सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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सिद्धान्त दर्पण
में समाप्त हो जाय तो उस तिथि का श्राद्ध पूर्व दिन नहीं होकर अगले दिन करना
पड़ेगा । अगले दिन भी कुतप तक यह श्राद्ध पूरा होना चाहिये ।
(कुतप-लेखक ने दिन ३० से दण्ड को १५ भागों में बाटा है । प्रतिभाग दो
दण्ड ८ वें भाग १४-१६ दण्ड को कुतप कहते हैं । एक भाग एक मुहूर्त है)
इस उक्ति के अनुसार भी एक तिथि का मान सायाह्न (६ दण्ड) + रात्रि
(३० दण्ड) दिनार्द्ध (१५ दण्ड) = ५१ दण्ड तक होता है ।
कुतप (१४-१६ दण्ड) तक भी ५२ दण्ड तक होता है ।
यह लेखक ने पहले भी कहा है कि ५१ दण्ड की तिथि होगी ।
नोट-प्राचीन आचार्यों के मत बाणवृद्धि रसक्षयः (५४ से ६५ दण्ड की तिथि)
के बदले चन्द्र शेखर मत से ५१ से ६६ दण्ड से अधिक तक की तिथि स्मृति
प्रमाण से भी सिद्ध है ।
यथाह गौतमः- पूर्वाह्ने चेत् प्रतिपदो भूतो सायम मा यदि ।
आरम्भ कुतपे श्राद्धं रोहणं न तुलंघयेत् । इति । ५५ ।
गौतम स्मृति के अनुसार चतुर्दशी के सायाद्ध में अमावस्या आरम्भ होकर
यदि अगले दिन प्रतिपदा तिथि के मध्याह्न पूर्व में समाप्त हो जाय तो कुतप मुहूर्त
(२ दण्ड) में श्राद्ध आरम्भ अगले रोहण मुहूर्त में समाप्त होना चाहिये । (अमावास्या
श्राद्ध) ।
सप्तम्या तिथित्रयक्षयघटीर्दृष्ट्वा रसोनाः (६) पुनः
षोढा भेद विरोध शंकि तहदां मा भूदिहा नादरः
सप्तम्यादिषु (३) पञ्चधान्यतिथिषु द्विःषट्सु (१२) षोढेतिचेत्
तात्पर्यं स्मृतिजं विचिन्त्य मिहदृक् सिद्धैर्नका पिक्षतः । ५६ ।
शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में सप्तमी, अष्टमी और नवमी इन तीन तिथियों
में परम ह्रास ६ दण्ड से कम होता है अतः इन तिथियों के सभी ६ भेद नहीं ५
ही प्रकार के भेद होते हैं, (इनमें ५४ दण्ड से कम की सूक्ष्म तिथि नहीं होती)
अन्य १२ तिथियों के ६ प्रकार के भेद होते हैं । स्मृति का इस प्रकार अर्थ मानने
पर दृक् सिद्ध गणना में कोई त्रुटि नहीं होगी ।
मध्ये पक्ष मिवेन्द्र (१४) संख्य मघटी भेदश्च पक्षान्तयोः
स्याच्चेत् स्थूल तदा ग्रहणयोर्भूरि प्रभेदे क्षणात् ।
प्राञ्चोलोकमियापि सूक्ष्म तिथि मन्वेष्टुंव्यधास्यन् श्रमं
सर्वे भैन्दु युते रनादृततया मन्ये तदीक्षां जहुः । ५७ ।
प्राचीन आचार्य नक्षत्र और उसमें चन्द्र की स्थिति नहीं देखते थे, स्थूल गणना
से पक्षमध्य की तिथियों (७ मी, ८ मी) में सूक्ष्म मत की तुलना में १४ दण्ड तक
का अन्तर पड़ जाता है । लेकिन पक्षान्त में सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण होने के
कारण उसकी सूक्ष्म साधन के लिए उन्होंने बहुत चेष्टा की थी । क्योंकि सामान्य