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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

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८० सिद्धान्त दर्पण
मौर्वीकृताहारहताः फलं स्यात् कलात्मकं पाक्षिक नामधेयम् ।
पक्षार्द्धयोः प्राक् परयो स्तदाद्य हीनस्तुतीत्यत्व मुपैति सोऽयम् ।। ११ ।।
गुणनफल की ज्या निकाल कर उसे निम्नलिखित हार से भाग देने पर कलादि
लब्ध फल को पाक्षिक फल कहा जाता है । पक्ष के पूर्वार्द्ध में चन्द्र रहने पर
पाक्षिक फल को द्वितीय स्फुट चन्द्र में जोड़ते हैं । परार्द्ध पक्ष में चन्द्र रहने पर
इसे घटाते हैं । तो तृतीय स्फुट चन्द्र होता है ।
सूर्योनित स्वोञ्च विधूञ्च शेष भुजांश कान्योऽन्य विघात पिण्डात्
खाष्टेन्दु (१८०) भक्ताञ्च फलं नवत्या (९०) युक्तं तृतीयाय फलायहारः ।। १२ ।।
पाक्षिक फल का हार निकालने के लिये रवि मन्दोच्च और चन्द्र मन्दोच्च से
अलग-अलग सूक्ष्म सूर्य घटाते हैं । दोनों अन्तरों का भुजचाप निकाल कर उनका
परस्पर गुणन करते हैं । गुणन फल में (१८०) से भाग देकर लब्धि में ९० जोड़ते
हैं जो पाक्षिक फल का हार होता है ।
स्वणार्क दोः सूक्ष्मफलं दिगा (१०) म माद्येन्दु गत्या हत मध्य भक्तम् ।
तुर्यं फलं स्यात् क्रमतस्तदून युक्तः शशीदृक् सम एष सूक्ष्मः । १३ ।
रवि के सूक्ष्म मन्दफल को १० से भाग देकर स्फुट चन्द्र गति से गुणा करते
हैं तथा मध्य चन्द्र गति से भाग देते हैं । इससे दिगंश फल मिलता है । रवि
मन्दफल धन या ऋण होने पर दिगंश फल को तृतीय स्फुट चन्द्र में जोड़ते
या घटाते हैं । इससे चतुर्थ स्फुट चन्द्र होगा जो शुद्ध मान होगा ।
स्थलीषु जंगम्यत एव यद् वद् भुजंग ऋज्वी गति मेव गर्त्ते ।
सदोच्च कर्षातिग एव मिन्दु स्तत्साम्य मागच्छति पर्व सन्धौ ।। १४ ।।
समतल भूमि पर सर्प तरंग की तरह चलता है लेकिन बिल में जाते समय
सीधा हो जाता है । इसी प्रकार सिर्फ मन्दोच्चं फल के प्रभाव को न मानकर
चन्द्रमा अनेक प्रकार की गति करता है, पर पूर्णिमा या अमावस्या (पर्व सन्धि)
में गति की विषमता दूर हो जाती है, तथा केवल मन्दफल के अनुसार संस्कार
होता है ।
तत्राप्य तुंगान्तर पाक्षिके स्थात् सूक्ष्मे दिगंशाख्य फलं यथाहेः ।
मताल्यवक्रा स्वगतिर्विलेऽपि पार्श्वद्वय स्पर्श दृढ़ा दृढ़ीत्वात् ।। १५ ।।
बिल में प्रवेश करते समय पार्श्व के दबाव के कारण सर्प की पार्श्व गति
(तरंगाकार) बिल्कुल बन्द हो जाती है । साथ ही उसकी स्वाभाविक सीधी गति
में भी अन्तर पड़ता है । इसी प्रकार पर्व सन्धि पर चन्द्रमा का तुंगान्तर और पाक्षिक
फल नहीं होता पर सूक्ष्म दिगंश फल का संस्कार होता है (मन्दफल के अतिरिक्त)
भुजान्तराख्यं फलमर्क सूक्ष्म स्थूलात्मदोः खण्डफलाद्विधेयम् ।
क्रमादणु स्थूल विधौ न तु स्यात् स्फुटीक्रियान्योन्य विपर्य येण ।। १६ ।।