सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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गत (बीती हुयी) कला है । इसे नक्षत्र की योग कला से घटाने पर भोग्य कला
होगी ।
गतैष्याः कलिकाः षष्ट्या गुणिताः ग्रह भुक्ति भिः ।
विहता घटिकाद्याः स्युर्गतैष्याः फल सम्मिताः । ६४ ।
गत और भोग्य कला को अलग अलग ६० से गुणा कर ग्रह की स्फुट गति
कला से भाग देने पर वर्तमान नक्षत्र की गत और ऐश्य ( भोग्य) दण्ड आदि
समय होगा ।
सम सार्द्धांर्द्ध भोगानां भानां साभिजितामपि ।
विवाहादिषु गृह्यन्ते पादा भोगानुसारतः । ६५ ।
चन्द्र भुक्ति के समान, डेढ गुना या अर्द्ध भोग कला वाले अभिजित सहित
२८ नक्षत्रों की भोग कला में ४ से भाग देने पर उनका एक पाद आता है ।
राश्यन्ते राशि सञ्चारो भान्ते भान्तर सञ्चरः ।
कर्तव्यो नात्र राशीनां नियमो नव भां घ्रयः । ६६ ।
स्थूलनियम के अनुसार एक राशि (१८०० कला) में ९ नक्षत्र पाद (अभिजित्
रहित २७ नक्षत्रों के २७ x ४ = १०८ पाद) = १२ x ९) होंगे । अतः १२ राशियों
के १०८ नक्षत्र पाद मध्यममान के हैं । सूक्ष्म नियम से राशि का भोग नक्षत्र पाद
पूर्ण नहीं करता है ।
यथैव सिंह मध्योः प्रवेशेऽप्येकदास्थिते ।
सूक्ष्म मघा कर्कटान्त्यान् भगानष्टौ भुनक्तिहि । ६७ ।
स्थूल विधि से चौथी राशि कर्क के अन्त तक ४ x ९ = ३६ नक्षत्र पाद या
३६ ÷ ४ = ९ नक्षत्र या अश्लेषा तक नक्षत्र पूर्ण होंगे । अतः ५ वीं सिंह राशि
तथा १० वें मघा नक्षत्र का आरम्भ एक साथ होना चाहिये । लेकिन सूक्ष्म गणना
के अनुसार मघा नक्षत्र सिंह से (८ अंश) पहले कर्क राशि में ही आरम्भ हो जाता
है ।
ग्रहाणां गति लिप्ताभि बिम्बव्यास विलिप्तिकाः ।
हताः संक्रान्ति नाड्यः स्युर्भानोस्ताश्चातिपुण्यदाः । ६८ ।
ग्रहों का केन्द्र बिन्दु किसी राशि के अन्तिम बिन्दु (जो अगली राशि का
आरम्भ बिन्दु है) पर पहुंचने के समय को सूक्ष्म संक्रमण काल कहते हैं । पूर्ण
संकर्मण समय वह है जब ग्रह का बिम्ब संक्रमण बिन्दु को स्पर्श कर उसे पूर्ण
रूप से पार करता है । इसे निकालने के लिए बिम्ब के व्यास विकला में ग्रह
की गति कला से भाग देने पर प्राप्त नाड़ी (दण्ड) आदि को संक्रमण समय कहते
हैं । इस संक्रमण समय में सूर्य अत्यन्त शुभ फल देता है ।