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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् ।
तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत् ॥ ७ ॥
सविता देवताके द्वारा अनुज्ञात होकर उस चिरन्तन ब्रह्मका सेवन
करना चाहिये । तुम उस ब्रह्ममें निष्ठा ( समाधि ) करो । इससे पूर्त कर्म
तुम्हारा बन्धन करनेवाला नहीं होगा ॥७॥
सवित्रा प्रसवेन सस्यप्रसवेनेति | सविताद्वारा प्रसूत यानी जो अन्न
यावत् । जुषेत सेवेत ब्रह्म पूर्व्यं | प्रसव करनेवाला है उस सविता-
चिरन्तनम् । तस्मिन्ब्रह्मणि योनिं | द्वारा अनुज्ञात होकर चिरन्तन ब्रह्मका
निष्ठां समाधिलक्षणां कृणवसे | सेवन करना चाहिये। उस ब्रह्ममें तुम
कुरुष्व । एवं कुर्वतो मम किं | योनि—समाधिरूप निष्ठा करो ।
ततो भवति? इत्यत आह—न हि | ऐसा करनेपर मुझे उससे क्या
त इति। न हि ते पूर्तं स्मार्तं कर्मेष्टं | होगा ? सो श्रुति बतलाती है—
श्रौतं च कर्माक्षिपन्न पुनर्भोग- | 'न हि ते' इत्यादि । इससे तुम्हारा
हेतोर्बध्नाति, ज्ञानाग्निना सबीजस्य | पूर्त्त—स्मार्त्त इष्टकर्म और श्रौत-
दग्धत्वात् । उक्तं च—"यथेषी- | कर्म भी पुनः भोगके हेतुसे
कातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयत एवं हास्य | बन्धन नहीं करेगा; क्योंकि ज्ञानाग्निके
सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० | द्वारा वह बीजसहित भस्म हो जायगा ।
उ० ५। २४। ३) इति। "ज्ञानाग्निः | कहा भी है—"जिस प्रकार अग्निमें
सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" | डाला हुआ सींकका रूआँ भस्म
( गीता ४।३७) इति च ॥ ७ ॥ | हो जाता है उसी प्रकार इस (ज्ञानी)
| के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं",
| "इसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों-
| को भस्म कर डालता है" इत्यादि ॥७॥