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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८७
आयाति तद्वीक्ष्य तदुक्तमेतत् बोध्यं कदम्ब ध्रुव सूत्रमध्ये
सम्भाव्यते य द्यपिवत् श्रुतोक्ता दृक्कर्म तो भिन्न मितीह बीजम् । ४९ ।
यह फल उतना ही आता है जितना कदम्ब ध्रुव सूत्र तथा गणित ग्रह के
बीच दृक्कर्म द्वारा बीज अन्तर पाया गया है ।
तदापमस्थाद्य विधो र्भमध्ये स्यादत्र कुत्राप्युडु चक्रवृत्ते
तुंगान्तरं तत्फल मन्त्यमेव सूर्येन्दु (११२) तद्बीज फलं तदात्वो । ५० ।
भास्कराचार्य ने इसे आयन दृक् कर्म कहा है, अन्य सिद्धान्तों में अन्य प्रकार
का आयन कर्म हुआ है । अतः इसे बीज संस्कार कहना उचित होगा । मैंने इसे
परम तुंगान्तर फल माना है ।
खाङ्गेन्दु (१६०) लिप्तं चिर
काल तोऽ भूत्तद् वृद्धि हासावुररीक्रियेताम् ।
इत्यादि पूर्वोक्ति भिरेव सिद्धं बीजैः
स्वकालाक्षि समैः स्फुटत्वम् । ५१ ।
(भास्करा चार्य के दृक्कर्म) से लगता है कि तुङ्गान्तर फल का परममान (१६०)
लिप्ता बहुत दिनों सेचला आ रहा है । प्राचीन आचार्यों के अनुसार यह घटता
बढ़ता है अतः बीज संस्कार द्वारा चन्द्र स्फुट करना चाहिये ।
समाः सहस्रान्तर एष्यकाले प्रोक्त क्रमेण प्रथमस्फुटेन्दोः ।
दृक् चन्द्र तोलप्स्यत एव यावान् भेदः स तद्बीजमितिप्रमेय । ५२ ।
तुंगान्तर फल के परम मान में वृद्धि में ह्रास के लिये बीज संस्कार करने के
लिए १ हजार वर्षों के अन्तर पर इस तुंगान्तर मान द्वारा स्फुट ग्रह किया जायेगा ।
प्रत्यक्ष चन्द्र से उसका जितना अन्तर होगा वही बीज संस्कार होगा ।
षट्षष्ठि (६६) दण्डाभ्यधिका तिथि र्या कृत्स्ना पराहद्वयमश्नुतेसा ।
सूक्ष्मैव नान्या तुतथा विधाऽस्यात् षोढाभिदा हिस्मृतिषु-प्रसिद्धा । ५३ ।
स्मृतियों में सूक्ष्म तिथि उसे कहा गया है, जिसमें दो क्रमागत दिनों के
अपराह्न सम्मिलित हों । अतः इस प्रकार इस तिथि में ६६ से अधिक दण्ड स्मृति
अनुसार होंगे ।
(एक मध्यम सावन दिन में ३० दण्ड हैं जिन्हें ५ अह्र प्रति ६ दण्ड में बांटा
गया है-प्रातः, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न, सायाह्न) अपराह्न से अगले मध्याह्न तक
एक दिन रात (६०) दण्ड होगा अगला अपराह्न भी सम्मिलित होने से ६ दण्ड
अधिक होगा ।
सायाह्न मात्र स्पृग् महि पूर्वे परे दिनार्द्धात् पुरतो गता चेत् ।
तत्राद्ध मुक्तं कुतपे परेरद्युः स्मृत्यात्र सूक्ष्मैव मता तिथिः सा । ५४ ।
स्मृति के अनुसार यदि सायाह्न को स्पर्श कर तिथि यदि अगले दिन पूर्वार्द्ध