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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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८६ सिद्धान्त दर्पण
दृक् और गणित दोनों के अनुसार एक नहीं होने पर ग्रह का शुभकर्मों में
व्यवहार नहीं हो सकता है । अतः गणित की प्रत्यक्ष उपलब्धि के लिए जो बीज-
कर्म किया जाता है उसका विस्तृत वर्णन करता हूँ ।
भास्कराचार्य-लिप्ताविधोरर्कमही (११२)
मिता मे दृग्गोचराः प्रत्यहमीक्षितस्य ।
कदम्बगोला गत सूत्र पाते क्रान्तौ
धनर्णत्वजुषो भमध्यात् । ४४ ।
भास्कराचार्य (सिद्धान्त शिरोमणि) ने कहा है-मैंने प्रतिदिन चन्द्रमा को देखकर
पाया है कि गणित द्वारा निर्दिष्ट स्थान से चन्द्रमा ११२ लिप्ता पूर्व या पीछे तक
दीखता है । बीज फल के अधिकतम या न्यूनतम होने के समय यह होता है ।
मयाय बीजोपन-ये यदन्ते सूर्योक्त माद्यं परमं रहस्य म्
प्रकाशये गोप्य मपीहवेदं प्रणम्य देवं जगतां हितार्थम् । ४५ ।
स्वयं सूर्य ने बीज के विषय में (सूर्य सिद्धान्त के) अन्त में कहा है कि, यह
परम गोपनीय होने पर भी जगत के हित के लिए देवता और वेद को प्रणाम कर
इसकी व्याख्या करता हूँ ।
ब्रह्मगुप्त सिद्धान्ते च-ब्रह्मोक्तं ग्रह गणितं महता कालेन यत्खिलीभूतम्
अभिधीयते स्फुटं तज्जिष्णु सुत ब्रह्मगुप्तेन । इति । ४६ ।
ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त में-स्वयं ब्रह्मा द्वारा कहा हुआ ग्रहगणित बहुत समय
बीतने पर लुप्त हो गया । अतः विष्णु पुत्र ब्रह्म गुप्त उसको बीज संस्कार आदि
द्वारा स्पष्ट कर कहते हैं ।
लिप्ता विधोरर्क महीति पद्याद् भमध्यता स्याद् विषुवापयस्य
तदाप्य बीजोपन या नुमेयं विक्षेप मन्त्यं कुवसु द्वि (२८१) लिप्तम् । ४७ ।
चन्द्र के गणितागत स्थान से (११२) लिप्तात्मक का अन्तर सम्भवतः विषुव
वृत्त के चन्द्र कक्षा की दूरी के कारण है अतः यह चन्द्रमा के परम विक्षेप (२८१)
लिप्ता) से सम्बन्धित होना चाहिये ।
यतो विधोः सत्रिभ सायनस्य क्रान्ति
ज्यकाखांद्रिगुणेन्दु (१३७०) तुल्या
तद् बाण (२८१) निघ्नी त्रिगुणो (३४३८)
हृताप्तं धनर्णं दृक्कर्म भुजेश (११२) लिप्तम् । ४८ ।
क्योंकि सायन चन्द्र में राशि जोड़ने पर उसकी क्रान्ति ज्या (१३७०) कला
है, और (२८१) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर भी (११२) कला
आती है ।