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सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर-बिमल-जस जो दायक फल चारि॥
शब्दार्थ— मुकुर ▸ दर्पण।
अर्थ—श्रीगुरुदेवजीके श्रीचरणकमलकी पराग-रूप धूलिसे अपने मन-
रूप दर्पणको स्वच्छ करके रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामभद्रजूके निर्मल यशका
वर्णन कर रहा हूँ, जो चारों फलोंको देने वाला है।
व्याख्या—सनातन धर्मके अलंकारभूत परम पावन स्तोत्ररत्न श्रीहनुमान्-
चालीसाकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए कलिपावनावतार, निखिल-
वैष्णवकुल-शेखर, सारस्वत-सार्वभौम, परम रामभक्त, प्रातःस्मरणीय,
कविकुलतिलक, पूज्य श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज प्रतिज्ञा-वाक्यमें
सर्वप्रथम श्रीपदके प्रयोगसे श्रीजीका स्मरण कर रहे हैं, जो समस्त
मङ्गलोंकी खान हैं।
बाम भाग शोभति अनुकूला।
आदिशक्ति छबिनिधि जगमूला॥
—रा.च.मा. १-१४८-२
ये ही श्री जनक महाराजके यशोवर्धन हेतु श्रीमिथिला-भूमिमें प्रकट होती हैं
तथा श्रीसीता रूपसे श्रीरामभद्रजूके वाम भागमें विराजमान होकर जीवके
भगवत्प्रातिकूल्यको निरस्त करती हैं। श्री शब्दका गुरु शब्दसे दो प्रकारका
समास है—
(१) मध्यमपदलोपी तृतीयातत्पुरुष समास— श्रिया अनुगृहीतो गुरुः इति
श्रीगुरुः। अर्थात् श्रीजीके द्वारा अनुगृहीत गुरुदेव। अभिप्राय यह है कि
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