श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर महावीरी व्याख्या
जय कपीश—हनुमान्जी कपियोंके ईश्वर हैं। यथा—
वानराणामधीशम् (रा.च.मा. सुन्दरकाण्ड, मङ्गलाचरण श्लोक ३)।
इन्होंने श्रीरामजीकी सेवाके लिए वानर-शरीर धारण किया, क्योंकि इनके
स्वामी नरवेषमें अवतार लिए—तुमहिं लागि धरिहउँ नरबेसा (रा.च.मा.
१-१८७-१)। स्वामीसे सेवकको निम्न कक्षामें होना चाहिए। यथा—
जेहि शरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र-देह तजि नेह-बश बानर भे हनुमान॥
—दो. १४२
यद्यपि और देवोंको ब्रह्माजीने वानर रूपमें अवतार लेनेका आदेश दिया
था। यथा—
निज लोकहिं बिरंचि गे देवन इहइ सिखाइ।
बानर-तनु धरि धरनि महँ हरि-पद सेवहु जाइ॥
—रा.च.मा. १-१८७
पर महादेवको आदेश नहीं दिया था, अतः देवन इहइ सिखाइ कहा, न
तु महादेवहि सिखाइ। वानर-शरीर धारण करनेमें दूसरा हेतु यह भी है कि
वानर शुद्ध शाकाहारी होता है; अर्थात् वन्य फल, मूल, पत्तोंसे ही अपनी
जीविका चलाता है, जो श्रीराघवको बहुत प्रिय हैं। यथा—फलमूलाशनौ
दान्तौ (रा.र.स्तो. १८), शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः (का.वा.
२-१-६९), और न मांसं राघवो भुङ्क्ते (वा.रा. ५-३६-४१), अर्थात् राघव
मांस कभी नहीं खाते हैं। अतः प्रभुकी वृत्तिके अनुसार श्रीहनुमान्जीने विशुद्ध
शाकाहारी वानर-शरीर धारण किया। अतः हनुमान्जीके उपासक भावुक
भक्तोंको कभी भी मांस, मत्स्य, तथा मद्यका सेवन नहीं करना चाहिए।
मांसाहारी उपासक निश्चित ही हनुमान्जीके कोपका भाजन बनता है।
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