श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
महावीरी व्याख्या
आमुख
चूडामणि माना जाता है। ठीक यही तथ्य श्रीहनुमान्-चालीसाके विषयमें भी
जानना चाहिए।
श्रीहनुमान्-चालीसाकी श्रीतुलसीदासजीकी रचना होनेके पक्षमें एक और
सशक्त प्रमाण उद्धृत किया जा रहा है। प्रायः गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंमें
उनके द्वारा रचित एकमें दूसरे ग्रन्थके कतिपय पद्य उद्धृत देखे जाते हैं। यथा
दोहावलीका प्रथम दोहा (राम बाम दिसि जानकी, दो. १) रामाज्ञाप्रश्न
(रा.प्र. ७-३-७) तथा वैराग्य-संदीपनी (वै.सं. १)में ज्यों-का-त्यों उद्धृत
है। इसी प्रकार श्रीमानसजीके लगभग १०० दोहे और सोरठे यथानुपूर्वी
श्रीदोहावलीमें संगृहीत हैं। उदाहरणके लिए दो-एक देखे जाएँ—
एक छत्र एक मुकुटमनि सब बरनन पर जोउ।
तुलसी रघुबर-नाम के बरन बिराजत दोउ॥
—रा.च.मा. १-२०
यही दोहा दोहावली ग्रन्थका ९वाँ है। बालकाण्डका २७वाँ दोहा
(राम-नाम नरकेसरी) दोहावलीका २६वाँ है। ठीक इसी पद्धतिका
अनुसरण श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रारम्भमें किया गया। अयोध्याकाण्डके
प्रथम दोहेका श्रीहनुमान्-चालीसाके मङ्गलाचरणमें प्रस्तुतीकरण ही हनुमान्-
चालीसाको निःसंदिग्ध कर देता है। अयोध्याकाण्डका प्रथम दोहा श्रीगुरु-
चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि इत्यादि ज्यों-का-त्यों हनुमान्-
चालीसाके मङ्गलाचरणके रूपमें सनातन-धर्मावलम्बी आबालवृद्ध जन-
जनके मुखमण्डलपर विराजमान है। अतः—
एतेहु पर करिहैं जे शंका।
मोहि ते अधिक ते जड़ मति-रंका॥
—रा.च.मा. १-१२-८
इत्यलमतिपल्लवितेन।
७
आमुख महावीरी व्याख्या
श्रीहनुमन्बाहुककी भाँति यह छोटे-छोटे मात्र ४३ छन्दोंमें उपनिबद्ध
है। यह परम स्वस्त्ययन स्तोत्ररत्न समस्त ऐहलौकिक एवं पारलौकिक
कामनाओंकी पूर्ति करता है। मैंने भी इसके विधिवत् प्रयोगका सद्यः
फल देखा है। गोस्वामीजीकी ग्रन्थावलीमें संगृहीत न होनेके कारण
आज तक पाश्चात्त्य-वासना-वासित-मनस्क साहित्यिक टीकाकार महानुभावों
द्वारा उपेक्षया इसकी कोई टीका न लिखी जा सकी। कुछ वर्षों पूर्व
श्रीइन्दुभूषण रामायणी द्वारा इसपर एक संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत की गई।
उसमें भी विषयका यथेष्ट व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण नहीं हो पाया। अत एव
गतवर्ष चौद्वार (उड़ीसा) में समायोजित श्रीसंकटमोचन हनुमान्जीके प्रतिष्ठा-
महोत्सवके शुभ-अवसरपर अपने सद्गुरुदेव अनन्तश्रीविभूषित श्री श्री १०८
श्रीरामचरणदासजी महाराज (फलाहारी बाबा सरकार, अरैल, प्रयाग) के
आदेशानुसार मैंने श्रीहनुमन्-चालीसापर लघु व्याख्या प्रस्तुत करनेका बाल-
सुलभ प्रयास किया है। यह कितने अंशोंमें सफल हो पाया है, इसका
आकलन सन्त महानुभाव ही कर सकते हैं; क्योंकि हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ
विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा (र.वं. १-१०)। शास्त्र-स्वाध्यायमें असमर्थता
तथा मानव-स्वभावजन्य-प्रमाद-वशात् यदि कुत्रचित् त्रुटि हो गई हो तो
भगवद्भक्तजन उसे क्षमा करेंगे।
श्रीहनुमन्-चालीसामें कुल ४३ पद हैं, जो दोहा तथा चौपाई छन्दमें
निबद्ध हैं। इसके प्रारम्भमें दो दोहे तथा उपसंहारमें एक दोहा है, शेष
४० चौपाइयाँ हैं। ३२ मात्राओंकी एक पङ्क्तिको एक चौपाई मानकर
प्रत्येक पङ्क्तिको पूर्ण छन्द स्वीकार करके ही उनकी ४० संख्याके
आधारपर ग्रन्थका नाम श्रीहनुमन्-चालीसा रखा गया। ६४ मात्राओंकी
दो-दो पङ्क्तियोंको एक चौपाई मानना भ्रमपूर्ण और अशास्त्रीय है। यदि
दो-दो पङ्क्तियोंको मिलाकर चौपाई होगी तो हनुमन्-चालीसा सिद्ध न
होगा क्योंकि चालीस पङ्क्तियोंमें बीस ही चौपाइयाँ होंगी। इस दृष्टिसे
८
महावीरी व्याख्या आमुख
हनुमान्-बीसा कहना उचित होगा; जबकि तुलसीदासजीने स्वयं हनुमान्-
चालीसा कहा है, यथा—जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा (ह.चा. ३९)।
श्रीमानसजीमें भी जहाँ-जहाँ विषम संख्यापर पङ्क्ति आई है, उस प्रत्येक
पङ्क्तिको प्रत्येक टीकाकारने स्वतन्त्र चौपाईके रूपमें मानकर उसकी टीका
की है। उदाहरणार्थ—
(१) बालकाण्ड २-१३
अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥
(२) अयोध्याकाण्ड ८-७
गावहिं मंगल कोकिलबयनी।
बिधुबदनी मृगशावक-नयनी॥
(३) अरण्यकाण्ड १२-१४ (कुछ प्रतियोंमें १२-१३)
जहँ लगि रहे अपर मुनि-बृंदा।
हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥
(४) किष्किन्धाकाण्ड १०-५
मम लोचन-गोचर सोइ आवा।
बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥
(५) सुन्दरकाण्ड १-९
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
कह मैनाक होहु श्रमहारी॥
(६) युद्धकाण्ड ८०-११
सखा धर्ममय अस रथ जाके।
जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताके॥
(७) उत्तरकाण्ड ६४-९
९
आमुख महावीरी व्याख्या
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई।
तब शिशुचरित कहेसि मन लाई॥
यह दिग्दर्शन मात्र प्रस्तुत किया गया। पद्मावतकी समीक्षामें आचार्य रामचन्द्र
शुक्लने भी कहा है कि जायसीने सात-सात चौपाइयों अर्थात् सात-सात
पङ्क्तियोंके बाद दोहा रचा है। चौपाईका तात्पर्य चार यतियों वाले बत्तीस
(३२) मात्राओंके मात्रिक वृत्तसे है। महर्षि वाल्मीकिजीको जिस प्रकार
बत्तीस अक्षरों वाला अनुष्टुप् सिद्ध है, उसी प्रकार वाल्मीकिजीके अवतार
गोस्वामी तुलसीदासजीको बत्तीस मात्राओं वाली चौपाई सिद्ध है।
यह व्याख्या लगभग एक वर्ष पहले पूर्वदेशमें ही उपनिबद्ध की गई
थी। मुझे लगता है कि इसी हनुमान्-चालीसाकी व्याख्याके फलने दासको
रामभद्रदास कहलानेका सौभाग्य दे दिया। मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण
विश्वास है कि इस ग्रन्थके अनुशीलनसे आस्तिक सनातन-धर्मी हनुमत्परायण
तथा श्रीमानसके कथावाचक महानुभाव परम सन्तोषका अनुभव करेंगे। मैं
समस्त वैष्णव सन्तोंके ही कर-कमलोंमें इस ग्रन्थोपहारको समर्पित कर
उनके पादपद्मोंमें साष्टाङ्ग प्रणत हो रहा हूँ।
श्रीवैष्णवेभ्यो नमो नमः।
इति निवेदयति राघवदीयः
रामभद्रदासः
फलाहारी आश्रम, अरैल
प्रयाग (उत्तरप्रदेश)
गङ्गा दशहरा, वि. सं. २०४१ (जून ८, १९८४ ई.)
परिशोधित-मार्गशीर्ष पूर्णिमा, वि. सं. २०७२ (दिसम्बर २५, २०१५ ई.)
१०
महावीरी व्याख्या
॥ मङ्गलाचरणम् ॥
तापिच्छनीलं धृतदिव्यशीलं ब्रह्माद्वयं व्यापकमव्ययञ्च।
राजाधिराजं विशदं विराजं सीताभिरामं प्रणमामि रामम् ॥
सीतावियोगानलवारिवाहः श्रीरामपादाब्जमिलिन्दवर्यः।
दिव्याञ्जनाशुक्तिललामभूतः स मारुतिर्मङ्गलमातनोतु ॥
गुरून्नत्वा सीतापतिचरणपाथोजयुगलं
चिरञ्चित्ते ध्यात्वा पवनतनयं भक्तसुखदम्।
गिरं स्वीयां दुष्टां विमलयितुमेवार्यचरितै-
र्महावीरीव्याख्यां विरचयति बालो गिरिधरः ॥
श्रीगुरुदेव गजानन मारुति-आरति-नाशिनि गौरि गिरीशा।
जानकि-जीवन मारुतनंदन पंकज पायन नाइके शीशा।
माधव शुक्ल शुभा परिवा तिथि भार्गववार प्रभातगवीशा।
संबत बीस-शताधिक-चालिस व्याख्या करी हनुमान-चलीसा ॥
अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ॥
—रा.च.मा. ५-मङ्गलाचरण श्लोक ३
दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर-बिमल-जस जो दायक फल चारि॥
शब्दार्थ— मुकुर ▸ दर्पण।
अर्थ—श्रीगुरुदेवजीके श्रीचरणकमलकी पराग-रूप धूलिसे अपने मन-
रूप दर्पणको स्वच्छ करके रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामभद्रजूके निर्मल यशका
वर्णन कर रहा हूँ, जो चारों फलोंको देने वाला है।
व्याख्या—सनातन धर्मके अलंकारभूत परम पावन स्तोत्ररत्न श्रीहनुमान्-
चालीसाकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए कलिपावनावतार, निखिल-
वैष्णवकुल-शेखर, सारस्वत-सार्वभौम, परम रामभक्त, प्रातःस्मरणीय,
कविकुलतिलक, पूज्य श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज प्रतिज्ञा-वाक्यमें
सर्वप्रथम श्रीपदके प्रयोगसे श्रीजीका स्मरण कर रहे हैं, जो समस्त
मङ्गलोंकी खान हैं।
बाम भाग शोभति अनुकूला।
आदिशक्ति छबिनिधि जगमूला॥
—रा.च.मा. १-१४८-२
ये ही श्री जनक महाराजके यशोवर्धन हेतु श्रीमिथिला-भूमिमें प्रकट होती हैं
तथा श्रीसीता रूपसे श्रीरामभद्रजूके वाम भागमें विराजमान होकर जीवके
भगवत्प्रातिकूल्यको निरस्त करती हैं। श्री शब्दका गुरु शब्दसे दो प्रकारका
समास है—
(१) मध्यमपदलोपी तृतीयातत्पुरुष समास— श्रिया अनुगृहीतो गुरुः इति
श्रीगुरुः। अर्थात् श्रीजीके द्वारा अनुगृहीत गुरुदेव। अभिप्राय यह है कि
१२
महावीरी व्याख्या दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज
श्रीसंप्रदायमें दीक्षित गुरुदेवकी ही चरण-धूलिसे मनकी निर्मलता संभव है।
क्योंकि श्रीजीकी कृपाके बिना अविद्याकृत दोष नष्ट नहीं होते। तात्पर्य यह
है कि श्रीजीको गोस्वामीजीने भगवदभिन्न होनेपर भी भक्तिरूपमें स्वीकारा
है। यथा—
लसत मंजु मुनि-मंडली मध्य सीय रघुचंद।
ग्यान-सभा जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंद॥
—रा.च.मा. २-२३९
(२) कर्मधारय समास—श्रीरेव गुरुः इति श्रीगुरुः। अर्थात् श्री ही गुरु हैं।
श्रीसंप्रदायमें श्रीरामानुजाचार्यजी तथा श्रीरामानन्दाचार्यजीने श्रीजीको ही परम
गुरु माना है। पूर्वाचार्योंने श्रीसीता भगवतीको श्रीहनुमान्जीकी आचार्याके
रूपमें स्वीकारा है। यथा—समस्तनिगमाचार्यं सीताशिष्यं गुरोर्गुरुम्,
अर्थात् श्रीहनुमान्जी श्रीसीताजीके शिष्य तथा देवगुरु बृहस्पतिजीके भी
गुरु हैं। अतः श्रीहनुमान्जीकी संतुष्टिके लिए प्रणीत श्रीहनुमान्-चालीसाके
प्रारम्भमें उनकी आचार्या श्रीसीताजीका स्मरण अत्यन्त उपयोगी है, यही
श्रीगुरु शब्दका अभिप्राय प्रतीत होता है।
रज शब्द यहाँ श्लेषके बलसे कमल-पक्षमें पराग एवं चरण-पक्षमें धूलि
रूप अर्थका द्योतक है। मनको मुकुर कहनेका अभिप्राय यह है कि जैसे
दर्पणमें बिम्बका प्रतिबिम्बन होता है, उसी प्रकार मनमें श्रीभुवनमनोहर
श्रीराघवके रूपका प्रतिबिम्बन होता है। पर वह मन विषय रूप काई
(जलका मल) से मलिन हो चुका है, यथा—काई बिषय मुकुर मन लागी
(रा.च.मा. १-११५-१)। अतः उसे श्रीगुरुदेवके चरण-कमलकी पराग जैसी
मृदु धूलिसे स्वच्छ करके पुनः श्रीरामजीके यशोवर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं,
जिससे स्वच्छ मनोदर्पणमें भली-भाँति उस यशश्चन्द्रका प्रतिबिम्बन हो सके।
श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रारम्भमें रघुबर-बिमल-जस बरनउँ यह
वाक्यखण्ड एक जिज्ञासाका केन्द्र बन जाता है, तथा कुछ सामान्य मस्तिष्क
१३
दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
वालोंको असंगत प्रतीत होता है। पर विचार करने पर इसका सुगमतया
समाधान हो जाता है। श्रीहनुमान्जी महाराज श्रीरामभद्रजूके सर्वतोभावेन
समर्पित भक्तोंमें अग्रणी हैं। श्रीरघुनाथजीके अतिरिक्त वे अपना किञ्चित् भी
अस्तित्व मानने को तैयार नहीं हैं। यथा—
ता पर मैं रघुबीर दोहाई।
जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
—रा.च.मा. ४-३-३
अतः श्रीरघुवर-यशोवर्णनमें ही उनके यशका वर्णन गतार्थ हो जाता है। दूसरी
बात यह भी है कि वैष्णव भक्तोंको अपनी प्रशंसा नहीं भाती। अतः रघुवर-
यशोवर्णनसे ही श्रीहनुमान्जीकी प्रसन्नता संभव है। इसी उद्देश्यको ध्यानमें
रखकर श्रीगोस्वामीजीने अभिधावृत्तिसे श्रीरामजीके यशका वर्णन कर
श्रीहनुमान्-चालीसासे श्रीमारुतिको प्रसन्न किया तथा रघुवर-यशोभङ्गिमासे
लक्षणावृत्ति द्वारा श्रीहनुमत्-यशोगान कर इस हनुमान्-चालीसा स्तोत्रको
श्रीराघवकी प्रसन्नताका केन्द्र बना दिया। अतः रघुबर-बिमल-जस बरनउँ
से उपक्रम करके राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप से
उपसंहार करेंगे। यह रामयश अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों फलोंका
प्रदाता है। भाव यह है कि इससे प्रसन्न होकर हनुमान्जी महाराज श्रीहनुमान्-
चालीसाके पाठकको पुरुषार्थ-चतुष्टय दे डालते हैं। यद्वा सालोक्य, सामीप्य,
सायुज्य, सारूप्य—इन चारों मुक्तिफलोंको देते हैं। अथवा धर्म, ज्ञान, योग,
जप—इन चारों फलोंको देते हैं। किंवा ज्ञानवादियोंको साधन-चतुष्टयसे
संपन्न कर देते हैं।
१४
महावीरी व्याख्या दो. २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
बुद्धि-हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार॥
शब्दार्थ—बिकार ▸ दोष।
अर्थ—अपने शरीरको बुद्धिसे हीन जानकर मैं श्रीपवनपुत्र हनुमान्जीका
स्मरण कर रहा हूँ। हे प्रभो! आप मुझे बल, बुद्धि, तथा विद्या प्रदान करें
तथा क्लेश एवं विकारोंको समास कर दें।
व्याख्या—यहाँ बुद्धि शब्द भगवत्सेवोपयोगिनी बुद्धिका वाचक है तथा
तनु सूक्ष्म शरीर का, क्योंकि बुद्धिको सूक्ष्म शरीरका अवयव माना गया
है। अर्थात् मेरी बुद्धि तमोगुणके आधिक्यसे भगवान्के श्रीचरण-कमलोंसे
विमुख हो गई है, अतः पवनपुत्रका स्मरण करता हूँ। पवन शब्दका अर्थ
है पवित्र करने वाला। यथा—पुनाति इति पवनः। आप उनके पुत्र अर्थात्
अग्नि हैं, यथा—वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१)। इसलिए अग्निवत् बुद्धिमें
परम प्रकाशका आधान करके क्लेश आदि मलोंको ध्वस्त कर दें।
अब गोस्वामीजी हनुमान्जीसे तीन वस्तुओंकी याचना करते हैं—
(१) बल शब्द यहाँ काम-राग-विवर्जित-आत्मबल-परक है।
यथा—बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् (भ.गी. ७-११)। यही
आत्मबल भगवत्प्राप्तिमें साधन है, यथा—नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
(मु.उ. ३-२-४)।
(२) बुधि (संस्कृतः बुद्धि) शब्दसे यहाँ ईश्वरप्रपन्न बुद्धि अभिप्रेत है,
यथा—चरन-सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि (रा.च.मा. ३-४)।
१५
दो. २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै महावीरी व्याख्या
(३) बिद्या (संस्कृत:विद्या)—यहाँ विद्या विनयसंपन्ना अपेक्षित है, जो
भगवत्संबन्धका विवेक उत्पन्न करके जीवको राघवके चरण-कमलसे जोड़
दे। यथा—सा विद्या या विमुक्तये (वि.पु. १-१९-४१)। अपि च—
बिद्या बिनु बिबेक उपजाए।
श्रम फल पढ़े किए अरु पाए॥
—रा.च.मा. ३-२१-९
अर्थात् श्रीआञ्जनेय बल, बुद्धि, एवं अध्यात्म-विद्यासे भगवान्के सौन्दर्य,
ऐश्वर्य, एवं माधुर्यकी अनुभूतिका सामर्थ्य दें।
क्लेश पाँच होते हैं—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश
(मरण)। यथा—अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः (यो.सू.
२-३)। विकार छः कहे जाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, एवं
मात्सर्य। यथा—षट-बिकार-जित अनघ अकामा (रा.च.मा. ३-४७-
७)। इस प्रकार पञ्च क्लेशों और षट् विकारोंका योग ग्यारह (११) हुआ
और आप एकादशरुद्रमय हैं। यथा—रुद्र-अवतार संसार-पाता (वि.प.
२५-३)। अतः मेरे इन एकादश शत्रुओंको समाप्त करें।
१६
महावीरी व्याख्या चौ. १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥
शब्दार्थ—उजागर (उज्जागर) ▸ प्रसिद्ध।
अर्थ—समस्त शास्त्रीय ज्ञान एवं गुणोंके समुद्र श्रीहनुमान्जी! आपकी
जय हो! हे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वानरोंमें श्रेष्ठ आञ्जनेय! आपकी जय हो!
व्याख्या—इस चौपाईके पूर्वार्धमें श्रीहनुमान्जीके पारलौकिक उत्कर्ष
तथा उत्तरार्धमें लौकिक आदर्शका वर्णन करते हैं। श्रीहनुमान्जी समस्त
शास्त्रोंके ज्ञाता हैं। श्रीमद्वाल्मीकीय-रामायणके किष्किन्धाकाण्डमें भगवान्
श्रीराम इनके अलौकिक ज्ञानकी प्रशंसा करते हैं—
नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्॥
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन विधिना श्रुतम्।
बहुव्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम्॥
—वा.रा. ४-३-२८,२९
श्रीरामचन्द्रजी प्रशंसाके स्वरमें कहते हैं, “जिसने ऋग्वेदकी पूर्ण शिक्षा नहीं
पाई तथा जिसने यजुर्वेदको अर्थतः धारण नहीं किया तथा जो सामवेदका
विद्वान् नहीं, वह इस प्रकारका भाषण कभी भी नहीं कर सकता। निश्चित ही
संपूर्ण व्याकरण इसने विधिवत् सुना है क्योंकि धाराप्रवाहसे बोलता हुआ
यह विद्यार्थी कहीं भी एक भी अक्षर अशुद्ध नहीं बोला।”
तिहुँ लोक उजागर—हनुमान्जी रुद्रावतार होनेसे तथा जल, थल, एवं
नभमें अव्याहतगति होनेके कारण तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं।
१७
चौ. १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर महावीरी व्याख्या
जय कपीश—हनुमान्जी कपियोंके ईश्वर हैं। यथा—
वानराणामधीशम् (रा.च.मा. सुन्दरकाण्ड, मङ्गलाचरण श्लोक ३)।
इन्होंने श्रीरामजीकी सेवाके लिए वानर-शरीर धारण किया, क्योंकि इनके
स्वामी नरवेषमें अवतार लिए—तुमहिं लागि धरिहउँ नरबेसा (रा.च.मा.
१-१८७-१)। स्वामीसे सेवकको निम्न कक्षामें होना चाहिए। यथा—
जेहि शरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र-देह तजि नेह-बश बानर भे हनुमान॥
—दो. १४२
यद्यपि और देवोंको ब्रह्माजीने वानर रूपमें अवतार लेनेका आदेश दिया
था। यथा—
निज लोकहिं बिरंचि गे देवन इहइ सिखाइ।
बानर-तनु धरि धरनि महँ हरि-पद सेवहु जाइ॥
—रा.च.मा. १-१८७
पर महादेवको आदेश नहीं दिया था, अतः देवन इहइ सिखाइ कहा, न
तु महादेवहि सिखाइ। वानर-शरीर धारण करनेमें दूसरा हेतु यह भी है कि
वानर शुद्ध शाकाहारी होता है; अर्थात् वन्य फल, मूल, पत्तोंसे ही अपनी
जीविका चलाता है, जो श्रीराघवको बहुत प्रिय हैं। यथा—फलमूलाशनौ
दान्तौ (रा.र.स्तो. १८), शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः (का.वा.
२-१-६९), और न मांसं राघवो भुङ्क्ते (वा.रा. ५-३६-४१), अर्थात् राघव
मांस कभी नहीं खाते हैं। अतः प्रभुकी वृत्तिके अनुसार श्रीहनुमान्जीने विशुद्ध
शाकाहारी वानर-शरीर धारण किया। अतः हनुमान्जीके उपासक भावुक
भक्तोंको कभी भी मांस, मत्स्य, तथा मद्यका सेवन नहीं करना चाहिए।
मांसाहारी उपासक निश्चित ही हनुमान्जीके कोपका भाजन बनता है।
१८
महावीरी व्याख्या चौ. २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-दूत अतुलित-बल-धामा।
अंजनिपुत्र - पवनसुत - नामा॥ २ ॥
शब्दार्थ—अतुलित-बल-धामा ▸ अतुलनीय बलके आश्रय।
अर्थ—आप श्रीरामजीके विश्वस्त दूत तथा अतुलनीय बलके आश्रय हैं
तथा आप अञ्जनीपुत्र एवं पवनपुत्र नामसे प्रसिद्ध हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जी श्रीराघवके अन्तरङ्गतम दूत हैं। अतः
श्रीसीताजीके प्रति गोपनीय संदेशवाहकका कार्य इन्हींको सौंपा गया।
यथा—
बहु प्रकार सीतहिं समुझाएहु।
कहि बल बीर बेगि तुम आएहु॥
—रा.च.मा. ४-२३-११
सुन्दरकाण्डमें ये श्रीसीताजीके समक्ष स्वयं कहते हैं—रामदूत मैं मातु
जानकी (रा.च.मा. ५-१३-९), और प्रामाणिकताके लिए करुणानिधानकी
शपथ करते हैं—सत्य शपथ करुनानिधान की (रा.च.मा. ५-१३-९)।
भाव यह है कि मुझमें दूत बननेकी कोई पात्रता न होनेपर भी करुणानिधानकी
करुणाने यह महत्त्वपूर्ण पद दे दिया।
अतुलित-बल-धामा—हनुमान्जी अतुलनीय बलके आश्रय हैं ही,
यथा—तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों (ह.बा. ३३)। अथवा
अतुलित बलशाली भगवान् श्रीराम हैं, यथा—अतुलित बल अतुलित
प्रभुताई (रा.च.मा. ३-२-१२)। उनके भी आश्रय हैं श्रीहनुमान्जी।
यथा—चलेउ हरषि हिय धरि रघुनाथा (रा.च.मा. ५-१-४)।
१९
चौ. २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा महावीरी व्याख्या
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा—ये दोनों संबोधन हनुमान्जीकी मातृमत्ता
एवं पितृमत्ताको सूचित करते हैं। अञ्जना—जो पहले पुञ्जिकस्थला
नामक अप्सरा थीं—उन्हें अगस्त्यजीके शापसे वानर-शरीर प्राप्त हुआ।
कामरूप-धारणका सामर्थ्य होनेसे कदाचित् अञ्जनाको दिव्यरूप-संपन्न
देखकर वायुदेवने उनका मानसिक स्पर्श कर हनुमान्जी जैसे महापराक्रमी
महापुरुषको उनके गर्भमन्दिरमें प्रतिष्ठित किया। वायुके रूपरहित होनेसे
केसरी-पत्नीका न तो सतीत्व भङ्ग हुआ और न ही कोई साङ्कर्य दोष आया,
क्योंकि वायु संपूर्ण प्राणियोंके अन्तःस्थ हैं तथा प्रत्येक वस्तुके त्याग एवं
स्वीकारमें वे ही कारण हैं। वायुके बिना कभी भी न तो गर्भाधान संभव है और
न ही बालकका जन्म—प्रसव पवन प्रेरेउ अपराधी (वि.प. १३६.५)।
यहाँ यह भी ध्यान रहे कि रूपवान्का स्पर्श ही पदार्थमें विकृति लाता
है किन्तु वायु रूपरहित स्पर्श वाला है, यथा—रूपरहितस्पर्शवान् वायुः
(त.सं. १३)। वायु सामान्यतः प्रत्येक प्राणीके प्रत्येक अङ्गका स्पर्श करता
है, अतः वायवीय स्पर्शमें दोष नहीं। वायु सबसे पवित्र है, यथा—पवनः
पवतामस्मि (भ.गी. १०-३१)। अतः परम पवित्र पितासे जन्म होनेके कारण
हनुमान्जी परम-पवित्रतम-व्यक्तित्व-संपन्न हुए।
२०
महावीरी व्याख्या चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति-निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—बिक्रम ▸ विशिष्ट-क्रम-संपन्न या विशेष प्रकारकी
लङ्घनक्रियासे संपन्न (क्रमुँ पादविक्षेपे, धा.पा. ४७३)।
अर्थ—आप महावीर तथा विशेष साधना-क्रमसे संपन्न किंवा समुद्रके
लाँघनेकी विशिष्ट क्रियासे युक्त हैं। आपका शरीर वज्रमय है। आप
कुबुद्धिको नष्ट करनेवाले एवं भगवद्भक्तिपूर्ण बुद्धिसे युक्त व्यक्तिका साथ
देने वाले उचित संगी हैं।
व्याख्या—महावीर केवल बाह्य शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है,
पर श्रीमारुति बाह्य एवं आन्तरिक (बाहरी तथा भीतरी) उभय प्रकारके
शत्रुओंका दमन करते हैं। इसीलिए इनके विषयमें एक सूक्ति है—
ऋते भीष्माद्वि गाङ्गेयादृते वीराद्धनूमतः।
हरिणीखुरमात्रेण चर्मणा मोहितं जगत्॥
—मा.सु.सं. १७४९
अर्थात् को जग काम नचाव न जेही (रा.च.मा. ७-७०-७)। समस्त प्राणी
काम-किङ्कर होकर उसके समक्ष नाचते हैं, पर आञ्जनेयजी रघुपति-किङ्कर
होकर उन्हींके श्रीचरणोंमें नृत्य करते हैं। यथा—जयति सिंहासनासीन-
सीतारामण निरखि निर्भर-हरष नृत्यकारी (वि.प. २७-५)। अतः
मानसमें भी इन्हें महाबीर कहा गया—
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मध्य भाग: चौपाई ११ से ३० तक सविस्तार दार्शनिक व्याख्या
चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी महावीरी व्याख्या
महाबीर बिनवउँ हनुमाना।
राम जासु जस आपु बखाना॥
—रा.च.मा. १-१७-१०
बिक्रम—इनका साधना-क्रम विशिष्ट है। इसलिए ये भगवान् श्रीरामको
पीठ तथा हृदयपर आसीन करते हैं। यथा—लिए दुऔ जन पीठ चढ़ाई
(रा.च.मा. ४-४-५) और चलेउ हृदय धरि कृपानिधाना (रा.च.मा.
५-२३-१२)। यद्वा, इनके समुद्र-लङ्घनकी क्रिया भी बहुत विशिष्ट है। स्वयं
कहते हैं—लीलहिं नाँघउ जलधि अपारा (रा.च.मा. ४-३०-८)। मैनाक,
सुरसा, एवं सिंहिका जैसे विघ्नोंके प्रस्तुत होनेपर भी इनका वेग विहत नहीं
हुआ। यथा—
विषण्णा हरयः सर्वे हनूमन् किमुपेक्षसे।
विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव॥
—वा.रा. ४-६६-३७
अर्थात् "हे हनुमान्! संपूर्ण वानर बहुत दुःखी हैं, उनकी उपेक्षा क्यों
करते हो? जिस प्रकार भगवान् विष्णुने तीन बार चरणका विक्षेप करके
समस्त लोकोंको नाप लिया था, उसी प्रकार एक बार समुद्र लाँघनेके लिए
अपने चरणका विक्षेप करो।" अतः यहाँ बिक्रमका अर्थ है विशेष प्रकारके
चरण-विक्षेपकी प्रक्रिया, जिसकी एक छलाँगसे भी कम हो गया भूमण्डलसे
सुदूर नभोमण्डलका परिमाण! यथा—बानर सुभाय बालकेलि भूमि
भानु लागि फलँगु फलाँगहूँ ते घाटि नभतल भो (ह.बा. ५)।
बजरंगी—यह शब्द वज्राङ्गीका तद्भव है। जन्म लेनेके एक दिनके
ही पश्चात्, अर्थात् कार्तिक कृष्ण अमावस्याको, प्रातःकाल क्षुधासे पीड़ित
हनुमान्जी महाराजने लाल फलकी भ्रान्तिसे सूर्यनारायणके ऊपर आक्रमण
कर दिया। उसी समय राहु सूर्यनारायणको ग्रसने हेतु वहाँ उपस्थित था।
हनुमान्जीने सूर्यको छोड़कर राहुपर ही आक्रमण कर दिया। अनन्तर राहुसे
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महावीरी व्याख्या चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी
सूचना पाकर वज्रपाणि इन्द्र ऐरावतपर आरूढ हो वहाँ उपस्थित हुए। अब
श्वेत फलकी भ्रान्तिसे ऐरावतपर आक्रमण करते देखकर इन्द्रने उनकी
बाँई ठोड़ीपर वज्रका प्रहार करके उन्हें धराशायी कर दिया। पश्चात् क्रुद्ध
होकर पवनने अपने संचारको समाप्त कर प्रत्येक प्राणीके प्राणका अवरोध
कर दिया। पश्चात् समस्त देवताओंने श्रीहनुमान्जीको विविध वरदान देकर
पवनदेवको प्रसन्न किया। उसी समय इन्द्रने श्रीहनुमान्जीके शरीरको वज्रसे
अभेद्यताका वरदान देकर उनका हनुमान् नामकरण कर दिया। यह कथा
पुराणोंमें विस्तारसे वर्णित है। अपि च—उर बिशाल भुजदंड चंड नख
बज्र बज्रतन (ह.बा. २)।
कुमति-निवार सुमति के संगी—हनुमान्जीके स्मरणसे कुमतिका
निवारण होता है अथवा कुमतिपूर्ण खलका वे संहार करते हैं तथा सुमतिमान्
सज्जनकी सहायता। जैसे कुमति रावणके विनाशमें वे मुख्य भूमिका निभाते
हैं। यथा—
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
—रा.च.मा. ५-४०-७
और उसके विनाशके लिए—दशमुख-दुसह-दरिद्र दरिबेको भयो प्रकट
तिलोक ओक तुलसी-निधान सो (ह.बा. ८)। और सुमति विभीषणकी
सहायता कर हनुमान्जीने उन्हें अविचल राज्य दिला दिया। यथा—जयति
भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।
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चौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥
शब्दार्थ—कंचन ▸ स्वर्ण। कुंचित ▸ घुँघराले।
अर्थ—हे कपिश्रेष्ठ! आपका वर्ण तस स्वर्णके समान तेजसे पूर्ण है तथा
आप अत्यन्त सुन्दरवेषमें विराज रहे हैं। आपके श्रवणोंमें कुण्डल चमक
रहे हैं तथा आपके केश घुँघराले हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जीने निष्किञ्चना सेवाके लिए अपनेको वानर-
शरीरमें परिणत किया, जिसमें सुन्दर वेष, श्रवणोंमें कुण्डल, एवं केशोंकी
सजावट संगत नहीं हो पाती। इन्होंने अपनेको सर्वविधिहीन चञ्चल कपि भी
कहा। यथा—
कहुहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
—रा.च.मा. ५-७-७
श्रीगोस्वामीजीने भी साधुमें वेष-प्राधान्यका खण्डन करते हुए जाम्बवान् एवं
हनुमान्जीको ही कुवेषधारी होनेपर साधुओंमें शिरमौर एवं सम्मानार्ह माना।
यथा—
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू।
जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
—रा.च.मा. १-७-७
अतः यहाँ ब्राह्मण-वेषधारी हनुमान्जीकी झाँकीका वर्णन संगत लगता है।
श्रीमानसजीमें भी श्रीराम, विभीषण, एवं श्रीभरतजीके समक्ष ब्राह्मण वेषमें
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महावीरी व्याख्या चौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा
हनुमन्जीका आगमन प्रसिद्ध ही है। यथा—
(१) बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ (रा.च.मा. ४-१-६)।
(२) बिप्र रूप धरि बचन सुनाए (रा.च.मा. ५-६-५)।
(३) बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत (रा.च.मा. ७-
१क)।
कंचन-बरन—गौर शरीरकी उपमा काञ्चन वर्णसे ही दी जाती है। तथा
ब्राह्मणका गौरवर्ण उसकी कुलीनताका द्योतक होता है—गौरो ब्राह्मणः
कुलीनः (लोकोक्ति)। बहुवेषधारी आञ्जनेयका कुलीन भद्रवेष एवं केशोंका
कुञ्चित होना उनके रूपानुरूप ही है। यही ध्यान अगली चौपाईमें भी समझना
चाहिए।
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चौ. ५: हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज-जनेऊ छाजै॥ ५॥
शब्दार्थ—छाजै ▸ शोभित हो रहा है।
अर्थ—हे आञ्जनेय! आपके वज्रवत् सुदृढ हस्तमें श्रीरामकी विजय-
ध्वजा विराज रही है एवं आपके स्कन्धपर मूँजका यज्ञोपवीत शोभित हो
रहा है।
व्याख्या—यह झाँकी श्रीभरतजीके समक्ष ब्राह्मण-वेषमें पधारे हुए
श्रीआञ्जनेयकी है। इनके हाथमें श्रीराघवजीकी विजय-वैजयन्ती फहरा रही
है। यथा—भानुकुल-भानु-कीरति-पताका (वि.प. २६-६)। काँधेपर
मूँजका यज्ञोपवीत आञ्जनेयके अखण्ड ब्रह्मचर्यको सूचित करता है।
अथवा, इनके हाथमें वज्रके समान शत्रुदल-नाशिनी गदा एवं वैष्णव
विजय-ध्वजा विराजमान हैं। इस व्याख्यासे व्यञ्जित हनुमान्जीका गदाधारण
ध्वनित होता है।
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