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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
“एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते” | होता” “इस प्रकार जाननेवालेको
( छा० उ० ४ । १४ । ३ ) । | पापकर्मका संसर्ग नहीं होता”, “उसे
“नैनं कृताकृते तपतः” ( बृ० | पुण्य-पाप सन्ताप नहीं दे सकते”,
उ० ४ । ४ । २२) । “एवं | “इसी प्रकार इसके समस्त पाप नष्ट
हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” | हो जाते हैं ।”
( छा०उ०५ । २४ । ३ ) । |
लैङ्गे— | लिङ्गपुराणमें कहा है— “इसी
“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म
भस्मसात्कुरुते तथा ॥ | कर देता है । इसमें सन्देह नहीं कि
ज्ञानिनः सर्वकर्माणि | ज्ञानीके समस्त कर्म जीर्ण हो जाते
जीर्यन्ते नात्र संशयः । | हैं, वह नाना प्रकारके पाप-पुण्योंसे
क्रीडन्नपि न लिप्येत | क्रीडा करता हुआ भी उनसे लिप्त
पापैर्नानाविधैरपि ॥” | नहीं होता ।”
शिवधर्मोत्तरेऽपि— | शिवधर्मोत्तरमें भी कहा है—
“तस्माज्ज्ञानासिना तूर्ण- | “अतः वह तुरन्त ही सकाम या
मशेषं कर्मबन्धनम् । | निष्कामभावसे किये हुए सम्पूर्ण
कामाकामकृतं छित्त्वा | कर्मबन्धनको ज्ञानरूप खड्गसे
| काटकर शुद्ध हो अपने आत्मामें
शुद्धश्चात्मनि तिष्ठति ॥ | स्थित हो जाता है । जिस प्रकार
यथा वह्निर्महान्दीप्तः | अत्यन्त प्रज्वलित हुआ अग्नि सूखे
शुष्कमाद्रं च निर्दहेत् । | और गीले सब प्रकारके इन्धनको
| जला डालता है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि
तथा शुभाशुभं कर्म | एक क्षणमें ही समस्त शुभाशुभ
ज्ञानाग्निर्दहते क्षणात् ॥ | कर्मोंको भस्म कर देता है । जिस
पद्मपत्रं यथा तोयैः | प्रकार कमलका पत्ता अपने ऊपर
| पड़े हुए जलसे भी लिप्त नहीं होता,
स्वस्थैरपि न लिप्यते । | उसी प्रकार ज्ञानी प्रारब्धवश अपनेको
शब्दादिविषयाम्भोभि- | प्राप्त हुए शब्दादि विषयरूप जलसे