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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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८२ सिद्धान्त दर्पण
सूक्ष्म मत से विष्टि आदि अनिष्ट का त्याग किया जाता है । शुभ कर्म में
स्थूल मत से भी विष्टि आदि को नहीं लेना उचित है । स्थूल मत सर्वथा हेय
नहीं है, नित्य व्यवहार के लिए लोग उसे ही मानते हैं ।
व्यर्केन्दु केन्द्रोज समांध्रि युग्मं पक्षादि मान्त्यर्द्ध युगं प्रमेयम्
पक्षांघ्रयः केन्द्र भषट् कयोः स्युः शराम्बु राशि (४५) प्रमितैश्च भागै । २३ ।
चन्द्र से रवि घटाने पर जो केन्द्र होता है । वह प्रथम ६ राशि में रहने पर
(रवि से चन्द्र मा १८०° तक आगे रहने पर ) शुक्ल पक्ष तथा द्वितीय ६ राशि में
(१८०°-३६०°) रहने पर कृष्ण पक्ष होता है । प्रथम ३ राशि शुक्ल पक्ष पूर्वार्द्ध ,
उसके बाद ६ राशि तक शुक्ल पक्ष का उत्तरार्द्ध होता है । कृष्ण पक्ष का पूर्वार्द्ध
६ से ९ राशि तथा उत्तरार्द्ध ९ से १२ राशि होता है । प्रत्येक पक्ष (१८०) के चतुर्थ
अंश (४५) को पक्ष चरण (पाद पक्ष) कहा जाता है ।
वक्ष्येन्त्य भुक्ति ग्रहणे प्रसिद्धां
ययैव सर्वान्त गतैष्य काले ।
चन्द्रः स्फुटः स्यात् स्थिति मर्द्ध कालो
दृक् तुल्यता मेतिययाच सिद्धः । २४ ।
अब मैं चन्द्र ग्रहण के लिए उपयोगी चन्द्र की गति (ज्यादा सूक्ष्म) कहता
हूँ । यह गति निकालने के लिए पर्वान्त (पूर्णिमान्त और अमान्त) का गत (बीता)
और गम्य (बाकी) काल निकालकर उससे चन्द्रमा को स्फुट करते हैं । इस स्फुट
गति द्वारा साधित होने पर ग्रहण के स्पर्श, मोक्ष स्थिति आदि समय दृक् सिद्ध
होते हैं । (गणना के अनुसार ही दीखते हैं)
न्यस्यद्विधाद्येन्दुगतेः फलं तदन्त्येन
तुंगान्तर केण ( १६०) निघ्नम्
परेणतन्मान्द्य फलेन (३०१) भक्तं
गत्याद्ययाघ्नं किमम ध्यया (७९० । ३५) सम् । २५ ।
प्रथम स्फुट चन्द्र के प्रथम गतिफल को दो स्थान में रखकर एक स्थान में
उसे कला आदि परम तुंगान्तर फला (१६०) गुणा कर परम चन्द्र मन्दफल कला
से भाग दें । अन्य स्थान के प्रथम गति पल को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा
कर मध्यगति ( ७९०।३५) से भाग दें ।
फलान्वितं कर्कि मृगादिमन्द केन्द्रे तदा व्योनित मध्य भुक्तिः
द्विधार्क भुक्त्या ऋणितार्द्धहार भक्ताप्त युक् स्यान्त्यगति स्फुटेन्दोः । २६ ।
दोनों स्थान के फलो को जोड़ दें । चन्द्र मन्द केन्द्र कर्क आदि राशि में रहने
पर इस योग फल को चन्द्रमध्यम गति में जोड़ेगे तथा मन्दकेन्द्र मकर आदि ६
राशियों में रहने पर मध्यम गति से घटायेंगे । यह चन्द्र की संस्कृत मध्यगति है ।
इसको पुनः दो स्थानों में रखकर एक स्थान में उससे स्फुट रवि गति घटाकर