सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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अन्तर (गणना तथा दृष्टि में) पड़ता है, पर बिना संस्कार १४ घटी अन्तर के तुलना
में यह श्रेयस्कर है । इस प्रभेद (२-३ पल) को या इसे दूर करने का उपाय ब्रह्मा
ही समझ सकते है । कोई भी गणना करने पर कुछ त्रुटि अवश्य होगी ।)
यत्तु स्थिरापृष्ठ निवास भाजां दृक् सूत्रतो लम्बन मृक्ष सक्तात्
नभः सदोयञ्च कदम्ब गोल-सूत्रेण विक्षेपवतोऽयनोत्थम् । ३२ ।
पृथ्वि के गर्भ केन्द्र से ग्रह जिस दिशा में है, पृथ्वि की सतह से देखने पर
वह दूसरी दिशा में दीखेगा, दोनों दिशाओं (सूत्रों) का अन्तर (कोणीय) लम्बन
कहलाता है । ख स्वस्तिक और क्रान्ति वृत्त के स्पष्ट ग्रह (ग्रहबिम्ब से क्रान्ति वृत्त
पर लम्ब बिन्दु) तक के वृहद्वृत्त (कदम्ब प्रोत वृत्त) से ग्रह (बिम्ब) की दूरी को
शर या विक्षेप कहते हैं ।
दृक् कर्म साध्यं ध्रुव सूत्र साम्यात् तद् युग्म मर्क ग्रहखेट युत्योः ।
स्यात् केवलं नत्वपरिक्रिया सु खाद्र्द्वेऽयनान्ते स्फुटतावशेषात् । ३३ ।
लम्बन और शर के लिए दृकर्म होता है इसकी आवश्यकता केवल चन्द्र
ग्रहण, रविग्रहण और ग्रह युति में है, उसी प्रसंग में इनकी गणना होगी । तिथि
नक्षत्र आदि में उनकी आवश्यकता नहीं है ।
बृहत् संहितायाम्वेला हीनो पर्वणि गर्भ विपत्तश्च शस्त्र को पश्व ।
अतिवेले कुसुम फलक्षयो भयं शस्य नाशश्च । ३४ । इति ।
वराह मिहिर की वृहत्संहिता में (गणितागत पर्व या ग्रहण के समय वह पर्व
न होने पर हानि के विषय में) लिखा है-गणना द्वारा प्राप्त समय से पूर्व ग्रहण
स्पर्श आदि होने से गर्भ नाश और शस्त्र आदि द्वारा युद्ध होता है । निर्दिष्ट समय
के बाद पर्व होने से फसल की हानि, फूल फलों का क्षय तथा प्रजा के लिए भय
पैदा होता है ।
गर्ग संहिता याम् - हीनातिरिक्त काले फलमुक्तं पूर्वशास्त्र दृष्ट्वात्
स्फुट गणित वेदः कालः कथञ्चिदपि नान्यथा भवति । ३५ ।
गणित समय के पहले या बाद में ग्रहण आदि पर्व होने से जो फल होगा
वह पहले कहा जा चुका है । स्फुट जानने वाले के समय में कभी अन्तर नहीं
पड़ता है ।
दृक् समे पर्वणि नृपा निर्वैरा विगत ज्वराः
प्रजाश्च सुखिनः सर्वे भय रोग विवर्जिताः । ३६ । इति ।
गणित के अनुसार समय से सब होने पर राजाओं के शत्रु नष्ट होते हैं तथा
कष्ट मुक्त होते हैं । प्रजा भी भय और रोग से मुक्त होकर सुखी होते हैं ।
वशिष्ठ वाक्यम् - यस्मिन् पक्षे यत्र काले येन दृग्गणितैक्यकम्
दृश्यते तेन पक्षेण कुर्यात्ति थ्यादि निर्णयम् । ३७ । इति