श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहावीरी व्याख्या चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति-निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—बिक्रम ▸ विशिष्ट-क्रम-संपन्न या विशेष प्रकारकी
लङ्घनक्रियासे संपन्न (क्रमुँ पादविक्षेपे, धा.पा. ४७३)।
अर्थ—आप महावीर तथा विशेष साधना-क्रमसे संपन्न किंवा समुद्रके
लाँघनेकी विशिष्ट क्रियासे युक्त हैं। आपका शरीर वज्रमय है। आप
कुबुद्धिको नष्ट करनेवाले एवं भगवद्भक्तिपूर्ण बुद्धिसे युक्त व्यक्तिका साथ
देने वाले उचित संगी हैं।
व्याख्या—महावीर केवल बाह्य शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है,
पर श्रीमारुति बाह्य एवं आन्तरिक (बाहरी तथा भीतरी) उभय प्रकारके
शत्रुओंका दमन करते हैं। इसीलिए इनके विषयमें एक सूक्ति है—
ऋते भीष्माद्वि गाङ्गेयादृते वीराद्धनूमतः।
हरिणीखुरमात्रेण चर्मणा मोहितं जगत्॥
—मा.सु.सं. १७४९
अर्थात् को जग काम नचाव न जेही (रा.च.मा. ७-७०-७)। समस्त प्राणी
काम-किङ्कर होकर उसके समक्ष नाचते हैं, पर आञ्जनेयजी रघुपति-किङ्कर
होकर उन्हींके श्रीचरणोंमें नृत्य करते हैं। यथा—जयति सिंहासनासीन-
सीतारामण निरखि निर्भर-हरष नृत्यकारी (वि.प. २७-५)। अतः
मानसमें भी इन्हें महाबीर कहा गया—
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