सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ८३
आधे हार (हार = (चन्द्रमन्दोच्च-सूक्ष्म सूर्य) का भुज चाप x (रवि मन्दोच्च -सूक्ष्म
रवि) का भुज चाप - १८० + ९०) से भाग दें । लब्धि को अन्य स्थान की संस्कृत
मध्यगति में जोड़े । योग चन्द्रमा की सूक्ष्मतम गति होगी ।
एकत्र नित्यान्यपरत्र काम्यान्यवेक्ष कर्तुं यदि पञ्जिका याम्
असम्मतिः स्याज्जगतः प्रयासात् कार्यं तदा सूक्ष्म मतेन सर्वम् । २७ ।
एक प्रकार के नित्य कर्म के लिए एक पञ्जिका और दूसरे काम्यकर्म के लिए
दूसरी पञ्जिका का कोई आदर नहीं करेगा । अतः बहुत परिश्रम होने पर भी सभी
प्रकार के कामों में के लिये सूक्ष्म पञ्जिका का व्यवहार ही उचित है । स्थूल की
तुलना में सूक्ष्म पञ्जिका अधिक आदरणीय है ।
भूगर्भगे कल्पित सूक्ष्मगोले स्वदेश सूत्राकलित प्रदेशे ।
कदम्ब गोलांकित भागलिप्ते दृष्टा ग्रहाः स्पष्टतया भचक्रे । २८ ।
पृथ्वी की सतह पर हमलोग हैं । भूमि के गर्भ के केन्द्र स्थान से अपने स्थान
तक के सूत्र (रेखा) को आकाश में बढ़ाने पर वह आकाश गोल में जिस बिन्दु
पर मिलता है उसे अपने स्थान का स्वस्तिक (आकाश में ऊंची दिशा में) कहलाता
है । इस खस्वस्तिक और क्रांति वृत्त में जिस स्थान पर ग्रह का राशि अंश आदि
है (ग्रह के बिम्ब से क्रांति वृत्त पर लम्ब बिन्दु) उस बिन्दु तक जाते हुए जो कदम्ब
प्रोत वृत्त (गोलीय रेखा) है, उसी वृत्त पर ग्रह दिखायी पड़ने से गणित गत ग्रह
को स्पष्ट कहा जाता है ।
प्राग् भिर्मता र्यत् सकल क्रियासु तत्सिद्धये पर्यय बीजक्लृप्ति
पृथक् विधा काल वशादि भिन्ने विर्धीयतेस्वी क्रियते च लोकैः । २९ ।
प्राचीन आचार्यों के मत से सभी शुभ कार्य इसी स्पष्ट ग्रह के अनुसार होते
हैं । यही स्पष्ट ग्रह लाने के लिये ज्योतिषी ग्रह का भगण और बीज कर्म संस्कार
आदि करते हैं । उनके परिश्रम के कारण तथा स्पष्ट ग्रह को गणित सिद्ध स्थान
पर देख उसे मानते हैं ।
कर्मार्हपञ्चाङ्ग समत्व सिद्धौ निशापते रेव महोपयोगात्
दृक् सिद्धयेऽस्य त्रिविधं हि बीजं, तुङ्गान्तराद्याख्यमकल्पि सूक्ष्मम् । ३० ।
वैदिक और स्मार्त आदि नित्य और नैमित्तिक कर्म की सिद्धि के ग्रह स्पष्ट
की आवश्यकता है । केवल पञ्चाङ्ग शुद्धि के लिए उनकी अपेक्षा, चन्द्र स्पष्ट
की आवश्यकता अधिक है । इसके दिये तुंगान्तर, पाक्षिक और दिगन्त आदि
बीज संस्कारों की सूक्ष्म कल्पना की गयी है ।
तिथावृडौ द्वित्रिपल प्रमेदो वेद्यः परं विश्वसृंजानचान्यैः ।
श्रेयात् स तत् शक्र (१४) घटी प्रभेदात् समुद्धरेत् सार मरारतो हि । ३१ ।
इन तीन सूक्ष्म बीज संस्कारों के बाद भी तिथि तथा नक्षत्र में २-३ पल का