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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
माया परा प्रकृतिस्तत्तत्समुत्थौ । │ जगत्की मूल कारण है। उसीसे
कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च │ काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद,
विषादशोकौ च विकल्पजालम्॥ │ शोक तथा अन्य विकल्पजाल उत्पन्न हुए
धर्माधर्मौ सुखदुःखे च सृष्टि- │ हैं। और उसीसे धर्म-अधर्म, सुख-दुःख
र्विनाशपाकौ नरके गतिश्च। │ और सृष्टि-विनाशरूप परिणाम, नरकमें
वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च │ जाना, स्वर्गमें रहना, जाति, आश्रम,
रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च॥ │ राग, द्वेष, तरह-तरहकी व्याधियाँ,
कौमारतारुण्यजरावियोग- │ कुमारावस्था, तरुणता, वृद्धावस्था,
संयोगभोगानशनव्रतानि । │ वियोग, संयोग, भोग, उपवास और
इतीदमीदृग्विद्यं निधाय │ व्रत प्रकट हुए हैं। इन सबको
तूष्णीमासीनः सुमतिं विविद्धि॥” │ इस प्रकार [ प्रकृतिका ही विकार ]
│ जाननेवाला पुरुष इन्हें प्रकृतिमें
│ स्थापित कर मौनभावसे स्थित रहता
│ है। उसे ही तुम शुभ मतिवाला
│ जानो।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे षड- │ तथा श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणके
ध्यायाम्— │ अन्तर्गत षडध्यायीमें भी कहा
“अनादिसम्बन्धवत्या │ है—“यह क्षेत्रज्ञ अपनेमें
क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । │ अनादिकालसे सम्बद्ध हुई अविद्यासे
युक्तः पश्यति भेदेन │ युक्त होकर अपने अन्तःकरणमें स्थित
ब्रह्म तत्त्वात्मनि स्थितम्॥ │ ब्रह्मको भेदरूपसे देखता है। जबतक
पश्यत्यात्मानमन्यञ्च │ जीव परमात्मासे भिन्न अपनेको तथा
यावद्वै परमात्मनः। │ अन्य जीवोंको देखता है तबतक वह
तावत्संस्राम्यते जन्तु- │ अपने कर्मोंद्वारा मोहित होकर संसारमें
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ │ भटकाया जाता है। जब इसके सम्पूर्ण
संक्षीणाशेषकर्मा तु │ कर्म क्षीण हो जाते हैं तो यह शुद्ध
परं ब्रह्म प्रपश्यति । │ परब्रह्मको अपनेसे अभिन्नरूपसे