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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 609 में से

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पृष्ठ 182

सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८५
वशिष्ठ ने कहा है । (किस ग्रन्थ के अनुसार यह पता नहीं) - जिस मत
(पक्ष) के अनुसार करने पर ग्रह उसी स्थान पर दिखते हैं । (अर्थात् दृक् और
गणित में समानता होती है ।) उसी के अनुसार तिथि आदि का निर्णय करना
चाहिये ।
साकल्यसंहितायाम्साध्य स्पष्टतरं बीजं नलिकादि यन्त्रेभ्यः
तत्संस्कृतास्तु सर्वेपक्षाः साम्यं भजन्त्येव । ३८ ।
साकल्य संहिता में लिखा है-नलिका, (गोल और तुरीय) आदि यन्त्रों के
द्वारा बीज संस्कार (संशोधन) अति स्पष्ट करना चाहिये । अर्थात् प्रत्यक्ष ग्रहस्थिति
देखने पर गणना में जो अन्तर रहता है वह बीज जोड़ या घटाकर दूर करने से
ही सभी नियम ठीक होंगे । प्रत्यक्ष की उपेक्षा नहीं हो सकती ।
किं ते नापि सुवर्णेन कर्णघातं करोति यत् ।
तथा कं तेन् शास्त्रेण यन्न प्रत्यक्षतः स्फुटम् । ३९ ।
जिस सोने के गहने से कान कट जाय उसका क्या लाभ ? इसी प्रकार जिस
शास्त्र का फल प्रत्यक्ष नहीं हो उसकी क्या जरूरत है ?
कर्माह काले लम्बन प्रतिषेधक बीजोपनय ग्रन्थ वचनं यथा-तिथि आदि लाने
के बीज संस्कार में लम्बन का उपयोग नहीं इस सम्बन्ध में ग्रन्थों के वचन हैं-
यदि च लम्बन संस्कृत खेटतस्तिथि मुखा नयनं परिचोद्यते ।
वधिर तर्हि तवश्रुति गोचरं विवथमेव हि लम्बन शासनम् । ४० ।
तिथि आदि निकालने के लिये जो लोग लम्बन संस्कार की बात कहते हैं ।
वह लम्बन के विषय में नहीं जानते हैं । उनका लम्बन ज्ञान वेकार है उन्हें
समझाना वधिर को कहने जैसा है ।
अतः कुमध्याद् गत खार्द्ध सूत्रे दृक् तुल्यता मेति नभश्च रोयः ।
स एव शुद्धः परमार्थतः स्यात् स्फुट स्ततोऽन्ये विहगास्तव तथ्याः । ४१ ।
भूमि गर्भ केन्द्र से ग्रह का सूत्र भगोल के जिस विन्दु तक जाता है । वहां
जो गणितागत ग्रह दिखे वही स्पष्ट है । अन्य ग्रह स्पष्ट नहीं है ।
भूपृष्ठ देशानां भिन्नाः मध्य मेव यतः समम्
तत्तुल्य खेचरानीतं तिथ्यादेववरं ततः । ४२ ।
भूपृष्ठ के अलग अलग देशों से देखने पर अलग अलग तिथि आयेगी (ग्रह
की भिन्न दिशा के कारण) । अतः तिथि की गणना यदि भू गर्भ केन्द्र से की जाय
तो वह सभी स्थानो के लिए एक होने के कारण ज्यादा उपयोगी होगी ।
दृक्करणैक्य विहीनाः खेटाः स्थूला न कर्मणामर्हाः ।
अतः इह तदर्हतायै तात्कालिक बीज विस्तरं वक्ष्ये । ४३ ।