सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९७
कला रखते हैं । अब अंश में चरखण्ड से गुणा कर उसमें ३० से भाग देते हैं और
लब्धि को राशि में जोड़ते हैं । शेष अंश फल होगा ।
तद् बाहुराशि रेकश्च तत्स्थाने प्रथमं चरम् ।
निधायां शादिकं क्षुण्णं द्वितीये न तथाहतम् । ११० ।
भुज में एक राशि होने पर स्थान में प्रथम चरखण्ड को रख अंश आदि द्वितीय
चरखण्ड से गुणा कर ३० से भाग देंगे तथा काल को प्रथम चर खण्ड में जोड़ने
से स्पष्ट कर होगा ।
फलात्यं प्रथमं स्पष्टं बाहु राशि द्वयं यदि
तत्रादि द्वियुतिः स्थाप्या तृतीय घ्नं लवादिकः । १११ ।
भुज यदि २ राशि है तो प्रथम और द्वितीय चर खण्ड का योग राशि स्थान
में रख अंशादि को तृतीय चर खण्ड से गुणा करेंगे ।
त्रिंशदाप्तं युतं प्राग् वत् इत्थं स्याद्विस्फुटं चरम्
प्रत्यंशं तद् विभज्या वा सूर्यस्यै कैक राशि जम् । ११२ ।
फल को ३० से भाग देकर लब्धि को राशि में जोड़ने से स्पष्ट होगा । अथवा
रवि का एक एक राशि का चर लेकर प्रति अंश का कितना चर है यह निकालेंगे ।
अथोदयान्तर पलान्यर्कात् सायन संस्कृतेः ।
क्रमाद् वृद्धि क्षयाढ्यानि राश्यर्द्धेषु त्रिषु त्रिषु । ११३ ।
अब सायन सूर्य से उदयान्तर पल (लंका में स्पष्ट सूर्योदय तथा मध्यम सूर्योदय
में अन्तर) निकालने की विधि कही जाती है । (क्रान्ति वृत्त की वक्रता के कारण
इसे विषुत वृत्त का समय समीकरण कहा जाता है । यह क्रम से तीन राशि अर्द्ध
में बढ़ता है उसके बाद तीन राशि अर्द्धतक घटता है ।
सूर्या (१२) नव् (९) च वेदाश्च (४) वेदा (४) नव (९)
भानवः (१२) त्रयमाद्यं वर्द्धमानं क्षीयमाणं ततस्त्रयम् । ११४ ।
क्रान्ति और विषुत वृत्त के प्रथम संम्पात से प्रथम तीन राशि अर्द्ध पर्यन्त
उदयान्तर फल में क्रमशः १२,९ और ४ की वृद्धि होती है । तथा चतुर्थ राश्यर्द्ध
से प्रथम पाद (९०) अन्त तक उसी क्रम से ह्रास होता है अर्थात् क्रमशः ४,९,१२
की कमी होती है ।
स्व भार्द्धं फल संख्याघ्ना स्तिथ्या (१५) प्तास्तेष्टिनांशकाः
फलं प्राक् फलतः स्वर्ण कार्यं वृद्धि क्षय क्रमात् । ११५ ।
जितने राशि अर्द्ध (१५°) पूर्ण हो गये हैं उनका फल निकालते हैं । राशि
अर्द्ध के गत अंशों को राशि अर्द्ध फल से गुणा कर १५ से भाग देते हैं । फल को
पूर्ण राशि अर्द्ध के फल में जोड़ते हैं (यदि उदयान्तर फल बढ़ रहा है) या घटाते
हैं ।