सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ सिद्धान्त दर्पण
भचक्रं संग्रहं सोऽयं सपातं सकलार्द्ध वगः ।
प्राक् पश्चात् प्रेरयत्येष क्रान्ति मार्गानुसार तः । ७६ ।
यह पात सभी ग्रह नक्षत्र तथा गोल के ऊपर है (क्रान्ति वृत्त तथा विषुव वृत्त
के तलों का मिलन बिन्दु इन सबसे अधिक दूरी पर है) यह क्रान्ति वृत्त के तल
में इन सभी भचक्रों को पूर्व से पश्चिम की तरफ चलाता है ।
सप्त विंशति भागान्तं प्राचीं मेषादिषट्क भाक् ।
प्रतीची प्रतितौल्यादि भार्द्धगः प्रक्षिपत्ययम् । ७७ ।
यह पात मेष आदि ६ राशियों में रहने पर नत्र और ग्रह आदि को पूर्व की
तरफ २७ अंश ले जाता है । तथा तुला आदि राशियों में रहने पर पश्चिम की
तरफ २७ अंश ढकेलता है ।
यत्प्रेरणा द्रवि मुखास्तारा-स्व स्वापमस्थिताः ।
विक्षिप्ता इव दृश्यन्ते स्वस्था नाद् याम्य सौम्ययोः । ७८ ।
इस पात के कारणं रवि आदि ग्रह तथा अश्विनी आदि नक्षत्र अपनी अपनी
क्रान्ति के आगे (शून्य क्रान्ति पर) रहने पर भी दक्षिण या उत्तर की तरफ विक्षिप्त
दीखते हैं ।
इष्टैर्दिनै स्तद् भगणा गुणिताः कल्प सावनैः
उद् धृता भगणाक्षादिः क्रान्तिः पातः स्फुटो भवेत् । ७९ ।
इष्ट दिन का क्रान्ति पात निकालने के लिये क्रान्ति पात के कल्प भगण को
अहर्गण से गुणा कर कल्प सावन दिन (१५,७७,९१, ७८,२८,०००) से भाग देते
हैं । भगण और राशि आदि क्रान्ति पात आयेगा ।
तद्राश्याद्यं चक्रशुद्धं ग्राह्यं तद् बाहु लिप्तिका
द्विशताप्ताः फलानिस्यु श्चलां शास्तेऽयनांशकाः । ८० ।
इस राशि आदि फल को १२ राशि से घटाकर शेष की भुजकला निकालते
हैं । भुजकला को २०० से भाग देने से फल चलांश होगा । चलांश ही अयनांश
है ।
शिष्टाः षष्टि हतास्तेन हारेणा (२००)प्ताः कलादिकाः
साष्टविंशति षष्ट्यंशाः परा नव (९।२८) गति दिने । ८१ ।
२०० से भाग देने पर जो शेष बचा उसे ६० से गुणा कर २०० से भाग देने
पर कला आदि फल होगा । एक दिन में अयनांश गति ९।२८ परा आदि है ।
करुणाब्द मुखेऽशाब्दा दृग् दृशो (२२) भूः (१) कुसायकाः (५१)
शराब्धयो (४५) द्विवैदाश्च (४२) धनारूया वृद्धिशालिनः । ८२ ।
करणाब्द आरम्भ (१८६० ई. मकर संक्रान्ति लंकोदय) में अयनांश अंश २२ ।
१।५१।४५।४२ आदि था ।