श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
अज्ञानवन्धभेदस्तु | अज्ञानरूप बन्धनकी निवृत्ति और
मोक्षो ब्रह्मलयस्त्विति ॥” | ब्रह्ममें लीन हो जाना-यही उसका मोक्ष है।”
तथा लैङ्गे विदुषो जीवन्मुक्तिं दर्शयति— | तथा लिङ्गपुराणमें भी ज्ञानीकी जीवित रहते हुए ही मुक्ति दिखायी
“इह लोके परे चैव | है—“क्योंकि ब्रह्मवेत्ता परमार्थतः
कर्तव्यं नास्ति तस्य वै। | जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता
जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् | है, इसलिये उसके लिये इस लोक
ब्रह्मवित्तपरमार्थतः॥” | और परलोकमें कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता।”
शिवधर्मोत्तरे— | शिवधर्मोत्तरमें कहा है—“ज्ञानीकी
“वाञ्छात्ययेऽपि कर्तव्यं | समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती
किञ्चिदस्य न विद्यते। | हैं, इसलिये उसका कुछ भी कर्तव्य
इहैव स विमुक्तः | नहीं रहता। वह पूर्णकाम और सम-
स्यात्संपूर्णः समदर्शनः॥” | दर्शी होनेसे इसी लोकमें मुक्त हो जाता है।”
तस्मादुपासको देहादुत्क्रम्या- | अतः उपासक तो देहसे उत्क्रमण
[उपासक-विदुषोर्गंत्युप-संहारः] र्चिरादिना देवया- | कर अर्चिरादि देवयानमार्गसे सर्वै-
नेन विश्वैश्वर्यं ब्रह्म | श्वर्यपूर्ण कारणब्रह्मको प्राप्त हो सब
प्राप्य विश्वैश्वर्यमनु- | प्रकारका ऐश्वर्य भोगनेके अनन्तर
भूय तत्रैव केवलं प्रत्यस्तमित- | वहीं सम्पूर्ण भेदसे रहित पूर्णानन्द-
भेदपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मानं | स्वरूप अद्वितीय केवल शुद्ध ब्रह्मको
ज्ञात्वा केवलात्मकामो मुक्तो | आत्मभावसे जानकर केवल आत्म-
भवति। विद्वान्निर्विरोषपूर्णानन्दा- | कामी होकर मुक्त हो जाता है।
द्वितीयब्रह्मविज्ञानादशेषगन्तृगन्त- | तथा विद्वान् निर्विशेष पूर्णानन्दा-द्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जानेसे गन्ता,