श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
वालोंको असंगत प्रतीत होता है। पर विचार करने पर इसका सुगमतया
समाधान हो जाता है। श्रीहनुमान्जी महाराज श्रीरामभद्रजूके सर्वतोभावेन
समर्पित भक्तोंमें अग्रणी हैं। श्रीरघुनाथजीके अतिरिक्त वे अपना किञ्चित् भी
अस्तित्व मानने को तैयार नहीं हैं। यथा—
ता पर मैं रघुबीर दोहाई।
जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
—रा.च.मा. ४-३-३
अतः श्रीरघुवर-यशोवर्णनमें ही उनके यशका वर्णन गतार्थ हो जाता है। दूसरी
बात यह भी है कि वैष्णव भक्तोंको अपनी प्रशंसा नहीं भाती। अतः रघुवर-
यशोवर्णनसे ही श्रीहनुमान्जीकी प्रसन्नता संभव है। इसी उद्देश्यको ध्यानमें
रखकर श्रीगोस्वामीजीने अभिधावृत्तिसे श्रीरामजीके यशका वर्णन कर
श्रीहनुमान्-चालीसासे श्रीमारुतिको प्रसन्न किया तथा रघुवर-यशोभङ्गिमासे
लक्षणावृत्ति द्वारा श्रीहनुमत्-यशोगान कर इस हनुमान्-चालीसा स्तोत्रको
श्रीराघवकी प्रसन्नताका केन्द्र बना दिया। अतः रघुबर-बिमल-जस बरनउँ
से उपक्रम करके राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप से
उपसंहार करेंगे। यह रामयश अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों फलोंका
प्रदाता है। भाव यह है कि इससे प्रसन्न होकर हनुमान्जी महाराज श्रीहनुमान्-
चालीसाके पाठकको पुरुषार्थ-चतुष्टय दे डालते हैं। यद्वा सालोक्य, सामीप्य,
सायुज्य, सारूप्य—इन चारों मुक्तिफलोंको देते हैं। अथवा धर्म, ज्ञान, योग,
जप—इन चारों फलोंको देते हैं। किंवा ज्ञानवादियोंको साधन-चतुष्टयसे
संपन्न कर देते हैं।
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