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सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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महावीरी व्याख्या चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी
सूचना पाकर वज्रपाणि इन्द्र ऐरावतपर आरूढ हो वहाँ उपस्थित हुए। अब
श्वेत फलकी भ्रान्तिसे ऐरावतपर आक्रमण करते देखकर इन्द्रने उनकी
बाँई ठोड़ीपर वज्रका प्रहार करके उन्हें धराशायी कर दिया। पश्चात् क्रुद्ध
होकर पवनने अपने संचारको समाप्त कर प्रत्येक प्राणीके प्राणका अवरोध
कर दिया। पश्चात् समस्त देवताओंने श्रीहनुमान्जीको विविध वरदान देकर
पवनदेवको प्रसन्न किया। उसी समय इन्द्रने श्रीहनुमान्जीके शरीरको वज्रसे
अभेद्यताका वरदान देकर उनका हनुमान् नामकरण कर दिया। यह कथा
पुराणोंमें विस्तारसे वर्णित है। अपि च—उर बिशाल भुजदंड चंड नख
बज्र बज्रतन (ह.बा. २)।
कुमति-निवार सुमति के संगी—हनुमान्जीके स्मरणसे कुमतिका
निवारण होता है अथवा कुमतिपूर्ण खलका वे संहार करते हैं तथा सुमतिमान्
सज्जनकी सहायता। जैसे कुमति रावणके विनाशमें वे मुख्य भूमिका निभाते
हैं। यथा—
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
—रा.च.मा. ५-४०-७
और उसके विनाशके लिए—दशमुख-दुसह-दरिद्र दरिबेको भयो प्रकट
तिलोक ओक तुलसी-निधान सो (ह.बा. ८)। और सुमति विभीषणकी
सहायता कर हनुमान्जीने उन्हें अविचल राज्य दिला दिया। यथा—जयति
भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।
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