श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥
शब्दार्थ—कंचन ▸ स्वर्ण। कुंचित ▸ घुँघराले।
अर्थ—हे कपिश्रेष्ठ! आपका वर्ण तस स्वर्णके समान तेजसे पूर्ण है तथा
आप अत्यन्त सुन्दरवेषमें विराज रहे हैं। आपके श्रवणोंमें कुण्डल चमक
रहे हैं तथा आपके केश घुँघराले हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जीने निष्किञ्चना सेवाके लिए अपनेको वानर-
शरीरमें परिणत किया, जिसमें सुन्दर वेष, श्रवणोंमें कुण्डल, एवं केशोंकी
सजावट संगत नहीं हो पाती। इन्होंने अपनेको सर्वविधिहीन चञ्चल कपि भी
कहा। यथा—
कहुहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
—रा.च.मा. ५-७-७
श्रीगोस्वामीजीने भी साधुमें वेष-प्राधान्यका खण्डन करते हुए जाम्बवान् एवं
हनुमान्जीको ही कुवेषधारी होनेपर साधुओंमें शिरमौर एवं सम्मानार्ह माना।
यथा—
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू।
जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
—रा.च.मा. १-७-७
अतः यहाँ ब्राह्मण-वेषधारी हनुमान्जीकी झाँकीका वर्णन संगत लगता है।
श्रीमानसजीमें भी श्रीराम, विभीषण, एवं श्रीभरतजीके समक्ष ब्राह्मण वेषमें
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