स्थानो के लिए एक होने के कारण ज्यादा उपयोगी होगी ।
दृक्करणैक्य विहीनाः खेटाः स्थूला न कर्मणामर्हाः ।
अतः इह तदर्हतायै तात्कालिक बीज विस्तरं वक्ष्ये । ४३ ।
८६ सिद्धान्त दर्पण
दृक् और गणित दोनों के अनुसार एक नहीं होने पर ग्रह का शुभकर्मों में
व्यवहार नहीं हो सकता है । अतः गणित की प्रत्यक्ष उपलब्धि के लिए जो बीज-
कर्म किया जाता है उसका विस्तृत वर्णन करता हूँ ।
भास्कराचार्य-लिप्ताविधोरर्कमही (११२)
मिता मे दृग्गोचराः प्रत्यहमीक्षितस्य ।
कदम्बगोला गत सूत्र पाते क्रान्तौ
धनर्णत्वजुषो भमध्यात् । ४४ ।
भास्कराचार्य (सिद्धान्त शिरोमणि) ने कहा है-मैंने प्रतिदिन चन्द्रमा को देखकर
पाया है कि गणित द्वारा निर्दिष्ट स्थान से चन्द्रमा ११२ लिप्ता पूर्व या पीछे तक
दीखता है । बीज फल के अधिकतम या न्यूनतम होने के समय यह होता है ।
मयाय बीजोपन-ये यदन्ते सूर्योक्त माद्यं परमं रहस्य म्
प्रकाशये गोप्य मपीहवेदं प्रणम्य देवं जगतां हितार्थम् । ४५ ।
स्वयं सूर्य ने बीज के विषय में (सूर्य सिद्धान्त के) अन्त में कहा है कि, यह
परम गोपनीय होने पर भी जगत के हित के लिए देवता और वेद को प्रणाम कर
इसकी व्याख्या करता हूँ ।
ब्रह्मगुप्त सिद्धान्ते च-ब्रह्मोक्तं ग्रह गणितं महता कालेन यत्खिलीभूतम्
अभिधीयते स्फुटं तज्जिष्णु सुत ब्रह्मगुप्तेन । इति । ४६ ।
ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त में-स्वयं ब्रह्मा द्वारा कहा हुआ ग्रहगणित बहुत समय
बीतने पर लुप्त हो गया । अतः विष्णु पुत्र ब्रह्म गुप्त उसको बीज संस्कार आदि
द्वारा स्पष्ट कर कहते हैं ।
लिप्ता विधोरर्क महीति पद्याद् भमध्यता स्याद् विषुवापयस्य
तदाप्य बीजोपन या नुमेयं विक्षेप मन्त्यं कुवसु द्वि (२८१) लिप्तम् । ४७ ।
चन्द्र के गणितागत स्थान से (११२) लिप्तात्मक का अन्तर सम्भवतः विषुव
वृत्त के चन्द्र कक्षा की दूरी के कारण है अतः यह चन्द्रमा के परम विक्षेप (२८१)
लिप्ता) से सम्बन्धित होना चाहिये ।
यतो विधोः सत्रिभ सायनस्य क्रान्ति
ज्यकाखांद्रिगुणेन्दु (१३७०) तुल्या
तद् बाण (२८१) निघ्नी त्रिगुणो (३४३८)
हृताप्तं धनर्णं दृक्कर्म भुजेश (११२) लिप्तम् । ४८ ।
क्योंकि सायन चन्द्र में राशि जोड़ने पर उसकी क्रान्ति ज्या (१३७०) कला
है, और (२८१) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर भी (११२) कला
आती है ।
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८७
आयाति तद्वीक्ष्य तदुक्तमेतत् बोध्यं कदम्ब ध्रुव सूत्रमध्ये
सम्भाव्यते य द्यपिवत् श्रुतोक्ता दृक्कर्म तो भिन्न मितीह बीजम् । ४९ ।
यह फल उतना ही आता है जितना कदम्ब ध्रुव सूत्र तथा गणित ग्रह के
बीच दृक्कर्म द्वारा बीज अन्तर पाया गया है ।
तदापमस्थाद्य विधो र्भमध्ये स्यादत्र कुत्राप्युडु चक्रवृत्ते
तुंगान्तरं तत्फल मन्त्यमेव सूर्येन्दु (११२) तद्बीज फलं तदात्वो । ५० ।
भास्कराचार्य ने इसे आयन दृक् कर्म कहा है, अन्य सिद्धान्तों में अन्य प्रकार
का आयन कर्म हुआ है । अतः इसे बीज संस्कार कहना उचित होगा । मैंने इसे
परम तुंगान्तर फल माना है ।
खाङ्गेन्दु (१६०) लिप्तं चिर
काल तोऽ भूत्तद् वृद्धि हासावुररीक्रियेताम् ।
इत्यादि पूर्वोक्ति भिरेव सिद्धं बीजैः
स्वकालाक्षि समैः स्फुटत्वम् । ५१ ।
(भास्करा चार्य के दृक्कर्म) से लगता है कि तुङ्गान्तर फल का परममान (१६०)
लिप्ता बहुत दिनों सेचला आ रहा है । प्राचीन आचार्यों के अनुसार यह घटता
बढ़ता है अतः बीज संस्कार द्वारा चन्द्र स्फुट करना चाहिये ।
समाः सहस्रान्तर एष्यकाले प्रोक्त क्रमेण प्रथमस्फुटेन्दोः ।
दृक् चन्द्र तोलप्स्यत एव यावान् भेदः स तद्बीजमितिप्रमेय । ५२ ।
तुंगान्तर फल के परम मान में वृद्धि में ह्रास के लिये बीज संस्कार करने के
लिए १ हजार वर्षों के अन्तर पर इस तुंगान्तर मान द्वारा स्फुट ग्रह किया जायेगा ।
प्रत्यक्ष चन्द्र से उसका जितना अन्तर होगा वही बीज संस्कार होगा ।
षट्षष्ठि (६६) दण्डाभ्यधिका तिथि र्या कृत्स्ना पराहद्वयमश्नुतेसा ।
सूक्ष्मैव नान्या तुतथा विधाऽस्यात् षोढाभिदा हिस्मृतिषु-प्रसिद्धा । ५३ ।
स्मृतियों में सूक्ष्म तिथि उसे कहा गया है, जिसमें दो क्रमागत दिनों के
अपराह्न सम्मिलित हों । अतः इस प्रकार इस तिथि में ६६ से अधिक दण्ड स्मृति
अनुसार होंगे ।
(एक मध्यम सावन दिन में ३० दण्ड हैं जिन्हें ५ अह्र प्रति ६ दण्ड में बांटा
गया है-प्रातः, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न, सायाह्न) अपराह्न से अगले मध्याह्न तक
एक दिन रात (६०) दण्ड होगा अगला अपराह्न भी सम्मिलित होने से ६ दण्ड
अधिक होगा ।
सायाह्न मात्र स्पृग् महि पूर्वे परे दिनार्द्धात् पुरतो गता चेत् ।
तत्राद्ध मुक्तं कुतपे परेरद्युः स्मृत्यात्र सूक्ष्मैव मता तिथिः सा । ५४ ।
स्मृति के अनुसार यदि सायाह्न को स्पर्श कर तिथि यदि अगले दिन पूर्वार्द्ध
८८
सिद्धान्त दर्पण
में समाप्त हो जाय तो उस तिथि का श्राद्ध पूर्व दिन नहीं होकर अगले दिन करना
पड़ेगा । अगले दिन भी कुतप तक यह श्राद्ध पूरा होना चाहिये ।
(कुतप-लेखक ने दिन ३० से दण्ड को १५ भागों में बाटा है । प्रतिभाग दो
दण्ड ८ वें भाग १४-१६ दण्ड को कुतप कहते हैं । एक भाग एक मुहूर्त है)
इस उक्ति के अनुसार भी एक तिथि का मान सायाह्न (६ दण्ड) + रात्रि
(३० दण्ड) दिनार्द्ध (१५ दण्ड) = ५१ दण्ड तक होता है ।
कुतप (१४-१६ दण्ड) तक भी ५२ दण्ड तक होता है ।
यह लेखक ने पहले भी कहा है कि ५१ दण्ड की तिथि होगी ।
नोट-प्राचीन आचार्यों के मत बाणवृद्धि रसक्षयः (५४ से ६५ दण्ड की तिथि)
के बदले चन्द्र शेखर मत से ५१ से ६६ दण्ड से अधिक तक की तिथि स्मृति
प्रमाण से भी सिद्ध है ।
यथाह गौतमः- पूर्वाह्ने चेत् प्रतिपदो भूतो सायम मा यदि ।
आरम्भ कुतपे श्राद्धं रोहणं न तुलंघयेत् । इति । ५५ ।
गौतम स्मृति के अनुसार चतुर्दशी के सायाद्ध में अमावस्या आरम्भ होकर
यदि अगले दिन प्रतिपदा तिथि के मध्याह्न पूर्व में समाप्त हो जाय तो कुतप मुहूर्त
(२ दण्ड) में श्राद्ध आरम्भ अगले रोहण मुहूर्त में समाप्त होना चाहिये । (अमावास्या
श्राद्ध) ।
सप्तम्या तिथित्रयक्षयघटीर्दृष्ट्वा रसोनाः (६) पुनः
षोढा भेद विरोध शंकि तहदां मा भूदिहा नादरः
सप्तम्यादिषु (३) पञ्चधान्यतिथिषु द्विःषट्सु (१२) षोढेतिचेत्
तात्पर्यं स्मृतिजं विचिन्त्य मिहदृक् सिद्धैर्नका पिक्षतः । ५६ ।
शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में सप्तमी, अष्टमी और नवमी इन तीन तिथियों
में परम ह्रास ६ दण्ड से कम होता है अतः इन तिथियों के सभी ६ भेद नहीं ५
ही प्रकार के भेद होते हैं, (इनमें ५४ दण्ड से कम की सूक्ष्म तिथि नहीं होती)
अन्य १२ तिथियों के ६ प्रकार के भेद होते हैं । स्मृति का इस प्रकार अर्थ मानने
पर दृक् सिद्ध गणना में कोई त्रुटि नहीं होगी ।
मध्ये पक्ष मिवेन्द्र (१४) संख्य मघटी भेदश्च पक्षान्तयोः
स्याच्चेत् स्थूल तदा ग्रहणयोर्भूरि प्रभेदे क्षणात् ।
प्राञ्चोलोकमियापि सूक्ष्म तिथि मन्वेष्टुंव्यधास्यन् श्रमं
सर्वे भैन्दु युते रनादृततया मन्ये तदीक्षां जहुः । ५७ ।
प्राचीन आचार्य नक्षत्र और उसमें चन्द्र की स्थिति नहीं देखते थे, स्थूल गणना
से पक्षमध्य की तिथियों (७ मी, ८ मी) में सूक्ष्म मत की तुलना में १४ दण्ड तक
का अन्तर पड़ जाता है । लेकिन पक्षान्त में सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण होने के
कारण उसकी सूक्ष्म साधन के लिए उन्होंने बहुत चेष्टा की थी । क्योंकि सामान्य
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८९
लोग ग्रहण द्वारा ही ज्योतिष की शुद्धता की परीक्षा करते हैं । और उसमें भूल
होने पर ज्योतिषियों को अपमान का भय था ।
अथ गर्ग वशिष्ठादि मुनिभिः परिकीर्त्तितम् ।
चिन्त्यं यात्रा विवाहादौ सूक्ष्मर्क्षानयनं ब्रुवे । ५८ ।
यात्रा विवाह और उपनयन आदि शुभ कर्म में विचार्य एवं गर्ग, वशिष्ठ,
मुनि आदि द्वारा निर्णित सूक्ष्म नक्षत्र निकालने का नियम कहता हूँ ।
चन्द्रस्य मध्यमा भुक्ति (७९०।३४-५२) र्भोगः सूक्ष्मउच्यते ।
सार्द्धभोगानि (११८४।५२।१८) षड्
ब्रह्मराधावित्यउत्तराणि च (४,१६,७,११२,२१,२६ ) । ५९ ।
चन्द्र की मध्य गति (७९०।३५।५२) को सूक्ष्म नक्षत्र भोग कहते हैं । इसका
डेढ़ गुणा (११८४।५२।१८) भुक्ति इन ६ नक्षत्रों की है--रोहिणी, अनुराधा, पुनर्वसु
और ३ उत्तरा (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तर भाद्रपद) । ४,१६,७, १२,२१, २६
नक्षत्र)
अर्द्ध भोगानि (३९५।१७।२६) पाशीन्द्रा
हीशयाम्यानिलानि (२४, १८,९,६,२,१५)षट्
शेषपञ्चदशैव (१,३,५,८,१०,१३,१४,१७,१९,२०,
२२,२३,२५,२७) स्युरेका भोगानि मान्यतः । ६० ।
भरणी (२) आर्द्रा (६) अश्लेषा (९) स्वाती (१५) ज्येष्ठा ( १८) शतभिषा
(२४) ६ नक्षत्रों का भोग आधा (३५९।१७।२६) शेष १५ नक्षत्रों का भोग एक
(७९०।३४।५२) होता है ।
सर्वभोगानि (२१३४५।४१।२५) चक्रस्या (२१,६००)
भिजिद्भोगोऽवशेशकः (२५४।१८।३५)
वैश्व (२१)वैष्णवयो (२२) र्मध्ये तद् भोगः स्थितिहेतुतः । ६१ ।
इस २७ नक्षत्रों का कुल भोग (२१३४५।४१।२५) वृत्त की कलाओं (२१,६००)
से घटाने पर शेष (२५४।१८।३५) २८ वें अभिजित् नक्षत्र का भोग आता है जो
उत्तराषाढ़ (२१) तथा श्रवण (२२) नक्षत्र के बीच आता है ।
स्फुटेष्ट खेट लिप्ताभ्यः प्रोज्झयाश्वि न्यादि भोगकान्
विशुद्ध भोग संख्यानि भानि विद्याद् गतान्यतः । ६२ ।
स्फुट ग्रह की कला से अश्विनी नक्षत्र से आरम्भ जितने नक्षत्रों की कलाघट
सकती है, घटायें । यह नक्षत्र संख्या ही गत नक्षत्र है ।
तच्छेषो वर्तमानस्य भोगोऽतिक्रान्त उच्यते ।
अशुद्ध भोगात् परितो भोग्यः स्यात् कलिकात्मकः । ६३ ।
बाकी कला (जिससे पूर्ण नक्षत्र की कला नहीं घट सके) वर्तमान नक्षत्र की
९० सिद्धान्त दर्पण
गत (बीती हुयी) कला है । इसे नक्षत्र की योग कला से घटाने पर भोग्य कला
होगी ।
गतैष्याः कलिकाः षष्ट्या गुणिताः ग्रह भुक्ति भिः ।
विहता घटिकाद्याः स्युर्गतैष्याः फल सम्मिताः । ६४ ।
गत और भोग्य कला को अलग अलग ६० से गुणा कर ग्रह की स्फुट गति
कला से भाग देने पर वर्तमान नक्षत्र की गत और ऐश्य ( भोग्य) दण्ड आदि
समय होगा ।
सम सार्द्धांर्द्ध भोगानां भानां साभिजितामपि ।
विवाहादिषु गृह्यन्ते पादा भोगानुसारतः । ६५ ।
चन्द्र भुक्ति के समान, डेढ गुना या अर्द्ध भोग कला वाले अभिजित सहित
२८ नक्षत्रों की भोग कला में ४ से भाग देने पर उनका एक पाद आता है ।
राश्यन्ते राशि सञ्चारो भान्ते भान्तर सञ्चरः ।
कर्तव्यो नात्र राशीनां नियमो नव भां घ्रयः । ६६ ।
स्थूलनियम के अनुसार एक राशि (१८०० कला) में ९ नक्षत्र पाद (अभिजित्
रहित २७ नक्षत्रों के २७ x ४ = १०८ पाद) = १२ x ९) होंगे । अतः १२ राशियों
के १०८ नक्षत्र पाद मध्यममान के हैं । सूक्ष्म नियम से राशि का भोग नक्षत्र पाद
पूर्ण नहीं करता है ।
यथैव सिंह मध्योः प्रवेशेऽप्येकदास्थिते ।
सूक्ष्म मघा कर्कटान्त्यान् भगानष्टौ भुनक्तिहि । ६७ ।
स्थूल विधि से चौथी राशि कर्क के अन्त तक ४ x ९ = ३६ नक्षत्र पाद या
३६ ÷ ४ = ९ नक्षत्र या अश्लेषा तक नक्षत्र पूर्ण होंगे । अतः ५ वीं सिंह राशि
तथा १० वें मघा नक्षत्र का आरम्भ एक साथ होना चाहिये । लेकिन सूक्ष्म गणना
के अनुसार मघा नक्षत्र सिंह से (८ अंश) पहले कर्क राशि में ही आरम्भ हो जाता
है ।
ग्रहाणां गति लिप्ताभि बिम्बव्यास विलिप्तिकाः ।
हताः संक्रान्ति नाड्यः स्युर्भानोस्ताश्चातिपुण्यदाः । ६८ ।
ग्रहों का केन्द्र बिन्दु किसी राशि के अन्तिम बिन्दु (जो अगली राशि का
आरम्भ बिन्दु है) पर पहुंचने के समय को सूक्ष्म संक्रमण काल कहते हैं । पूर्ण
संकर्मण समय वह है जब ग्रह का बिम्ब संक्रमण बिन्दु को स्पर्श कर उसे पूर्ण
रूप से पार करता है । इसे निकालने के लिए बिम्ब के व्यास विकला में ग्रह
की गति कला से भाग देने पर प्राप्त नाड़ी (दण्ड) आदि को संक्रमण समय कहते
हैं । इस संक्रमण समय में सूर्य अत्यन्त शुभ फल देता है ।
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९१
भवन्ति मिश्र फलदाः स्व संक्रान्ति गता ग्रहाः ।
मण्डलस्यो भय स्थित्वा द्वयं नक्षत्र सन्धिगाः । ६९ ।
अपनी संक्रान्ति काल में ग्रह दोनों राशियों का (मिश्र) फल देते हैं । इसी
प्रकार एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र में जाते समय भी उनका बिम्ब (मण्डल) जब
तक संक्रमण बिन्दु पर रहता है, ग्रह दोनों नक्षत्रों का फल देते हैं ।
विकला विधु बिम्बस्यार्केन्दु भुक्त्यन्तरेण च ।
चन्द्र भुक्त्या च चन्द्रार्क भुक्ति योगेन चैतयोः । ७० ।
चन्द्र बिम्ब की विकला को (१) रविचन्द्र की भुक्ति अन्तर (२) चन्द्र गति
(३) चन्द्र और रवि गति योग, और
गत्यन्तरेण च हृता लब्धा दण्डादयः पृथक्
गत्य नक्षत्र योगानां करणानाञ्च सन्धयः । ७१ ।
(४) चन्द्र और रवि की गति का अन्तर-से भाग देने पर क्रमानुसार (१) तिथि
(२) नक्षत्र (३) योग और (४) करण सन्धि का समय आता है । (तिथि और
उसका आधा करण दोनों की गति एक प्रकार है अतः सन्धि समय निकालने की
विधि एक ही है ।
उत्पद्यन्ते यतोऽनन्ते तुङ्गापक्रम पातजा-
वीथयो मण्डला काराः स्वकक्षाषु पृथग् विधाः । ७२ ।
उच्च, क्रान्ति, तथा पात के अपने रास्तों से अनेक वृत्ताकार कक्षायें बनती
हैं ।
तद्ग्रहाणां गतिमार्गः शीघ्र मन्दोच्च कर्षजः ।
प्रतिमण्डल नामा स्यात् क्रान्तिजातोऽपमण्डलः । ७३ ।
शीघ्र और मन्दोच्च के आकर्षक की गति से ग्रह का जो मार्ग है उसे प्रतिमण्डल,
क्रान्ति की गति का मार्ग अपमण्डल कहलाता है ।
विक्षेपमार्ग, पातोत्थः कथ्यते च विमण्डलः
विषुवन्मण्डला द्यास्तु वक्ष्यन्तेऽन्यप्रकाशके । ७४ ।
क्रान्ति वृत्त से विक्षेप के कारण पात का मार्ग विमण्डल कहा जाता है ।
विषुव और अन्य बल के बारे में अगले अध्याय में कहा जायेगा ।
प्रतिलोम गतेः कल्पे क्रान्ति पातस्य पर्ययाः ।
दृक् समाः कल्पिताः खाद्रि चन्द्रा म्बुधिषण् मिताः (६४०१७०) । ७५ ।
ग्रहों की सामान्य गति की विपरीत दिशा में क्रान्ति पात ( क्रान्ति वृत्त और
विषुव वृत्त का संपात या मिलन बिन्दु) की गति होती है । एक कल्प में इसके
पूर्ण भगण (चक्र) दृक् कर्म (लेखक द्वारा) के अनुसार (६४०१७०) हैं ।
९२ सिद्धान्त दर्पण
भचक्रं संग्रहं सोऽयं सपातं सकलार्द्ध वगः ।
प्राक् पश्चात् प्रेरयत्येष क्रान्ति मार्गानुसार तः । ७६ ।
यह पात सभी ग्रह नक्षत्र तथा गोल के ऊपर है (क्रान्ति वृत्त तथा विषुव वृत्त
के तलों का मिलन बिन्दु इन सबसे अधिक दूरी पर है) यह क्रान्ति वृत्त के तल
में इन सभी भचक्रों को पूर्व से पश्चिम की तरफ चलाता है ।
सप्त विंशति भागान्तं प्राचीं मेषादिषट्क भाक् ।
प्रतीची प्रतितौल्यादि भार्द्धगः प्रक्षिपत्ययम् । ७७ ।
यह पात मेष आदि ६ राशियों में रहने पर नत्र और ग्रह आदि को पूर्व की
तरफ २७ अंश ले जाता है । तथा तुला आदि राशियों में रहने पर पश्चिम की
तरफ २७ अंश ढकेलता है ।
यत्प्रेरणा द्रवि मुखास्तारा-स्व स्वापमस्थिताः ।
विक्षिप्ता इव दृश्यन्ते स्वस्था नाद् याम्य सौम्ययोः । ७८ ।
इस पात के कारणं रवि आदि ग्रह तथा अश्विनी आदि नक्षत्र अपनी अपनी
क्रान्ति के आगे (शून्य क्रान्ति पर) रहने पर भी दक्षिण या उत्तर की तरफ विक्षिप्त
दीखते हैं ।
इष्टैर्दिनै स्तद् भगणा गुणिताः कल्प सावनैः
उद् धृता भगणाक्षादिः क्रान्तिः पातः स्फुटो भवेत् । ७९ ।
इष्ट दिन का क्रान्ति पात निकालने के लिये क्रान्ति पात के कल्प भगण को
अहर्गण से गुणा कर कल्प सावन दिन (१५,७७,९१, ७८,२८,०००) से भाग देते
हैं । भगण और राशि आदि क्रान्ति पात आयेगा ।
तद्राश्याद्यं चक्रशुद्धं ग्राह्यं तद् बाहु लिप्तिका
द्विशताप्ताः फलानिस्यु श्चलां शास्तेऽयनांशकाः । ८० ।
इस राशि आदि फल को १२ राशि से घटाकर शेष की भुजकला निकालते
हैं । भुजकला को २०० से भाग देने से फल चलांश होगा । चलांश ही अयनांश
है ।
शिष्टाः षष्टि हतास्तेन हारेणा (२००)प्ताः कलादिकाः
साष्टविंशति षष्ट्यंशाः परा नव (९।२८) गति दिने । ८१ ।
२०० से भाग देने पर जो शेष बचा उसे ६० से गुणा कर २०० से भाग देने
पर कला आदि फल होगा । एक दिन में अयनांश गति ९।२८ परा आदि है ।
करुणाब्द मुखेऽशाब्दा दृग् दृशो (२२) भूः (१) कुसायकाः (५१)
शराब्धयो (४५) द्विवैदाश्च (४२) धनारूया वृद्धिशालिनः । ८२ ।
करणाब्द आरम्भ (१८६० ई. मकर संक्रान्ति लंकोदय) में अयनांश अंश २२ ।
१।५१।४५।४२ आदि था ।
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९३
तुलाधरादि चक्रार्द्ध स्थिते पातेऽय नांशकाः ।
ऋणा खास्तत्र मेषादि भार्द्धस्थे धन संज्ञकाः । ८३ ।
क्रान्तिपात तुलादि ६ राशि में रहने से अयनांश को ऋण ( घटाना) तथा
मेषादि ६ राशि में रहने से धन (योग) किया जाता है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तत्संस्कृताद् ग्रहात्क्रान्ति छायाचर दलादिकम् ।
स्फुटं दृक् तुल्यतां गच्छे दयने विषुवद्द्वयम् । इति । ८४ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-अयनांश संस्कृत ग्रह से ही क्रान्ति छाया, चरखण्ड
आदि निकाला जाता है । क्रान्ति पात की गति को विषुवक्रान्ति (कर्क संक्रान्ति
या उत्तर अयन तथा मकर संक्रान्ति या दक्षिणायन) के समय प्रत्यक्ष देखा जा
सकता है ।
सप्तर्षीणामगस्त्यस्य तथा संयमनी पतेः
तत्तत्पार्श्वस्थ ताराणां क्रान्ति पातो न चालकः । ८५ ।
सप्तर्षि, अगस्त्य और यम तथा इनके अति निकट के तारा गण की क्रान्ति
पात के कारण कोई गति नहीं है ।
एतेषां भगणस्थानां स्वस्थानाद् यदि दृश्यते ।
प्राग् गतिश्चलितं चक्रं तत्पश्चादवधारयेत् । ८६ ।
इनकी गति नक्षत्र मण्डल के भीतर पूर्व की तरफ होने से समझना चाहिये
कि नक्षत्र चक्र पश्चिम कीतरफ घूम गया है ।
प्रत्यग् गतौ पूर्व चारं क्रान्तिं तदनुसारतः ।
क्रान्ति मार्गात् शरं भानां दिग् भेदं तद् वशाद् बुधः । ८७ ।
सप्तर्षि आदि को पश्चिम गति दीखने का अर्थ है । भचक्रकी पूर्वः गति हुई
है । इस धारणा के अनुसार ज्योतिर्विद नक्षत्रों की क्रान्ति वृत्त से शर या उत्तर
दक्षिण विक्षेप का निर्णय करते हैं ।
छायार्कात् साधिता दल्पे करणागत भास्वति
तदन्तर मिताभागाः प्राक् चलांशाः प्रकीर्त्तिताः । ८८ ।
छाया द्वारा निकाले गये सूर्य से गणित साधिन सूर्य के राशि आदि में जो
थोड़ा सा अन्तर रहता है उसे ही अयनांश समझना चाहिये । इस अयनांश की
गति भी पूर्व की तरफ है ।
करणा गत चण्डांशो रल्पोच्छायां विवस्वति
प्रत्यक् चलांश विज्ञेया स्तदन्तर मिताः स्फुटाः । ८९ ।
इसके विपरीत यदि गणित द्वारा निकाले सूर्य के अंश से छाया द्वारा निकाले
सूर्य का अंश कम है, उनका अन्तर पश्चिम गति वाला अयनांश है ।
९४ सिद्धान्त दर्पण
किं वायन द्वयेभानो रेक क्रान्ति स्थिति र्यदा ।
तत्काल स्फुट योगार्द्ध मयनान्त गृहादिकम् । ९० ।
कर्क और मकर संक्रान्ति के समय (अर्थात् दोनों अयनों में ) जब दोनों समय
रवि की क्रान्ति समान होगी, दोनों समय के रवि की राशि आदि का योग कर
आधा करने पर अयनांश का परिमाण आयेगा ।
तस्य चायन संक्रान्ते रन्तरस्था श्रलांशकाः
प्राक् पश्चादयने क्रान्तेर्धनर्णाख्या क्रमादयः । ९१ ।
निरयन कर्क और मकर संक्रान्ति से पहले सायन कर्क और मकर संक्रान्ति
दीखने से अयनांश जोड़ा (धन) जायेगा अन्यथा घटाया जायेगा ।
प्राक् पश्चिमायतस्यैव ग्रह सञ्चार वर्त्मनः
पार्श्वयोर्वक्रता नाम क्रान्तिश्चापक्रमोऽपम् । ९२ ।
ग्रह कक्षा और विषुववृत्त दोनों पूर्व पश्चिम दिशा में फैले हैं तथा वे एक
दूसरे को आकाश में जहां काटते हैं उससे क्रान्ति होती है । अतः ग्रह से ग्रह
कक्षा के दक्षिण या उत्तर विषुववृत्त तक जो अन्तर (ध्रुव प्रोत वृत्त पर) है उसे
क्रान्ति कहते हैं । इसका अन्य नाम अपम या अपक्रम भी है ।
खगोले कल्प्यते रेखा क्रान्ति मार्ग भिधा हि या
वैलोम्यात् संस्कृते चक्रे चलांशैरादि मध्ययोः । ९३ ।
आकाश गोल में कल्पित रेखा जिसे क्रान्ति वृत्त या मार्ग कहा जाता है उसमें
बारह राशियां हैं । इनमें प्रथम और सप्तम राशि में अयन संस्कार करेंगे ।
सा न भो मध्यगा राशि त्रयान्ते सौम्यगा ततः ।
यावत् सार्द्ध त्रिपक्षांशा (२३।३०) नवभान्तेऽपि याम्यगा । ९४ ।
संस्कार के बाद मेष और तुला का जो स्थान होगा उससे ३ राशि पर (कर्क
और मकर) क्रान्ति और विषुववृत्त का दो सम्पात होगा । सम्पात से ३ राशि के
अन्तर पर क्रान्ति और विषुव वृत्त के बीच सर्वाधिक (परम) दूरी २३°।३०' होगी ।
क्रान्तिज्या परमातस्मात् खाद्रि विश्व (१३७०) कलोच्यते
चलांश संस्कृतानां या ग्रहाणां बाहु मौर्विका । ९५ ।
परम क्रान्ति (२३।३०) की ज्या (१३७०) होगी । चलांश संस्कार करने पर
ही ग्रहों का भुजफल और ज्या निकाला जाता है ।
परमापक्रम ज्या (१३७०) घ्नी सोद् धृता त्रिज्यया (३४३८) थवा
शत (१००) घ्नी चन्द्र तत्वा (२५१) प्ता क्रान्ति ज्या साभिधीयते । ९६ ।
स्पष्ट ग्रह में अयनांश जोड़कर उसकी भुजज्या में परम क्रान्ति की ज्या (१३७०)
से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देंगे अथवा (१००) से गुणा कर (२५१)से
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९५
भाग देंगे । वह स्पट ग्रह की क्रान्ति ज्या होगी ।
तद् धनुः क्रान्ति कलिकाःक्रान्ति ज्या वर्ग वर्जितात्
त्रिज्यावर्गात् (१,१८,१९,८४४) पदंद्युज्या स्वाहोरात्रार्द्धकर्णकः । ९७ ।
क्रान्तिज्या का चाप करने से क्रान्ति कला होगी । त्रिज्या वर्ग से क्रान्तिज्या
वर्ग को घटा कर शेष का वर्गमूल लेने पर द्युज्या होगी जो कि अहोरात्र वृत्त का
व्यासार्द्ध है ।
शतघ्नी खेट कोटिज्या भूतत्वा (१५१) प्ता सुभुक्तिभिः
गुणिता त्रिज्यया (३४३८) भक्ता लब्धाः स्युः क्रान्ति भुक्तयः । ९८ ।
स्फुट ग्रह की भुज कोटि ज्या को १०० से गुणा कर २५१ से भाग देकर फल
को ग्रह की दैनिक गति से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर दैनिक
क्रान्ति गति प्राप्त होगी ।
अयनांशैः संस्कृतस्य ग्रहस्याद्यन्त भार्द्धयोः ।
स्फुट क्रान्ति क्रमाद् गोलौ सौम्ययाम्यौ भिधौमतौ । ९९ ।
अयन संस्कृत ग्रह की प्रथम वृत्त पाद में उत्तर की तरफ क्रान्तिं होती है ।
तथा ३ य पाद में पुनः दक्षिण की तरफ क्रान्ति होगी ।
भास्करस्यमते नास्ति प्रत्यक् चलन मायनम् ।
ग्रहे तत्संस्कृते रेव धनत्वं वर्णितं यतः । १०० ।
भास्करा चार्य के मत से अयन की गति पश्चिम दिशा में नहीं होती है है अतः
उन्होंने स्पष्ट ग्रह में अयनांश जोड़ने के बारे में ही कहा है ।
तथापि ब्रह्म सौरोक्ते युक्ते 'श्चात्र मयादितम् ।
प्राक् प्रत्यक् चलनं किन्तु छायार्काद् ज्ञास्यतेऽखिलम् । १०१ ।
तथापि ब्रह्म (स्फुट) सिद्धान्त तथा सूर्य सिद्धान्त के मत अनुसार मैने अयन
की गति पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में मानी है । छाया द्वारा रवि साधन करने
से सभी अच्छी तरह स्पष्ट होगा ।
क्रान्तिज्या विषुवद् भाघ्नी द्वादशाप्ता क्षितिज्य का
त्रिज्या हताद्यु जीवाप्ता चरज्या थ चरासवः । १०२ ।
क्रान्ति ज्या को (विषुव छाया) पलभा से गुणा कर १२ से भाग देने पर
क्षितिज्या होगी । उसे त्रिज्या (३४३८) से गुणा कर द्युज्या से भाग देने पर चरज्या
होगी । इससे चरप्राण निकालें ।
तद् धनुस्ते रुदक् क्रान्तौ धन हीनौ पृथक् स्थितौ ।
सूर्य सिद्धान्ते-स्वाहॊरात्र चतुर्थांशौ दिन रात्रि दले स्मृते । १०३ ।
दिन रात्रि के चौथे भाग (१५ दण्ड) उत्तर क्रान्ति रहने पर चरप्राण जोड़ने से,
९६ सिद्धान्त दर्पण
दिनार्द्ध तथा घटाने से रात्रि का अर्द्ध होता है । दक्षिण क्रान्ति रहने पर १५ दण्ड
से चर प्राण घटाने पर दिनार्द्ध तथा जोड़ने पर रात्रि अर्द्ध होता है ।
याम्यक्रान्तौ विपर्य्यस्ते द्विगुणे ते दिनक्षपे । इति ।
शर युक्तो नित क्रान्त्या भचन्द्रा देरपि स्वके । १०४ ।
दिनार्द्ध और रात्रि अर्द्ध का दुगुना करने से दिन और रात्रि का मान आता
है । सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण समाप्त) नक्षत्र, चन्द्र तथा अन्य ग्रहों का भी दिन
और रात्रि का मान निकालने के लिए उनके शर को क्रान्ति में जोड़कर (शर और
क्रान्ति एक दिशा में रहने पर) या घटा कर स्पष्ट क्रान्ति निकालेंगे तथा पूर्व नियम
से कार्य होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेप संयुता ।
दिग्भेदेऽन्तरिता स्पष्टा भास्करस्य यथागता । इति । १०५ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-क्रान्ति में शर जोड़ने में घटाने में स्पष्ट क्रान्ति होती
है । शर और क्रान्ति एक दिशा में होने पर जोड़ा जाता है । अलग दिशा में होने
पर अन्तर होता है । सूर्य का शर नहीं होने के कारण उसका जोड़ने या घटाने
का प्रश्न नहीं होता ।
व्यवहृत्यै चरं स्थूलं पलात्मक मदूय्य॑ते ।
एक द्वित्रि गृहान्तो त्थं स्वदेशज चरत्रयम् । १०६ ।
व्यवहार के लिए चर का पलात्मक मान निकालने की स्थूल विधि कही
जाती है । एक दो और तीन राशियों के अन्त में उनका अपना अपना चर कला
निकालें ।
आनीय त्रिभजाच्छोध्यं द्विभजं द्विभजा पुनः
एक राशिज मेवं स्याच्चर खण्ड त्रयं पृथक् । १०७ ।
३ राशि से २ राशि का चरकला घटाने पर ३ य चर खण्ड, २ राशि से १
राशि का चरकला घटाने पर द्वितीय चरखण्ड, तथा एक राशि की चर कला
प्रथम चर खण्ड-इस प्रकार मेष आदि राशियों के तीन चर खण्ड मिलते हैं ।
सायनार्कादि दो राशि भाग लिप्ताः पृथक् स्थिताः
एक राशि र्यदिन्यूनास्तदा भागाश्च लिप्ति काः । १०८ ।
अयन संस्कृत सूर्य आदि ग्रहों के भुज राशि अंश कला अलग अलग कर
रखेंगे । यदि यह एक राशि से कम हो तो इसके अंश और कला अलग रखेंगे ।
चरेणाद्येन गुणिताः शेषात् षष्ट्याप्त संयुताः ।
त्रिंशद् विभाजिता शून्यैराशि स्थाने फलान्विताः । १०९ ।
राशि, अंश और कला को अलग अलग प्रथम चार खण्ड से गुणा कर कला
स्थान के फल को ६० से भाग देकर लब्धि को अंश में जोड़ते हैं तथा शेष को
सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९७
कला रखते हैं । अब अंश में चरखण्ड से गुणा कर उसमें ३० से भाग देते हैं और
लब्धि को राशि में जोड़ते हैं । शेष अंश फल होगा ।
तद् बाहुराशि रेकश्च तत्स्थाने प्रथमं चरम् ।
निधायां शादिकं क्षुण्णं द्वितीये न तथाहतम् । ११० ।
भुज में एक राशि होने पर स्थान में प्रथम चरखण्ड को रख अंश आदि द्वितीय
चरखण्ड से गुणा कर ३० से भाग देंगे तथा काल को प्रथम चर खण्ड में जोड़ने
से स्पष्ट कर होगा ।
फलात्यं प्रथमं स्पष्टं बाहु राशि द्वयं यदि
तत्रादि द्वियुतिः स्थाप्या तृतीय घ्नं लवादिकः । १११ ।
भुज यदि २ राशि है तो प्रथम और द्वितीय चर खण्ड का योग राशि स्थान
में रख अंशादि को तृतीय चर खण्ड से गुणा करेंगे ।
त्रिंशदाप्तं युतं प्राग् वत् इत्थं स्याद्विस्फुटं चरम्
प्रत्यंशं तद् विभज्या वा सूर्यस्यै कैक राशि जम् । ११२ ।
फल को ३० से भाग देकर लब्धि को राशि में जोड़ने से स्पष्ट होगा । अथवा
रवि का एक एक राशि का चर लेकर प्रति अंश का कितना चर है यह निकालेंगे ।
अथोदयान्तर पलान्यर्कात् सायन संस्कृतेः ।
क्रमाद् वृद्धि क्षयाढ्यानि राश्यर्द्धेषु त्रिषु त्रिषु । ११३ ।
अब सायन सूर्य से उदयान्तर पल (लंका में स्पष्ट सूर्योदय तथा मध्यम सूर्योदय
में अन्तर) निकालने की विधि कही जाती है । (क्रान्ति वृत्त की वक्रता के कारण
इसे विषुत वृत्त का समय समीकरण कहा जाता है । यह क्रम से तीन राशि अर्द्ध
में बढ़ता है उसके बाद तीन राशि अर्द्धतक घटता है ।
सूर्या (१२) नव् (९) च वेदाश्च (४) वेदा (४) नव (९)
भानवः (१२) त्रयमाद्यं वर्द्धमानं क्षीयमाणं ततस्त्रयम् । ११४ ।
क्रान्ति और विषुत वृत्त के प्रथम संम्पात से प्रथम तीन राशि अर्द्ध पर्यन्त
उदयान्तर फल में क्रमशः १२,९ और ४ की वृद्धि होती है । तथा चतुर्थ राश्यर्द्ध
से प्रथम पाद (९०) अन्त तक उसी क्रम से ह्रास होता है अर्थात् क्रमशः ४,९,१२
की कमी होती है ।
स्व भार्द्धं फल संख्याघ्ना स्तिथ्या (१५) प्तास्तेष्टिनांशकाः
फलं प्राक् फलतः स्वर्ण कार्यं वृद्धि क्षय क्रमात् । ११५ ।
जितने राशि अर्द्ध (१५°) पूर्ण हो गये हैं उनका फल निकालते हैं । राशि
अर्द्ध के गत अंशों को राशि अर्द्ध फल से गुणा कर १५ से भाग देते हैं । फल को
पूर्ण राशि अर्द्ध के फल में जोड़ते हैं (यदि उदयान्तर फल बढ़ रहा है) या घटाते
हैं ।
तत्व (२५) संख्यार्क दोः कोटि साम्ये स्यादाय सन्धिषु
गोलायन भवेष्वेषां शून्य तास्या ऋतुर्षतः । ११६ ।
जब रवि का भुजांश ४५° (३ x १५° या तृतीय राशि अर्द्ध) हो तो उसका
परम उदयान्तर फल २५ पल (१२ + ९ + ४ पल) होता है, उसके बाद पुनः
घटने लगता है । रवि के सम दिवस या उससे चौथी राशि (०°, ९०°, १८०°,
२७०° भुजांश पर) उदयान्तर पल शून्य होता है ।
तद् घ्नी भुक्ति रहोरात्र पला (३६००) प्राप्त कलादिकम् ।
सायनाक्र्कौजयुग्मांघ्रय कार्यं खेतेष्टणं धनम् । ११७ ।
उदयान्तर पल को ग्रह की दैनिक गति से गुणा कर एक दिन की पल संख्या
(३६००) से भाग देते हैं । फल को मध्यम ग्रह में जोडते हैं (यदि सूर्य का भुजांश
सम पद में हो) अन्यथा घटाते हैं । यह लंका का मध्योदय कालिक ग्रह होगा ।
ग्रहस्तिष्ठति यद्राशा वयनांश परिष्कृताः ।
तस्योदयासू गुणिता भुक्तिराशि कलो (१८००) दह्रता । ११८ ।
ग्रह की राशि में अयनांश जोड़कर, सायन राशि का उदय असु निकालते
हैं । उदय असु को ग्रह की दैनिक गति से गुणा कर राशि की कला संख्या
(१८००) से भाग देते हैं ।
तत्फला द्या शक्र लिप्ताः (२१,६००) स्वाहोरात्रासवोम्रताः
ग्रहे वक्र गतौ तेन फलेन परिवर्जिताः । ११९ ।
फल को वृत्त ३६०° की कला (२१,६००) में जोड़ते हैं । यदि ग्रह मार्गी हो
। वक्री होने पर (२१,६००) से फल को घटाते हैं । फल ग्रह का दिन परिणाम
होगा अर्थात् उदय होने के फिर उतने समय बाद उदय होगा ।
स्थूलं तु नाड़िका षष्ठिः (६०) सूर्य सावन वासरम्
तत्रांकशर (५९) हीनाः स्युर्ग्रहर्क्षस्व दिनासवः । १२० ।
सूर्य सावन दिन का परिणाम स्थूलतः (प्रायः) ६० दण्ड (नाड़ी) है । उससे
५९ लिप्ता कम एक नाक्षत्र दिन होता है । ग्रह का सावन दिन निकालने की विधि
कही जा चुकी है ।
स्थूले दिने चेदुदयाः साध्यास्तात्कालिकाद्रवेः
सूक्ष्मेत्वौदयिकाद् भानो स्तदा तद् भादयः स्फुटाः । १२१ ।
राशि का उदय (जो राशि पूर्व क्षितिज पर आये) लग्न कहलाता है । उदय
काल में जो सूर्य का राशि अंश हैं वही लग्न है । उसके बाद रवि गति कला
से उत्पन्न असु को ६० दण्ड में जोड़कर सावन अहोरात्र का परिणाम निकालते
हैं । इष्ट कालिक रवि से राशि का उदय (लग्न) निकालते हैं ।