श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहावीरी व्याख्या दो. २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
बुद्धि-हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार॥
शब्दार्थ—बिकार ▸ दोष।
अर्थ—अपने शरीरको बुद्धिसे हीन जानकर मैं श्रीपवनपुत्र हनुमान्जीका
स्मरण कर रहा हूँ। हे प्रभो! आप मुझे बल, बुद्धि, तथा विद्या प्रदान करें
तथा क्लेश एवं विकारोंको समास कर दें।
व्याख्या—यहाँ बुद्धि शब्द भगवत्सेवोपयोगिनी बुद्धिका वाचक है तथा
तनु सूक्ष्म शरीर का, क्योंकि बुद्धिको सूक्ष्म शरीरका अवयव माना गया
है। अर्थात् मेरी बुद्धि तमोगुणके आधिक्यसे भगवान्के श्रीचरण-कमलोंसे
विमुख हो गई है, अतः पवनपुत्रका स्मरण करता हूँ। पवन शब्दका अर्थ
है पवित्र करने वाला। यथा—पुनाति इति पवनः। आप उनके पुत्र अर्थात्
अग्नि हैं, यथा—वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१)। इसलिए अग्निवत् बुद्धिमें
परम प्रकाशका आधान करके क्लेश आदि मलोंको ध्वस्त कर दें।
अब गोस्वामीजी हनुमान्जीसे तीन वस्तुओंकी याचना करते हैं—
(१) बल शब्द यहाँ काम-राग-विवर्जित-आत्मबल-परक है।
यथा—बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् (भ.गी. ७-११)। यही
आत्मबल भगवत्प्राप्तिमें साधन है, यथा—नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
(मु.उ. ३-२-४)।
(२) बुधि (संस्कृतः बुद्धि) शब्दसे यहाँ ईश्वरप्रपन्न बुद्धि अभिप्रेत है,
यथा—चरन-सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि (रा.च.मा. ३-४)।
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