सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८९
लोग ग्रहण द्वारा ही ज्योतिष की शुद्धता की परीक्षा करते हैं । और उसमें भूल
होने पर ज्योतिषियों को अपमान का भय था ।
अथ गर्ग वशिष्ठादि मुनिभिः परिकीर्त्तितम् ।
चिन्त्यं यात्रा विवाहादौ सूक्ष्मर्क्षानयनं ब्रुवे । ५८ ।
यात्रा विवाह और उपनयन आदि शुभ कर्म में विचार्य एवं गर्ग, वशिष्ठ,
मुनि आदि द्वारा निर्णित सूक्ष्म नक्षत्र निकालने का नियम कहता हूँ ।
चन्द्रस्य मध्यमा भुक्ति (७९०।३४-५२) र्भोगः सूक्ष्मउच्यते ।
सार्द्धभोगानि (११८४।५२।१८) षड्
ब्रह्मराधावित्यउत्तराणि च (४,१६,७,११२,२१,२६ ) । ५९ ।
चन्द्र की मध्य गति (७९०।३५।५२) को सूक्ष्म नक्षत्र भोग कहते हैं । इसका
डेढ़ गुणा (११८४।५२।१८) भुक्ति इन ६ नक्षत्रों की है--रोहिणी, अनुराधा, पुनर्वसु
और ३ उत्तरा (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तर भाद्रपद) । ४,१६,७, १२,२१, २६
नक्षत्र)
अर्द्ध भोगानि (३९५।१७।२६) पाशीन्द्रा
हीशयाम्यानिलानि (२४, १८,९,६,२,१५)षट्
शेषपञ्चदशैव (१,३,५,८,१०,१३,१४,१७,१९,२०,
२२,२३,२५,२७) स्युरेका भोगानि मान्यतः । ६० ।
भरणी (२) आर्द्रा (६) अश्लेषा (९) स्वाती (१५) ज्येष्ठा ( १८) शतभिषा
(२४) ६ नक्षत्रों का भोग आधा (३५९।१७।२६) शेष १५ नक्षत्रों का भोग एक
(७९०।३४।५२) होता है ।
सर्वभोगानि (२१३४५।४१।२५) चक्रस्या (२१,६००)
भिजिद्भोगोऽवशेशकः (२५४।१८।३५)
वैश्व (२१)वैष्णवयो (२२) र्मध्ये तद् भोगः स्थितिहेतुतः । ६१ ।
इस २७ नक्षत्रों का कुल भोग (२१३४५।४१।२५) वृत्त की कलाओं (२१,६००)
से घटाने पर शेष (२५४।१८।३५) २८ वें अभिजित् नक्षत्र का भोग आता है जो
उत्तराषाढ़ (२१) तथा श्रवण (२२) नक्षत्र के बीच आता है ।
स्फुटेष्ट खेट लिप्ताभ्यः प्रोज्झयाश्वि न्यादि भोगकान्
विशुद्ध भोग संख्यानि भानि विद्याद् गतान्यतः । ६२ ।
स्फुट ग्रह की कला से अश्विनी नक्षत्र से आरम्भ जितने नक्षत्रों की कलाघट
सकती है, घटायें । यह नक्षत्र संख्या ही गत नक्षत्र है ।
तच्छेषो वर्तमानस्य भोगोऽतिक्रान्त उच्यते ।
अशुद्ध भोगात् परितो भोग्यः स्यात् कलिकात्मकः । ६३ ।
बाकी कला (जिससे पूर्ण नक्षत्र की कला नहीं घट सके) वर्तमान नक्षत्र की