श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा महावीरी व्याख्या
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा—ये दोनों संबोधन हनुमान्जीकी मातृमत्ता
एवं पितृमत्ताको सूचित करते हैं। अञ्जना—जो पहले पुञ्जिकस्थला
नामक अप्सरा थीं—उन्हें अगस्त्यजीके शापसे वानर-शरीर प्राप्त हुआ।
कामरूप-धारणका सामर्थ्य होनेसे कदाचित् अञ्जनाको दिव्यरूप-संपन्न
देखकर वायुदेवने उनका मानसिक स्पर्श कर हनुमान्जी जैसे महापराक्रमी
महापुरुषको उनके गर्भमन्दिरमें प्रतिष्ठित किया। वायुके रूपरहित होनेसे
केसरी-पत्नीका न तो सतीत्व भङ्ग हुआ और न ही कोई साङ्कर्य दोष आया,
क्योंकि वायु संपूर्ण प्राणियोंके अन्तःस्थ हैं तथा प्रत्येक वस्तुके त्याग एवं
स्वीकारमें वे ही कारण हैं। वायुके बिना कभी भी न तो गर्भाधान संभव है और
न ही बालकका जन्म—प्रसव पवन प्रेरेउ अपराधी (वि.प. १३६.५)।
यहाँ यह भी ध्यान रहे कि रूपवान्का स्पर्श ही पदार्थमें विकृति लाता
है किन्तु वायु रूपरहित स्पर्श वाला है, यथा—रूपरहितस्पर्शवान् वायुः
(त.सं. १३)। वायु सामान्यतः प्रत्येक प्राणीके प्रत्येक अङ्गका स्पर्श करता
है, अतः वायवीय स्पर्शमें दोष नहीं। वायु सबसे पवित्र है, यथा—पवनः
पवतामस्मि (भ.गी. १०-३१)। अतः परम पवित्र पितासे जन्म होनेके कारण
हनुमान्जी परम-पवित्रतम-व्यक्तित्व-संपन्न हुए।
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