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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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९६ सिद्धान्त दर्पण
दिनार्द्ध तथा घटाने से रात्रि का अर्द्ध होता है । दक्षिण क्रान्ति रहने पर १५ दण्ड
से चर प्राण घटाने पर दिनार्द्ध तथा जोड़ने पर रात्रि अर्द्ध होता है ।
याम्यक्रान्तौ विपर्य्यस्ते द्विगुणे ते दिनक्षपे । इति ।
शर युक्तो नित क्रान्त्या भचन्द्रा देरपि स्वके । १०४ ।
दिनार्द्ध और रात्रि अर्द्ध का दुगुना करने से दिन और रात्रि का मान आता
है । सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण समाप्त) नक्षत्र, चन्द्र तथा अन्य ग्रहों का भी दिन
और रात्रि का मान निकालने के लिए उनके शर को क्रान्ति में जोड़कर (शर और
क्रान्ति एक दिशा में रहने पर) या घटा कर स्पष्ट क्रान्ति निकालेंगे तथा पूर्व नियम
से कार्य होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेप संयुता ।
दिग्भेदेऽन्तरिता स्पष्टा भास्करस्य यथागता । इति । १०५ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-क्रान्ति में शर जोड़ने में घटाने में स्पष्ट क्रान्ति होती
है । शर और क्रान्ति एक दिशा में होने पर जोड़ा जाता है । अलग दिशा में होने
पर अन्तर होता है । सूर्य का शर नहीं होने के कारण उसका जोड़ने या घटाने
का प्रश्न नहीं होता ।
व्यवहृत्यै चरं स्थूलं पलात्मक मदूय्य॑ते ।
एक द्वित्रि गृहान्तो त्थं स्वदेशज चरत्रयम् । १०६ ।
व्यवहार के लिए चर का पलात्मक मान निकालने की स्थूल विधि कही
जाती है । एक दो और तीन राशियों के अन्त में उनका अपना अपना चर कला
निकालें ।
आनीय त्रिभजाच्छोध्यं द्विभजं द्विभजा पुनः
एक राशिज मेवं स्याच्चर खण्ड त्रयं पृथक् । १०७ ।
३ राशि से २ राशि का चरकला घटाने पर ३ य चर खण्ड, २ राशि से १
राशि का चरकला घटाने पर द्वितीय चरखण्ड, तथा एक राशि की चर कला
प्रथम चर खण्ड-इस प्रकार मेष आदि राशियों के तीन चर खण्ड मिलते हैं ।
सायनार्कादि दो राशि भाग लिप्ताः पृथक् स्थिताः
एक राशि र्यदिन्यूनास्तदा भागाश्च लिप्ति काः । १०८ ।
अयन संस्कृत सूर्य आदि ग्रहों के भुज राशि अंश कला अलग अलग कर
रखेंगे । यदि यह एक राशि से कम हो तो इसके अंश और कला अलग रखेंगे ।
चरेणाद्येन गुणिताः शेषात् षष्ट्याप्त संयुताः ।
त्रिंशद् विभाजिता शून्यैराशि स्थाने फलान्विताः । १०९ ।
राशि, अंश और कला को अलग अलग प्रथम चार खण्ड से गुणा कर कला
स्थान के फल को ६० से भाग देकर लब्धि को अंश में जोड़ते हैं तथा शेष को