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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
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जो सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसके लिये
वेदोंको प्रवृत्त करता है, अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी
मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ॥१८॥

यो ब्रह्माणमिति । यो ब्रह्माणं | 'यो ब्रह्माणम्' इत्यादि । जिसने
हिरण्यगर्भं विदधाति सृष्टवान्पूर्वं | पहले अर्थात् सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्मा-
सर्गादौ । यो वै वेदांश्च प्रहिणोति | हिरण्यगर्भको रचा है और जो उसके
तस्मै । तं ह हशब्दोऽवधारणे । | लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है । 'तं
तमेव परमात्मानम् । उक्तं च— | ह' यहाँ 'ह' शब्द निश्चयार्थक है,
“तमेव धीरो विज्ञाय | अर्थात् उसी परमात्माको । कहा भी
प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । | है—"बुद्धिमान् ब्रह्मवेत्ता उसीको
नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दा- | जानकर उसीमें मनोनिवेश करे,
न्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥” | बहुत-से शब्दों—शास्त्रोंको न पढ़े,
(बृ० उ० ४।४।२१) | क्योंकि वह तो वाणीको पीडित
“तमेवैकं जानथात्मानम्” | करना ही है” तथा “उसी एक
(मु० उ० २।२।५) इति | आत्माको जानो” इत्यादि । देव—
च। देवं ज्योतिर्मयम् । आत्मनि | ज्योतिर्मय । अपनेमें जो बुद्धि है
या बुद्धिस्तस्याः प्रसादकरम् । | उसका प्रसाद (विकास) करनेवाले,
प्रसन्न हि परमेश्वरे बुद्धिरपि | क्योंकि परमेश्वरके प्रसन्न होनेपर
तद्विषया प्रमा निष्प्रपञ्चाकार- | बुद्धि यानी परमेश्वरविषयिणी प्रमा
ब्रह्मात्मनावतिष्ठते वर्तते। आत्म- | भी निष्प्रपञ्च ब्रह्माकारसे स्थित हो
बुद्धिप्रकाशमित्यन्येऽधीयते । | जाती है । दूसरे लोग यहाँ 'आत्म-
आत्मबुद्धिं प्रकाशयतीत्यात्मबुद्धि- | बुद्धिप्रकाशम्' ऐसा पाठ मानते
प्रकाशम् । अथवात्मैव बुद्धि- | हैं । [ तब यह अर्थ होगा-]
| अपनी बुद्धिको प्रकाशित करता
| है इसलिये जो आत्मबुद्धिप्रकाश
| है; अथवा आत्मा ही बुद्धि है,

१. यह व्याख्या ‘आत्मबुद्धिप्रसादं' पाठ मानकर की गयी है ।