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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 609 में से

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पर निर्भर हैं । अतः सूर्य और चन्द्र सूक्ष्म होने पर ये भी सूक्ष्म (अति स्फुट) होंगे ।
रवि और चन्द्र की मन्द परिधि स्थूल और सूक्ष्म दोनों विधियों में समान होने के
कारण मन्द फल संस्कृत रवि और चन्द्र को प्रथम ग्रह माना जाता है ।
एतस्य सूक्ष्मस्य रवेध्यगत्या बिम्ब प्रमाणं स्थिर पर्व सन्धिः ।
छाया भुवस्तद् युगमन्दकर्णः सूर्यग्रहे सिध्यति लम्बनश्च । ५ ।
इसी प्रथम ग्रह तथा रविस्फुट गति से बिम्बमान स्फुट पर्यन्त काल, भुजमान,
रवि और चन्द्र दोनों के मन्द कर्ण और सूर्य उपराग का लम्बन साधन किया जाता
है ।
तुंगान्तरं पाक्षिक नामधेयं फलं दिगंशारूय मदस्तुरीयम् ।
क्रमेण वक्ष्यामि निरीक्ष्ययत्ना च्छित्रां गतिं रात्रिफ्ते श्चिराय । ६ ।
चन्द्रगति बहुत विचित्र है, इसके दीर्घ काल निरीक्षण करने पर मैंने मंदफल
के अतिरिक्त और तीन फल संस्कार की आवश्यकता समझी है । चारं संस्कारों
के नाम हैं-मन्द, तुंगान्तर, पाक्षिक और दिगंश ।
अभीष्ट कालोत्थित चन्द्र मन्दात् पक्षे सिते सत्रिभ सूर्य हीनात् ।
कृष्णे त्रिभोनाय्मवर्जिताद् यत् केन्द्रं तदीया भुजमौर्विकायाः । ७ ।
चन्द्र के इष्ट काल के मन्दोच्च से सूक्ष्मरवि और तीन राशि का योग शुक्ल पक्ष
में घटाते हैं । कृष्ण पक्ष में स्पष्ट रवि से तीन राशि का अन्तर घटाते हैं । यह
तुंगान्तर केन्द्र हुआ । इसकी भुजज्या निकालें ।
साभ्रांगभू (१६०) घ्नी त्रिगुणेन (३४३८) भक्ता स्फुटार्क चन्द्रान्तर दो र्गुणघ्नी
त्रिज्योद्धृता लब्धमतः कलाद्यं गत्याविनिघ्नं प्रथम स्फुटे न्दोः । ८ ।
तुंगान्तर भुजफल को (१६०) से गुणा कर(३४३८) से भाग देकर सूक्ष्म रवि
और स्फुट चन्द्र के अन्तर की भुजज्या से गुणा करें और पुनः त्रिज्या से भाग दें ।
लब्धि कला आदि को प्रथम स्फुट चन्द्र गति से गुणा कर-
तन्मध्यगत्या (७९०।३५) विहृतं फलंस्यां तुंगान्तरं तेन विहीन युक्तः ।
पर्यायतः सत्रिभ वित्रिभार्क हीनेन्दु मन्दोच्च भवोक्त केन्द्रे । ९ ।
मध्य चन्द्र गति (७९०।३४) से भाग दें । लब्धि कलाआदि तुंगान्तर फल
होगा । तुंगान्तर केन्द्र मेषादि ६ राशि में रहने पर तुंगान्तर फल को प्रथम स्फुट
चन्द्र में जोड़ते हैं, केन्द्र तुला आदि ६ राशि में रहने पर इसे घटाते हैं । इससे
द्वितीय स्फुट चन्द्र मिलता है ।
(तुलाधराजादिमषट्क निष्ठे प्राक् सिद्ध चन्द्रो भवति द्वितीयः )
तत्सूक्ष्म सूर्यान्तर केन्द्र पादयातैष्यदल्पाः कलिका द्विनिघ्नाः । १० ।
द्वितीय स्फुट चन्द्र और सूक्ष्म रवि के अन्तर को केन्द्र मानते हैं । यह केन्द्र
वृत्त के जिस पाद में हो उसका गत और गम्य खण्ड निकालें । गत् और गम्य
खण्ड में जो कम है उसकी कला बनाकर २ से गुणा करें ।