सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् ९१
भवन्ति मिश्र फलदाः स्व संक्रान्ति गता ग्रहाः ।
मण्डलस्यो भय स्थित्वा द्वयं नक्षत्र सन्धिगाः । ६९ ।
अपनी संक्रान्ति काल में ग्रह दोनों राशियों का (मिश्र) फल देते हैं । इसी
प्रकार एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र में जाते समय भी उनका बिम्ब (मण्डल) जब
तक संक्रमण बिन्दु पर रहता है, ग्रह दोनों नक्षत्रों का फल देते हैं ।
विकला विधु बिम्बस्यार्केन्दु भुक्त्यन्तरेण च ।
चन्द्र भुक्त्या च चन्द्रार्क भुक्ति योगेन चैतयोः । ७० ।
चन्द्र बिम्ब की विकला को (१) रविचन्द्र की भुक्ति अन्तर (२) चन्द्र गति
(३) चन्द्र और रवि गति योग, और
गत्यन्तरेण च हृता लब्धा दण्डादयः पृथक्
गत्य नक्षत्र योगानां करणानाञ्च सन्धयः । ७१ ।
(४) चन्द्र और रवि की गति का अन्तर-से भाग देने पर क्रमानुसार (१) तिथि
(२) नक्षत्र (३) योग और (४) करण सन्धि का समय आता है । (तिथि और
उसका आधा करण दोनों की गति एक प्रकार है अतः सन्धि समय निकालने की
विधि एक ही है ।
उत्पद्यन्ते यतोऽनन्ते तुङ्गापक्रम पातजा-
वीथयो मण्डला काराः स्वकक्षाषु पृथग् विधाः । ७२ ।
उच्च, क्रान्ति, तथा पात के अपने रास्तों से अनेक वृत्ताकार कक्षायें बनती
हैं ।
तद्ग्रहाणां गतिमार्गः शीघ्र मन्दोच्च कर्षजः ।
प्रतिमण्डल नामा स्यात् क्रान्तिजातोऽपमण्डलः । ७३ ।
शीघ्र और मन्दोच्च के आकर्षक की गति से ग्रह का जो मार्ग है उसे प्रतिमण्डल,
क्रान्ति की गति का मार्ग अपमण्डल कहलाता है ।
विक्षेपमार्ग, पातोत्थः कथ्यते च विमण्डलः
विषुवन्मण्डला द्यास्तु वक्ष्यन्तेऽन्यप्रकाशके । ७४ ।
क्रान्ति वृत्त से विक्षेप के कारण पात का मार्ग विमण्डल कहा जाता है ।
विषुव और अन्य बल के बारे में अगले अध्याय में कहा जायेगा ।
प्रतिलोम गतेः कल्पे क्रान्ति पातस्य पर्ययाः ।
दृक् समाः कल्पिताः खाद्रि चन्द्रा म्बुधिषण् मिताः (६४०१७०) । ७५ ।
ग्रहों की सामान्य गति की विपरीत दिशा में क्रान्ति पात ( क्रान्ति वृत्त और
विषुव वृत्त का संपात या मिलन बिन्दु) की गति होती है । एक कल्प में इसके
पूर्ण भगण (चक्र) दृक् कर्म (लेखक द्वारा) के अनुसार (६४०१७०) हैं ।