श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहावीरी व्याख्या दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज
श्रीसंप्रदायमें दीक्षित गुरुदेवकी ही चरण-धूलिसे मनकी निर्मलता संभव है।
क्योंकि श्रीजीकी कृपाके बिना अविद्याकृत दोष नष्ट नहीं होते। तात्पर्य यह
है कि श्रीजीको गोस्वामीजीने भगवदभिन्न होनेपर भी भक्तिरूपमें स्वीकारा
है। यथा—
लसत मंजु मुनि-मंडली मध्य सीय रघुचंद।
ग्यान-सभा जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंद॥
—रा.च.मा. २-२३९
(२) कर्मधारय समास—श्रीरेव गुरुः इति श्रीगुरुः। अर्थात् श्री ही गुरु हैं।
श्रीसंप्रदायमें श्रीरामानुजाचार्यजी तथा श्रीरामानन्दाचार्यजीने श्रीजीको ही परम
गुरु माना है। पूर्वाचार्योंने श्रीसीता भगवतीको श्रीहनुमान्जीकी आचार्याके
रूपमें स्वीकारा है। यथा—समस्तनिगमाचार्यं सीताशिष्यं गुरोर्गुरुम्,
अर्थात् श्रीहनुमान्जी श्रीसीताजीके शिष्य तथा देवगुरु बृहस्पतिजीके भी
गुरु हैं। अतः श्रीहनुमान्जीकी संतुष्टिके लिए प्रणीत श्रीहनुमान्-चालीसाके
प्रारम्भमें उनकी आचार्या श्रीसीताजीका स्मरण अत्यन्त उपयोगी है, यही
श्रीगुरु शब्दका अभिप्राय प्रतीत होता है।
रज शब्द यहाँ श्लेषके बलसे कमल-पक्षमें पराग एवं चरण-पक्षमें धूलि
रूप अर्थका द्योतक है। मनको मुकुर कहनेका अभिप्राय यह है कि जैसे
दर्पणमें बिम्बका प्रतिबिम्बन होता है, उसी प्रकार मनमें श्रीभुवनमनोहर
श्रीराघवके रूपका प्रतिबिम्बन होता है। पर वह मन विषय रूप काई
(जलका मल) से मलिन हो चुका है, यथा—काई बिषय मुकुर मन लागी
(रा.च.मा. १-११५-१)। अतः उसे श्रीगुरुदेवके चरण-कमलकी पराग जैसी
मृदु धूलिसे स्वच्छ करके पुनः श्रीरामजीके यशोवर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं,
जिससे स्वच्छ मनोदर्पणमें भली-भाँति उस यशश्चन्द्रका प्रतिबिम्बन हो सके।
श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रारम्भमें रघुबर-बिमल-जस बरनउँ यह
वाक्यखण्ड एक जिज्ञासाका केन्द्र बन जाता है, तथा कुछ सामान्य मस्तिष्क
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